।।जल की भीति पवन का थंबा।।
।।जल की भीति पवन का थंबा।।
।।राग सोरठ।।
गुरु रविदास जी महाराज की आयु 151 वर्ष हुई है, वर्तमान युग में इतनी लंबी आयु किसी की नहीं सुनी गई है, इस लंबे समय में गुरु जी ने विज्ञान की हर विधा के ऊपर चिंतन कर के कई वैज्ञानिक सिद्धांतों का सृजन की हुआ है, जैसा अभी तक कोई भी वैज्ञानिक नहीं कर सका है। वैज्ञानिकों के अनुसार, पानी की उत्पत्ति दो तत्वों ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के मिश्रण से हुई है मगर गुरु रविदास जी महाराज आक्सीजन को अमृत और हाइड्रोजन को जहर मानते हैं, अमृत और जहर के मिश्रण से पानी और खून की उतपत्ति की हुई है। सृष्टि के जीव जगत के लिए जहां ऑक्सीजन जीवनदायिनी और चमत्कारी तत्व है, वहीं हाइड्रोजन मृत्यु का सामान भी है अर्थात यमराज है। जहां आक्सीजन सृष्टि की रचयिता है, वहां हाइड्रोजन दक्षिण दिशा में बसने वाले मृत्यु का देवता यमराज है। गुरु रविदास जी के वैज्ञानिक सिद्धांत को कोई आम व्यक्ति ना तो समझ सका है और ना ही इस की व्याख्या कर सका है। इसी पानी के कारण ही जीव का जीवन चलता है। गुरु जी फरमाते हैं कि यह शरीर किस प्रकार बना है? किस प्रकार चलता है? इस शब्द में विस्तार से वर्णन करते हैं:---
जल की भीति पवन का पंखा।।
रकत बूंद का गारा।।
हाड़ मास नाड़ी को पिंजरु।
पंखी बसै बिचारा।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि आद पुरुष ने एक भाग ऑक्सीजन (अमृत) और दो भाग हाइड्रोजन (जहर) को मिला कर के पानी का निर्माण किया है, इसी चमत्कारी पवित्र पानी से दीवारें खड़ी करने के लिए हड्डियों और मांस को जोड़ने के लिए खून के गारे के साथ चमड़ी और नाड़ियां रूपी नालियों का निर्माण कर के, बड़े कलात्मक ढंग से जगह जगह स्थापित कर के पिंजरा बनाया हैं, जो वायु के स्तंभ के सहारे खड़ा है, इस अद्वितीय चमत्कारी पिंजरे के बीच एक बेचारा (भोला भाला) पक्षी निवास करता है, जिस को वायु हर पल पल पंखा भी झुलाती रहती है।
भावार्थ:--- गुरु रविदास जी महाराज मनुष्य के शरीर की रचना का वर्णन करते हुए फरमाते हैं, कि जल, वायु, अग्नि और अकाश चार तत्वों से मिल कर जीव का शरीर बना हुआ है, आदपुरुष ने जल से मनुष्य के शरीर का निर्माण किया है, जिस में रक्त बूंद का रेत और सीमेंट का मसाला लगाया हुआ है, जिस के साथ कठोर हड्डियों,नर्म मुलायम मांस और नाड़ी के योग से मानव शरीर का अस्थि पंजर बनाया हुआ है, जिस के बीच मासूम जीवात्मा रूपी पक्षी बैठा हुआ है, जिसे नाक इंद्री के द्वारा वायु सारे शरीर के खून को गतिशील रखती है।
प्राणी किआ मेरा किआ तेरा।
जैसे तरवर पंखी बसेरा।।१।।रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि यही प्राणी माया, काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार और अन्य आकर्षण की वस्तुओं से आकर्षित हो कर कहता है, कि ये वस्तु मेरी है और ये तेरी। हे प्राणी! तूँ जिस पिंजरे में बैठा है, उस को तू कहता है, कि यह मेरा है और ये तेरा है। अरे भाई! ये मेरा और तेरा क्या है? तूँ जिस महल को बना कर शाही जीवन गुजार रहा है, उस महल को एक दिन छोड़ना पड़ेगा। पक्षी सुंदर पेड़ के ऊपर रात्रि निवास करता है और सुबह होते ही फिर उड़ जाता है, वैसा ही तेरा हाल है।
राखु कंध उसारहूँ नींवा।।
साढे तीनि हथ तेरी सीवां।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज मनुष्य को संबोधित करते हुए फरमाते हैं, कि हे मानव! तूने बड़ी गहरी गहरी नींवें बना कर, उस मजबूत नींव के ऊपर दीवारें खड़ी कर के बड़े-बड़े सुंदर महल तैयार कर लिए हैं, मगर तुझे यह ज्ञान नहीं है कि अंत में तेरे महल की सीमा केवल साढ़े तीन हाथ की ही होगी मगर अग्नि में जल कर राख बनने पर फिर वहां से तुझे निकाल दिया जाएगा और उसी साढ़े तीन हाथ जगह पर कोई और दूसरा आ जाएगा अर्थात श्मशानघाट भी तेरा स्थाई निवास नहीं है।
गुरु रविदास जी महाराज मानव जाति को सचेत करते हुए फरमाते हैं, कि हे भाई! तू आलीशान भवनों में रहकर सुंदर अप्सराओं जैसी नारियों के साथ मौज मस्ती कर रहा है और काम, क्रोध, मोह लोभ और अहंकार के बीच फंसकर अपना सुनहरा जीवन बर्बाद कर रहा है, ये महल और सुंदर अप्सराएं तेरे साथ नहीं जाएंगे और अंत में केवल तुझे अग्नि के सपुर्द करने के लिए केवल साढ़े तीन हाथ जगह ही नसीब होगी मगर तेरी अस्थियों को चुनने के बाद, किसी और के लिए खाली कर दी जाएगी, इसलिए हे मॉनव! तूँ केवल आदपुरुष को याद कर, तभी तेरा कल्याण संभव है।
बंके बाल पाग सिर डोरी।।
इहु तनु होइगो भषम की ढेरी।।३।।
गुरु रविदास जी महाराज मनुष्य को संबोधित करते हुए फरमाते हैं कि, हे मनुष्य! तूँ बन ठन कर, सज धज कर सिर के बालों को सुंदर सजा संवार कर, उनके ऊपर लाल रंग की पगड़ी के ऊपर लाल डोरी सजा कर पहनता है और घमंड से बड़ा इतराता है, मगर तुझे यह तनिक भी ज्ञान नहीं है, कि यह सजाया सँवारा हुआ सुंदर शरीर एक दिन अग्नि में जल कर राख की ही ढेरी बन जाएगा।
गुरु रविदास जी महाराज के कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य का सज धज कर बनना, सँवरना और इतराना यह सब राम नाम के बिना व्यर्थ जाएगा और अंत में शरीर भष्म हो जाएगा। उसके वंशज उस की राख की ढेरी बना देंगे, इसलिए तूँ काम, क्रोध, मोह, लोभ, माया और अहंकार को त्याग कर आदपुरूष को ही याद करना चाहिए, तभी तेरा कल्याण हो सकता है अर्थात सुखी जीवन जी कर मर सकता है।
ऊंचे मन्दर सुंदर नारी।
राम नाम बिनु बाजी हारी।।४।।
गुरु रविदास जी महाराज मनुष्य को संबोधित करते हुए फरमाते हैं, कि हे मनुष्य! तूने बड़े बड़े ऊंचे ऊंचे सुंदर प्रासाद तैयार कर लिए हैं और उनके बीच सुंदर सुंदर औरतें भी शोभायमान कर के, तू मदहोश हो गया है, परंतु तूँ ने सोहम जाप कर के आदपुरष का सम्मान नहीं किया है, जिस के कारण तुमने यह संसार रूपी खेल के मैदान में अपनी सुनहरी बाजी (बारी, पारी) हार दी है अर्थात तू पराजित हो गया है।
गुरु रविदास जी के फरमान का तात्पर्य है, कि जो ऊंचे आलीशान प्रसाद तूने बनाए हुए हैं और उनके बीच सुंदर-सुंदर अप्सराएं विराजमान की हुई हैं, ये सभी प्रभु भक्ति के बिना बेकार हैं और इन्हीं ऐश्वर्यों के बीच उलझ कर तुमने अपने इस जीवन के खेल की बाजी हार दी हैं अर्थात तू पराजित हो गया है।
मेरी जाति कमीनी पाति कमीनी।
उछा जनमु हमारा।।
तुम शरणागति राजा राम निआरा ।
कहि रविदास चमारा।।५।।६।।
ब्राह्मणों ने भारत के मूल निवासियों को अपना गुलाम बना करके शूद्र घोषित कर रखा है और उन को भी अछूत और पिछड़ों में बांट कर के उनका मान सम्मान खत्म कर रखा है, जिस के कारण गुरु जी फरमाते हैं कि, हे मूलनिवासियों! हम सब की जाति कमीनी (घटिया) नीच है और हमारा वंश भी निम्न स्तर का है। हमारा जन्म घृणित बना दिया है। गुरुओं के गुरु चमार गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि हे हमारे दयालु, अनूठे, अपरम्पार आदपुरष बादशाह! हम तुम्हारी शरण में रहते हैं, आप ही हमारा उद्धार कर सकते हैं।
गुरु रविदास जी महाराज स्वयं तो परिपूर्ण संपूर्ण ज्योतिर्ज्ञानी गुरु हुए हैं मगर इस बंद में वे हमारे जैसे अछूत नीच लोगों को ध्यान में रख कर के फरमाते हैं, कि आपकी जाति और पाती नीच है और तुम्हारे कार्य भी घृणित है जिन से ब्राह्मण, राजपूत और वाणियाँ घृणा करता है, इसलिए इन घृणित कार्य को त्याग कर के कोई अच्छे व्यवसाय अपनाओ ताकि कोई आपको नीच, और अछूत कह कर अपमानित ना करें। कोई भी आप की आत्मा को जलील ना कर सके। परमपिता परमेश्वर अर्थात बादशाह आदपुरुष की शरण में जाकर के अपने जीवन को सुनहरा बना लो।
शब्दार्थ:--- जल-पानी, यहाँ खून अर्थ लगेगा।भीति-दिवार अर्थात चमड़ी। पवन-वायु अर्थात सांस। थंबा-थुआ, स्तंभ, खंबा अर्थात हड्डियों का स्टैंड। रकत-खून। बूंद-खून रूपी पानी।हाड़-हड्डियां। मास-गोश्त। नाड़ी- नसें।तरवर-श्रेष्ठ वृक्ष। पंखी-पक्षी। नीवा-नींव। सींवा-सीमा, हद। बंके-सुंदर। डेरी-टेढ़ी। बाजी-खिलाड़ी की बारी, पारी। हारी-हारना, पराजित होना। पाति-वंश, कुल। भष्म-राख।शरणागति-शरण में आना। राजा-शासक, प्रजा पालक। राम-आदपुरष, ईश्वर। चंद-सुंदर।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।।
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