सुख सागर सुरितरु चिंतामणि।।

 

  
      ।।सुख सागर सुरितरु चिंतामणि।।
                 ।।राग मारू।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, इस शब्द को सोरठ और मारू राग में लिखा है, जिस के कारण रागों के स्वभावानुसार शब्दों के अर्थ भी बदल गए हैं, इसीलिए मारू राग में इस शब्द का अर्थ और प्रवचन सोरठ राग से भिन्न हो गया है। सोरठ राग में गुरु रविदास जी महाराज ने, हिन्दू ब्राह्मणों को संबोधित करते हुए समझाया है, कि वे स्वर्ग के कल्पित वृक्ष चिंतामणि, कामधेनु, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष आदि चार पदार्थों, नौ निधियों और अठारह सिद्धियां, हिंदुओं के देवताओं के हाथ में नहीं है। सकल सृष्टि और प्राणी आद पुरुष के वश में है। आप के सभी देवताओं को भी आदपुरुष ने जन्म दिया है। उसी ने ही धरती पर सभी जीवों, वनस्पतियों का सृजन किया है।आदपुरुष ने यह स्पष्ट आदेश दिया है, कि जो कुछ भी चौतीस अक्षरों में अर्थात देवनागरी लिपि में लिखा गया है, वह केवल संस्कृत भाषा में लिखे गए धार्मिक ग्रंथ और साहित्य है, इन सभी को त्याग कर केवल ईश्वर का ही सिमरन करो। यह विचार ब्राह्मणों को अच्छे नहीं लगे, ना उन के दिमाग में चढ़ सके और ना इंसानियत के इन शब्दों की भावना को समझ पाए। चमार जाति में जन्में गुरु रविदास जी महाराज और उन के अलौकिक फरमान से आहत हो कर ब्राह्मण चिड़ गए। इसीलिए गुरु रविदास जी महाराज ने फिर खूनी क्रांतिकारी राग मारू में इसी शब्द की व्याख्या करते हुए मूलनिवासी संगत को खूनी क्रान्ति का सत्संग देते हुए फरमाया है कि, ये छुआछूत के पुजारी ब्राह्मण, मेरी मानवता की बातों को नहीं समझ सके, इसी लिए वे ब्राह्मणों के सताए हुए शूद्रों, अछूतों को संबोधित करते हुए खूनी क्रान्ति का हुकम देते हैं, उनके अनुसार रोज रोज के मरने से बेहतर है कि आप भी खून का बदला खून से ही लो, तभी अत्याचार रुकेंगे अन्यथा अपराधी बलात्कार, माब्लिंचिंग आदि जघन्य अपराध करते ही रहेंगे। मूलनिवासियों को इस शब्द में स्पष्ट आदेश है, कि जब तक हे शूद्रो! तुम संस्कृत में लिखे हुए कल्पित साहित्य को तिलांजलि नहीं देते हो, तब तक तुम खूनी क्रान्ति नहीं कर सकते हो। गुरु जी शूद्रों को हुक्म जारी करते हुए फरमाते हैं कि, हे शूद्रो! तुम खूंखार यौद्धे बनो,  खून का बदला खून से लो, अब प्यार के बदले गहरा प्यार नहीं चलेगा! गुरु रविदास जी महाराज ने, इस शब्द में वीर रस का प्रयोग करते हए फरमाया है:---
सुख सागर सुरतरु चिंतामणि।
कामधेनु बसि जा के।।
चारि पदारथ असतट दसा सिधि।
नव निधि करतल ता रे ।।१।।
इस शब्द में गुरु रविदास दास जी ने, सोरठ राग की चौथी पंक्ति में ता के स्थान पर "रे" का प्रयोग किया है। मारू राग में रे का अर्थ होता है, अरे, ओए आदि। अरे और ओए गरीब, छोटे और निम्न जाति के लोगों के लिए प्रयोग किया जाता है। मनुवादी तो शूद्रों को ओए और ना जाने क्या क्या घटिया संबोधन करते हैं। गुरु रविदास जी महाराज परमपिता परमेश्वर अर्थात आदपुरुष की सर्वोच्चता का वर्णन करते हुए फरमाते हैं, कि हे ब्राह्मणों के सताए हुए शूद्रो! जिस सुख के सागर अर्थात आदपुरुष के वश में आप के स्वर्ग की कामधेनु गाय और चिंताओं को नष्ट करने वाले चिंतामणि जैसे पत्थर हैं, कल्प वृक्ष जैसे देव वृक्ष आप को गुलाम बनाए रखने के लिये छल, धोखे और ढकोसले मात्र हैं, चारों पदार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, नौ निधियां, और अठारह सिद्धियां आदि शक्तियाँ आप का कोई भी काम  नहीं करते, केवल इन के चमत्कार आप को मूर्ख बना कर क्रांतिकारी कर्म करने से रोकते हैं। ये ब्राह्मणों ने ऐसे निरर्थक अविष्कार किये हुए हैं, कि जिन को सुन कर आदमी तो क्या आदपुरष भी सकते में पड़ गए होंगे, क्योंकि इन लोगों ने चार चार मुखड़ों वाले आदमियों की खोज की हुई है, कोई विचित्र शेषनाग की भी रचना की हुई है, जो अपने सारथी को पूर्ण संरक्षण दे कर उस की रक्षा करता है। कोई बंदर के मुंह की तरह वानर रूप में ईजाद किया गया है, इसी तरह कई पेड़ भी ऐसे ही खोज डाले हैं, जिन को देव तरु कहा जाता है और कई ऐसी मणियाँ ढूंढ रखी हैं, जो चिंताओं को नष्ट कर देती है, ऐसी चिन्तपूर्णी जैसी देवियाँ भी है, जो हिंदुओं की  चिंताओं को खत्म कर देती है, मगर उस के  बावजूद भी लोग सुखी नहीं रहते हैं, तेती करोड़ देवी देवते आप को मूर्ख बनाते हैं, इन सब को त्याग कर कर्म पर विश्वास करो, इन के लिखे वेदों, पुराणों, दर्शनों शास्त्रों, ब्राह्मण ग्रँथों को नदी में फेंक कर, तुम इन का यशोगान, भक्ति और साधना करना त्याग दो, क्योंकि ये सब कुछ आदपुरष ने नहीं बनाए है, आप सभी सीधे उस निरंकार की भक्ति क्यों नहीं करते हो?
हरि हरि हरि न जपि रसना।।
अवर सभी तिआगि वचन रचना।।१।।रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि एक परमात्मा के अतिरिक्त कोई भी परिपूर्ण शक्ति नहीं है, इसलिए हिन्दू धर्म को त्याग कर आदधर्म को अपनाओ और उस की क्रांतिकारी भावना को समझो, अपनी उपजातियों को भूल जाओ और केवल मूलनिवासी कहला कर क्रान्ति मचा दो। प्रोफेसर लाल जी अपनी पुस्तक "सटीक वाणी श्री गुरु रविदास जी अते तत्त सिद्धांत"के पृष्ठ संख्या 314 पर लिखा है कि, गुरु रविदास जी महाराज रहाउ, के बीच स्पष्ट तौर से हुकुम करते हैं, कि नए धर्म के अनुसार आराधना करो। इसलिए रहाउ के बीच गुलाम और बैरागी मन की नहीं बल्कि क्रांतिकारी मन की सृजन किया गया है। सताए गए लोगों को हुक्म है, कि वे हिंदू धर्म की विचारधारा को नष्ट करके नई और खूनी क्रांतिकारी विचारधारा के अनुसार प्रभ का सिमरन कर के क्रांति मचाओ। बैरागी मन तो तब्दीली कभी नहीं लाता है। तब्दीली का अर्थ है क्रांति! सो आप क्रांति मचाने का महान काम तो जोश के साथ भरे जुरअत के साथ ओतप्रोत निर्भय मन का है। सो इस शब्द की बुनियाद क्रांतिकारी तब्दीली है। महा बुद्धिमान ब्राह्मण! तू अपनी जिह्वा से हरि को पाने के लिए सोहम का जाप क्यों नहीं करता है? क्यों आदमी द्वारा निर्मित वेदों, पुराणों आदि धर्म ग्रंथों को त्याग कर केवल आदपुरुष का ही सिमरन क्यों नहीं करता है?
नाना खिआन पुरान वेद विधि।
चौउतीस अखर माहीं।।
गुरु रविदास जी महाराज ब्राह्मणों को समझाते हुए फरमाते हैं, कि हे ब्राह्मणों! आप कल्पित विधाताओं के वेदों पुराणों के कल्पित विचारों के ऊपर क्यों विश्वास करते हो? देवनागरी लिपि के चौतीस अक्षरों में वेद व्यास आदि लेखकों द्वारा रचे गए परोपकारी साहित्य का गहन अध्ययन कर के, आपस में विचार-विमर्श करके शाश्वत सत्य को क्यों नहीं समझते हो? हरि के सिमरन के बराबर ये सभी रचनाएं व्यर्थ हैं, फिर भी तू हरि का सिमरन क्यों नहीं करता है? कल्पित साहित्य को आप क्यों महत्व दे कर के उन में लिखे गए धार्मिक विचारों को क्यों अपनी पूजा का साधन मानते हो।
बिआस विचारि कहिउ परमारथ।
राम नाम सरि नाहीं।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि जिस ब्यास ने, वेदों, पुराणों में परोपकारी साहित्य की रचना की है, वह तो राम नाम के समान नहीं है, फिर तू हे ब्राह्मण! तूँ इस पर विचार क्यों नहीं करता है? कि ये मनुष्य द्वारा रचित साहित्य अधूरा ज्ञान का भंडार है और निराकार ईश्वर का स्मरण क्यों नहीं करता है?
सहज समाधि उपाधि रहत फुनि।
बडै भागि लिव लागी।।
गुरु रविदास जी महाराज ब्राह्मण को समझाते हुए फरमाते हैं, सरल समाधि लगा कर के मन में तनिक भी दुख नहीं रहते हैं अर्थात व्यक्ति सुखी रहता है, हम तो बड़े सौभाग्यशाली हैं कि हमारी लग्न आदपुरष से लगी हुई है, तूँ भी मॉनव कृत कल्पित ग्रथों के अज्ञान से मुक्त हो कर आदपुरष से ही लिव लगाओ, तभी सुखी जीवन जी सकते हो।
कहि रविदास परगासु हिरदै धरि।
जनम मरण भै भागी।।३।।४।।
गुरु रविदास जी महाराज सारे जनमानस को समझाते हुए फरमाते हैं, कि जिस के हृदय में परमपिता परमेश्वर अर्थात आदपुरुष का दिव्य ज्योतिर्ज्ञान प्रकाशमान हो जाता है और वह आदमी उस प्रकाश को हृदय में धारण कर लेता है, उस का जन्म मरण का डर भी खत्म हो जाता है अर्थात उस आदमी को ईश्वर के दर्शन हो जाते हैं, जिस से उसे मृत्यु का कोई भय नहीं सताता है।
शब्दार्थ :--- रे-अरे, ओए आदि अन्य कई शब्द सभी आँचलिक बोलियों में शूद्रों के लिए अपमानजनक ढंग से प्रयोग किये जाते हैं।सुरतरु-देव तरु, कल्प वृक्ष, कल्पित वृक्ष जो बाधाओं को मिटाता है। चिंतामणि-चिंताओं को दूर करने वाली हिंदुओं की कल्पित मणी/पत्थर। कामधेनु-स्वर्ग में रहने वाली हिंदुओं की कल्पित गाय। चारि पदारथ-जीवन में प्रयोग होने वाले चारों पदार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। असट दसा-अठारह। नव निद्धि-हिंदुओं के नौ कल्पित खजाने। करतल-हथेलियां। जपहि-जपता है। रसना-रस लेने वाली अर्थात जीभ, जिह्वा। वचन-कथन, विचार। रचना-लिखित, लेख। नाना-अनेकों। खिआन-प्रसंग, कथा, विचार। बिधि-विधाता। चउतीस-देवनागरी लिपि के चौतीस वर्ण। बिआस-व्यास महाऋषि। परमारथ-परोपकार, परमार्थ, दूसरों का भला। सहज-सरल, स्वाभाविक। समाधि-एकाग्रता से आदपुरष का ध्यान लगाना। उपाधि-दुख, क्लेश। फुनि-दुबारा, पुनः। हिरदै धरि-मन में धारण करना।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।।।।

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