।।पढ़िए गुनिए नामु सभु सुनीए।।

 

।।।पढ़िए गुनिए नामु सभु सुनीए।।
         ।।राग रामकली वाणी।।
गुरु रविदास जी महाराज विद्या, शिक्षा, पढ़ने, लिखने और विद्वान बनने के महत्व को समझाते हुए फरमाते हैं, कि काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार और माया इतने शक्तिशाली हैं, कि मनुष्य इन का सामना नहीं कर पाता है। इन पांच विकारों से नाता तभी टूट सकता है, जब मनुष्य के मन में ज्ञान की ज्योति अर्थात ज्योतिर्ज्ञान का नेत्र खुल जाए, इसीलिए शिक्षा अर्जित करना मनुष्य के लिए बहुत जरूरी है। गुरु रविदास जी महाराज इस शब्द में स्पष्ट करते हैं, कि विकारों से मुक्ति तभी मिल सकती है, जब मनुष्य सिमरन कर के आदपुरूष से अटूट संबंध जोड़ता है।
पढ़िए गुनिए नांऊँ सभु सुनीए।।
अनभउ भाऊ न दरसै।।
लोहा कंचनु हिरन होइ कैसे।।
जउ पारसहि ना परसै।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि धोती, तिलक, लगाकर और शंख, घण्टे, घड़ियालों को बजा बजा कर, धार्मिक पुस्तकों को पढ़ने, सुनने और उन की व्याख्या कर के बड़े बड़े व्याख्यान देने से आदपुरुष की प्राप्ति नहीं हो जाती है, मन से छली, कपटी, पाखंडी, ढोंगी, व्यभिचारी और अत्याचारी होते हुए अगर कोई आदिपुरुष की कथा सुनाता है, सत्संग करता है और सद्विचार प्रकट करता है, तो वह सत्पुरुष नहीं बन जाता है। गुरु जी के अनुसार मनुष्य को जीवन में सत्य के मार्ग पर चल कर, ईमानदारी से हक, हलाल की कमाई खाते हुए, किसी को भी दुख नहीं देना चाहिए और हर समय "सोहम सोहम" जाप करना चाहिए। जहां निरन्तर "सोहम" का जाप होता है, वहां आदपुरुष स्वयं ही चल कर आता है। ऐसा गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि:---
सोहम सोहम जप लै सोहम सोहम जाप।।
सोहम सोहम जपदे लव लगेंगे आप।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि चाहे कोई कितनी ही धार्मिक पुस्तकें पढ़ ले, चाहे इन पुस्तकों का कितना ही अध्ययन और विचार मंथन करें, कितनी ही विशद व्याख्याएँ करे, आदपुरुष के कितने ही बार नाम सुने मगर निडर अनभाऊ (जिसे भय ना हो) परमपिता परमेश्वर अर्थात आदपुरुष के दर्शन नहीं होते हैं, ऐसा इसलिए नहीं होता है क्योंकि मनुष्य काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार और मोहनी माया के जाल में उलझा हुआ है, जिस के कारण वह जीवन में दर दर भटकता फिरता ही रहता है। इसलिए जिस प्रकार लोहा पारस को छुए बिना शुद्ध सोना नहीं बन सकता है, उसी तरह यदि मनुष्य सांसारिक बंधनों को तोड़ कर आदपुरुष का ध्यान नहीं लगाता है, सिमरन नहीं करता, तब तक उसे सांसारिक विकारों से मुक्ति नहीं मिल पाती है। कोई भी आदपुरुष को प्राप्त नहीं कर सकता है अर्थात उस के दर्शन नहीं कर पाता है, उस को अनुभव नहीं कर पाता है।
देव संसे गाँठि न छूटे।।
काम क्रोध माईया मद मतसर।।
इन पचूँहु मिलि लूटे।।१।।रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि हे देव! मेरे मन की शंकाओं (संदेहों, भ्रमों) की गांठ ना तो खुलती है और ना ही छूटती है। काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार पांच लुटेरों और माया और ईर्ष्या (मतसर) दोनों लुटेरियों ने मिल कर लोगों को लूट लिया है अर्थात आप के मिलन के रास्ते से भटका दिया है।
हम बड़ कबि कुलीन,
हम पंडित हम जोगी सनियासी।।
गिआनी गुनी सूर हम दाते,
इह बुद्धि कबहि न नासी।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि काम, क्रोध, मोह, लोभ अहंकार और माया से ग्रस्त जब कोई कवि और विद्वान बन जाता है, योगी और सन्यासी बन जाता है, पंडित और गुणवान बन जाता है, शूरवीर और दानी बन जाता है तो वे अपने अपने अहंकारों में डूब डूब जाते हैं, उन की ऐसी बुद्धि कभी भी नष्ट नहीं होती है अर्थात ऐसे नीच लोगों का सोच विचार और अहंकार कभी खत्म नहीं होता है और अंत में दुखी होकर के अनेकों बीमारियों का शिकार हो जाते हैं। ये लोग धरती के ऊपर ही नरक का जीवन जी कर मरते हैं।
कहु रविदास सभै नाहिं समझसि,
भूलि परे जैसे बउरे।।
मोहि अधारु नामु नाराइन,
जीवन प्राण धनु मेरे।।३।।१।।
इस बंद का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट ज्ञात होता है, कि गुरु रविदास जी महाराज देश और विदेश में घूम कर के संगत को समझाते रहे, कि काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार, माया और ईर्ष्या को छोड़ दो मगर लोग नहीं समझ सके हैं, जिस के परिणाम स्वरूप गुरु रविदास महाराज को विवश होकर के यह कड़ा फरमान जारी करना पड़ा, कि कामी, क्रोधी, मोही, लोभी अहंकारी और माया से ग्रस्त, ईर्षा से जलने वाले लोग नहीं समझ सके हैं और ऐसा लगता है, कि वे आदिपुरुष का सच्चा रास्ता भूल कर पागलों की तरह जीवन जी रहे हैं। मैंने तो अनुभव कर लिया है, कि जीवन का आधार केवल नारायण अर्थात आदिपुरुष ही है। मेरा जीवन, प्राण और धन केवल आदपुरुष ही है। उसी की कृपा दृष्टि से मैं सुखी जीवन व्यतीत कर रहा हूं। गुरु जी के इस अनुभव और वक्तव्य से ज्ञात होता है, कि गुरु जी के लाख समझाने पर भी संगत नहीं समझी और अपने अहंकार में डूब कर धरती के ऊपर ही आदियों-व्याधियों, शारीरिक-मानसिक दुखों को सहन करते हुए नरक का जीवन जी रहे हैं।
शब्दार्थ:--- पढ़िए-शिक्षा अर्जित करना, पढ़ना। गुनिए-गुणवान बनना, विद्वान बनना, विचारना। सुनीए-सुनना। अनभाऊ-जिसे भय ना हो अर्थात निडर, आदपुरुष। दरसे-दर्शन होना। कंचन हिरन-शुद्ध सोना। परसै-स्पर्श करना, छूना। संसै-शंका, शक सन्देह, भ्रम, वहम। मद-अहंकार, घमंड। मतसर-ईर्षा। बड-बड़ा। कबि-कवि, लेखक। सूर-शूरवीर, बहादुर, सूरमा। भूलि परे-भूल हो जाना, भटक जाना। बउरे-बहरे, जिन को कम सुनाई देता है। आधार- सहारा, आसरा।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।।

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