।।ऊंचे मन्दर साल रसोई।।
।।ऊँचे मन्दर साल रसोई।।
।। राग सूही।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार के वशीभूत हो कर के जब मनुष्य बड़े-बड़े महल बना लेता है, उस के बीच सुंदर-सुंदर पत्नियों को भी सजा सँवार सँवार कर रखता है, अहंकार में डूब कर जीवन के रंगों में मस्त रहता है और जब अंत में मौत आ जाती है, तब परिवार के लोग कहते हैं कि देर हो रही है, देर हो रही है, मुर्दे को जलाने के लिए ले जाओ। मृतक मनुष्य के इस आखिरी अंजाम को देख कर के गुरु रविदास जी महाराज इस शब्द में मनुष्य की दुर्दशा का चित्रण करते हुए फरमाते हैं, कि सांसारिक संबंध और रिश्ते मनुष्य के वास्तविक साथी नहीं होते हैं, मनुष्य का असली साथी ईश्वरीय प्रेम और उसकी भक्ति ही है।
ऊँचे मन्दर साल रसोई।।
इस घरी फुनि रहनु न होई।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज नश्वर शरीर के बारे में फरमाते हैं, कि हे संसार की चकाचोंध में खोए हुए मनुष्य! तू जिन बड़े-बड़े आलीशान महलों को बनाता है, सजा सँवार कर उन के बीच अत्यंत सुंदर सुंदर रसोई घर बना कर के बड़े घमंड से जीवन जीता है, जब मौत आ जाती है, तब उस घर में एक पल के लिए भी रहने नहीं मिलता है अर्थात तुरंत संसार छोड़ कर जाना पड़ता है।
इह तनु ऐसा जैसे घास की टाटी।।
जलि गईउ घासु रलि गईउ माटी।।१।।रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज, मित्रों, सगे सम्बंधियों के रिश्तों में जकड़े हुए मनुष्य को समझाते हैं, कि हे मनुष्य! तेरा शरीर घास की झोपड़ी की तरह है, जिस में जब आग लगती है तो उसकी घास जलकर राख हो जाती है और वह राख मिट्टी में मिल जाती है। मिट्टी में मिल कर, ये राख मिट्टी ही बन जाती है, इसलिए तेरा शरीर भी एक झोपड़ी की तरह है और जब उस में मौत की आग लगेगी तो उस से जल कर तेरे शरीर की भी राख हो जाएगी और वह राख मिट्टी में मिल जाएगी।
भाई बंध कुटुंब सहेरा।।
उइ भी लागे काढू सवेरा।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज धन दौलत और ऐश्वर्या में डूबे हुए घमंडी, अहंकारी मनुष्य की औकात का पर्दाफाश करते हुए फरमाते हैं, कि जब तेरी मृत्यु हो जाएगी तो तेरे परिवार के सारे सगे बहन भाई, रिश्तेदार, संबंधी, सखा, दोस्त और मित्र बस यही कहेंगे, कि बहुत देर हो गई है और इस मुर्दे को घर से निकालो।
घर की नारी उरहि तन लागी ।।
उह तउ भूतू भूतू करि भागी।।३।।
गुरु रविदास जी महाराज प्राण प्यारी पत्नी की वास्तविकता का वर्णन करते हुए फरमाते हैं, कि हे मनुष्य! जो पत्नी तेरे शरीर के साथ चिपकी रहती थी, गले के साथ लगी रहती थी, वह भी तेरे मुर्दे शरीर को देख कर भूत भूत कह कर दूर भागती है।
कहि रविदास सभै जगु लुटिआ।।
हम तउ इक राम कहि छुटिआ।।४।।३।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि यह सारा संसार मोह-माया के जाल ने लूट लिया है, मगर इस से मुक्त होने के लिए केवल सोहम शब्द ही ऐसा मूल मंत्र है, जिस का मनन करने पर परमपिता अर्थात आदपुरुष के दर्शन होते हैं। हमारा कल्याण ही केवल आदपुरष का सिमरन करने से ही हुआ है।
शब्दार्थ:--- मन्दर-बड़े बड़े ऊँचे प्रासाद, महल। साल रसोई-अति सुंदर रसोई घर। फुनि-वापस, दोबारा। रहनु-निवास। टाटी-झोंपड़ी। सहेरा-सखा संबधी। काढू-निकालो। नारि-पत्नी।उरहि-छाती से लगना। भूतू भूतू-भूत भूत। लुटिआ-ठगा गया।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।।
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