।।ऐसी लाल तुझ बिन कउन करे।।

 

    ।।ऐसी लाल तुझ बिन कउन करै।।
                  ।।राग मारू।।
गुरु रविदास जी महाराज ने अपने जीवन काल में भारत में शांति स्थापित करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया था मगर ब्राह्मणों ने, कदम कदम पर रोड़े अटकाए इसीलिए उन्होंने खूनी क्रांति का आह्वान किया था, जो जो कार्य उन्होंने किए हैं, उनका सीधा संबंध खूनी क्रांति से था। उस समय धोती, तिलक और शंख बजाने का तात्पर्य था खून। क्योंकि भारतवर्ष के गुलाम मूलनिवासियों को कोई किसी किस्म की पूजा, पाठ और तपस्या करने का अधिकार नहीं था, इसीलिए मूलनिवासी भक्ति नहीं कर सकते थे। मनुस्मृतियों के अनुसार ही शासन चलता था, जिस का विरोध विश्व के इतिहास में पहली बार गुरु रविदास जी महाराज ने ही किया था।गुलामी, छुआछूत और वर्ण व्यवस्था के खिलाफ केवल उन्होंने ही सर्प्रथम आवाज उठाई थी और उस को समाप्त करने के लिए वे स्वयं रणभूमि में आ गए थे, इसीलिए उन्होंने चार वर्ष की आयु में धोती, तिलक लगा कर शंख बजाया था। यही नहीं पूजा पाठ करके भी ब्राह्मणों के तंबू में आग लगा दी थी, जिस के परिणाम स्वरूप गुरु जी को अनेकों दुखों और मुसीबतों को झेलना पड़ा था। अनेकों ही परीक्षाओं में से गुजरना पड़ा था, मगर सत्य के पुजारी, तर्क के धनी गुरु रविदास जी महाराज सभी परीक्षाओं में जीत कर सारी दुनिया में छा गए थे। जब गुरु जी ने ब्राह्मणों के आग्रह पर अपने देवताओं को पानी में तैराने की शर्त स्वीकार कर ली थी। जब ब्राह्मणों के पवित्र देवता नदी में डूब गए थे, तब उन्होंने अपने प्रिय अनुयायी बुआ के पुत्र रैदास जी के जूते बनाने वाली पत्थर की शिला नदी में फेंक कर तैरा दी थी, जिस से ब्राह्मण पूरी तरह शिकस्त खा कर शर्मिंदा हो गए थे परंतु राजा नागरमल के आदेश पर ब्राह्मणों को गुरु जी को पालकी में बैठा कर, कंधों के ऊपर सुनहरी छतर के नीचे सुशोभित कर के सारे काशी शहर में शोभायात्रा निकालनी पड़ी थी, जिस हसीन और ऐतिहासिक दृश्य को देख कर गुरु जी मन में सोच रहे थे, कि ऐसा सर्वोच्च, सर्वश्रेष्ठ मान सम्मान केवल और केवल परम  पिता परमेश्वर अर्थात आदि पुरुष ही दे सकता है, इसलिए इस शब्द में गुरु रविदास जी महाराज ने अपने अनुभव और विचारों को बड़ी शालीनता के साथ प्रकट है।
ऐसी लाल तुझ बिन कउन करै।।
गरीब निवाजु गुसैंईयां मेरा,
माथै छत्र धरै।।१।।रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, जब जूते बनाने वाली गंदी सिला को नदी में तैरा दिया था और जीत गए तब उन को राजा नागरमल ने सिर के ऊपर मुकुट लगा कर, राजगुरु की उपाधि से विभूषित कर दिया था और पालकी में बैठा कर उन के सिर के ऊपर छतर सुशोभित कर के, ब्राह्मणों के कंधों पर पालकी में बैठा कर सारे काशी शहर में शोभा यात्रा निकाली थी, उस शानदार दृश्य को देख कर के, गुरु रविदास जी महाराज ने, आदपुरुष को संबोधित करते हुए कहा, कि हे मेरे गरीबों को सम्मानित करने वाले आदपुरुष! जो मान सम्मान आज आप ने अछूत होने पर सुसज्जित पालकी में बैठा कर सिर के ऊपर सुनहरा रंग बिरंगा छतर सजा कर मेरा सम्मान किया है, ऐसा सम्मान आप ही दिला सकते हैं। आप के बिना ऐसा कोई भी नहीं कर सकता है।
जा की छोति जगत कउ लागे,
ता पर तूही ढरै।।
नीचहूँ ऊँच करै मेरा गोविंदु,
काहू ते न डरै।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि जिस के स्पर्श करने मात्र से ही छुआछूत सारे संसार को लग जाती है, आप उसी के ऊपर प्रसन्न हो कर दयावान हो गए हो। ऐ मेरे गोविंद अर्थात आदि पुरुष! आप ही सत्पुरुषों को मिट्टी से उठा कर फूलों के ऊपर रख सकते हैं। आप ही नीच और अछूत को ऊंचे दर्जे पर बैठा सकते हैं। आप ऐसा करने पर किसी से नहीं डरते हैं।
नामदेव कबीर तिलोचनु,
साधना सैंन तरै।।
कहि रविदास सुनहु रे संतहु,
हरि जीऊ ते सभै सरै।।२।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज ने इन पंक्तियों में भूत काल के अत्याचारों का भी मार्मिक जिक्र किया है क्योंकि सतगुरु नामदेव सतगुरु कबीर साहेब, सतगुरु त्रिलोचन जी ,सतगुरु साधना जी सतगुरु सेन जी, के साथ जो दुर्व्यवहार ब्राह्मणों ने किया था और उन को अनेकों यातनाएं दी थी, उस के बावजूद भी सतगुर नामदेव जी, सतगुरु कबीर साहिब जी, सतगुरु तरलोचन जी, सतगुरु सेन जी, सतगुरु साधना जी को भी आप ने सहारा दे कर उनका कल्याण किया था, वे सभी भवसागर में तैर कर पार हो गए थे। गुरु रविदास जी कहते हैं, हे संतो! आदपुरुष सब कुछ करने में समर्थ है।
शब्दार्थ:--- लाल-मॉन, सम्मान इज्जत बढ़ाना, सम्मानित करना, मूर्खों को मूर्खता का अहसास करवा कर विद्वानों का सिर ऊँचा करना। गरीब निवाजु- गरीबों को सम्मान देने वाला। गुसईआँ-आदिपुरुष। छत्र धरै-छत्र धारण कर के चलने वाला शनहंशाह। छोति-छुआछूत। ढरै-पिघलना, विनम्र होना। दया करना। निचहु-निम्न स्तर, जिन्हें मनुवादी अपने से निचले स्तर का समझते हैं। सभै सरै-सब कुछ करने में समर्थ, परिपूर्ण।

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