।।जो दिन आवहि सो दिन जाही।।
।।जो दिन आवहि सो दिन जाहीं।।
।। राग सूही।।
गुरु रविदास जी महाराज मनुष्य के जीवन की अटल सच्चाई का स्पष्ट शब्दों में वर्णन करते हुए फरमाते हैं, कि हे मनुष्य! जो दिन आ रहा है, वह बीतता जा रहा है, यहां पर कोई भी स्थाई रूप से नहीं रह सकता है, एक दिन इस संसार को छोड़कर के यहाँ से प्रस्थान करना ही पड़ेगा। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, हे मनुष्य! तेरी मंजिल बहुत दूर है अर्थात आप को बहुत दूर जाना है, सिर के ऊपर हर समय मौत खड़ी है, ना जाने कम मृत्यु हो जाए, इसलिए सांसारिक मोह माया को त्याग कर, आदपुरष को भी स्मरण किया कर।
जो दिनु आवहि सो दिनु जावहि।।
करना कूच रहन थिरु नाहिं।।
संगू चलत है हम भी चलना।।
दूरी गवनु सिर उपरि मरना।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि ये अटल सच्चाई है, कि जो दिन आता है, वह बीत कर समाप्त होता जाता है और हमेशा होता ही रहेगा, अर्थात जब सूर्य निकलता है, तो उसने शाम के समय अस्त होना ही है। इसी तरह जो मनुष्य जन्म लेता है, उसे मरना ही पड़ता है। क्योंकि यह संसार नश्वर है। यहां जो भी जीव जन्म लेता है, उस को एक दिन यह संसार छोड़ना पड़ता है और मृत्यु को प्राप्त होना ही पड़ता है। जो हमारे साथ धरती पर आए हैं अर्थात जिनका जन्म हमारे साथ हुआ था, वे प्रतिदिन जा रहे हैं उन के साथ हम को भी जाना ही पड़ेगा। तेरी मंजिल दूर है, मृत्यु के दूत सिर पर खड़े हैं, पता नहीं वे कब आ जाएंगे, वे बारी बारी जीव को लेते जा रहे है।
किआ तू सोईआ जागु ईआना।।
तै जीवनु जगि सचु करि जाना।।१।।रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज जीवन के अटल सत्य जन्म और मृत्यु के बारे में मानव को सचेत करते हुए फरमाते हैं, कि हे मनुष्य! तू क्यों अनजान बना हुआ है? तू क्यों अज्ञानता की नींद में सोया हुआ है? क्यों सांसारिक जीवन और जगत को सच मान बैठा है? अर्थात यह जीव जगत मिथ्या है और एक दिन इसको नष्ट होना ही है, इसलिए तू संसार की मौजमस्ती और ऐशो आराम को त्याग कर के आदपुरष की शरण में चला जा।
जिनि जीऊ दिआ सू रिजकु अबरावै।।
सभ घट भीतरि हाटु चलावै।।
करि बन्दगी छाड़ि मैं मेरा।।
हिरदै नामु समारी सवेरा।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज मनुष्य की कमजोरियों को समझाते हुए फरमाते हैं, कि हे मनुष्य! तू क्यों धन संग्रह में लगा हुआ है? क्यों आने वाली पीढ़ियों के लिए धन दौलत इकट्ठा करता रहता है? जो आदपुरुष जीवन और जन्म देता है वह जीव के लिए अथाह अन्न का भंडार पहले ही भर देता है। वह सभी के शरीरों (घट) में ही बाजार (हाट) चला देता है, इसलिए तू बंदगी करके आदपुरुष की पूजा अर्चना करते हुए, मैं और मेरा कहना छोड़ दे और हृदय में उस परम पिता परमेश्वर अर्थात आदपुरष का नाम संभाल ले और और उसका सिमरन करते हुए जीवन के सवेरे का शुभारंभ कर दे।
जनमु सिरानो पंथु न सवारा।।
सांझ परी दह डिस अंधियारा।।
कहि रविदास निदानी दिवाने।।
चेतसि नाही दुनिआ फ़नखाने।।३।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज मनुष्य को सांसारिक मोह माया के जाल की अटल सच्चाई के बारे में फरमाते हैं, कि हे नादान, अनजान मनुष्य! तेरा जीवन समाप्त होता जा रहा है और तुमने अपने जीवन के रास्ते को स्वच्छ, साफ नहीं किया है, तनिक भी संवारा नहीं है और अब तो शाम का समय आ गया है अर्थात मृत्यु का समय आ गया है। दसों दिशाओं में चारों ओर अंधेरा छा रहा है मगर तूने नश्वर संसार को ना तो समझा और ना ही पहचाना है।
शब्दार्थ:--- कूचु-जाना। थिरु-स्थिर, पक्का।नाही-नहीं। संगू-साथी। गवनु-जाना, प्रस्थान।
किआ-क्या। ईआना-अनजान। जिनि-जिस। जीऊ-जिंदगी, जीवन। अंबरावै-प्रदान करना, पहुँचाना। घट-मन, शरीर। समारी-संभालना। सवेरा-सुबह। सिरानो-समाप्त होना, मिटना। पंथ-मत, रास्ता। सांझ-शाम का समय। दहदिस-दस दिशाएं।अंधियारा-अंधेरा, अंधकार, अज्ञानता। निदानि-अहलड़पन, नासमझी।फ़नखाना-नश्वर, नाशवान।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।।
Comments
Post a Comment