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Showing posts from August, 2020

गुरु रविदास और हिंदी गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ संस्करण।।

गुरु रविदास और हिंदी गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ संस्करण।। गुरु रविदास जी महाराज ही, संसार में,एक ऐसी शक्ति हुई है जिसने, खूंखार बादशाहों की खूनी तलबारों को रोक कर, भारत में रह रहे यूरेशियन लोगों के प्राणों की रक्षा की है, मगर जब से अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए, तब से ही, बाकी बचे यूरेशियन, भारत के आदवंशी, मूलनिवासियों को अपनी दादागिरी दिखाने लगे हुए है। जब मैंने, पंजाब के आनंदगढ़-महिलांवाली में, गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ का पंजाबी से हिंदी में अनुवाद करके, हिंदी के प्रथम संस्करण का जब शुभारंभ किया था, उस दिन से ही पंजाब में भूचाल आ गया कि, गुरु रविदास जी के अनुयायियों ने नए ग्रँथ का प्रकाश करके पंजाब में वहुजन समाज को सिखों से अलग कर दिया है। पंजाब के मनुवादी लोगों को भयंकर खतरा हो गया कि, अब मूलनिवासी हमारी गुलामी को सहन नहीं करेंगे। पहले तो हमें मनुवादी अपने मन्दिरों गुरुदुआरों में प्रवेश करने ही नहीं देते थे, प्रवेश करें भी तो माब्लिंचिंग करते आए हैं। ये कितने धार्मिक लोग हैं, इनके कारनामों से ज्ञात हो जाता है। जो मनुवादी लोग धर्म के ठेकेदार बने हुए हों, फिर सच्चे मन से भगवान का नाम जपने वालों क...

गुरु रविदास जी का आदिधर्म अपनाना क्यों जरूरी?

गुरु रविदास जी का आदिधर्म अपनाना क्यों जरूरी? गुरु रविदास महाराज ने आजीवन, वहुजन समाज की एकता, अखंडता, मान-सम्मान और वहुजन राज की स्थापना के लिए ही, अर्पित कर दिया था, मगर कुछ मनुवादी वहुजन समाज के राजनेता और धर्म नेता जो मनुवाद के दल्ले दलाल बन कर, उन के द्वारा, मुंह में डाली गई हड्डियां चूसते आ रहे हैं और वहुजन समाज के नाम पर कलंक बन कर, वहुजन लोगों के हितों को बेच कर खाते आ रहे हैं, जिसका परिणाम सुप्रीमकोर्ट ने, पच्चीस अगस्त को,आरक्षण खत्म करके निकाल दिया, आरक्षण का खून चूसने वाले सांसदों और विधायकों की जमीर ने सामूहिक त्यागपत्र देने की हिम्मत तक नहीं की। इन लोगों ने आरक्षण अपने परिवार की गरीबी को मिटाने के लिए, तेज हथियार बनाया हुआ है, मगर आरक्षण की रक्षा करने के लिए तैयार नहीं है। गुरु रविदास जी ने राजा नागरमल, राजा पीपा से, आज से पांच सौ साल पहले ही अछूतों के लिए आरक्षण, मन्जूर करवाया था लेकिन उसकी नालायक औलादें, संसद और विधानसभाओं में बैठ कर, आरक्षण को बचा नहीं सकीं, अगर इन्होंने माँ का दूध पिया होता तो, पच्चीस अगस्त को ही सामुहिक त्यागपत्र देकर, बेईमान जजों की औकात दिखा देते, इ...

गुरु रविदास प्रदत्त गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ से इतराज क्यों?

।।गुरु रविदास प्रदत्त गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ से इतराज क्यों? गुरु रविदास जी ने, भारतवर्ष में, जन्म ही समतावादी समाज बनाने के लिये लिया था, क्योंकि भारत युरेशियनों के पाशविक अत्याचारों के कारण कत्लगाह, बूचड़खाना बन चुका था। ब्राह्मणों के अत्याचारों की सीमा खत्म ही चुकी थी। शूद्रों से काम तो लिया जा सकता था, मगर ये कहाँ की इंसानियत थी कि, काम के बदले में खाने को केवल लस्सी, साग जिसका भी कोई स्वाद नहीं, वह भी मनुवादियों के घरों से दूर बैठे हुए मूलनिवासियों को, दूर से फेंका जाता था। पानी भी आठ आठ फुट लंबे बांस से बने पुल से फेंक कर पिलाया जाता था, काम अथाह लेने के बाद, उन्हें फिर छोटी मोटी गलती के लिए पीटा जाता था, जब भी किसी देवता को खुश करना होता था तो बलि के नाम पर शूद्र को काटा और मारा जाता था। ये आजादी से पहले की बात है, मगर आज फिर स्वतंत्र भारत में, अछूतों, मुसलमानों को माब्लिंचिंग में, दस बीस लोग छाती पर चढ़ कर मार रहे, कोई छुड़ाने की हिम्मत नहीं करता, कोई पुलिस वाला बचाने के लिए तैयार नहीं, कोई अखबार लिखने को तैयार नहीं, उलटे जो पर्चा कटाने जा रहे हैं, उन्हीं लोगों पर केस दर्ज किए जा रह...

गुरु रविदास के सेवकों की परेशानियां।।

।।गुरु रविदास के सेवकों की परेशानियां।। गुरु रविदास जी की शक्ति के सामने गुरु नानकदेवजी ने कभी अपने आपको उच्च नहीं माना था, गुरु अर्जुनदेव जी महाराज ने गुरु रविदास जी को सर्वोच्च गुरु स्वीकार किया है फिर जिन्होंने सिखधर्म के गुरु ही नहीं अवतार गुरु नानकदेव जी को बनाया, उन्हीं के सिख, गुरु रविदास जी को, भगत लिखें और कहें, क्या ये न्यायसंगत है? जब मैं, 2008 में गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ ट्रष्ट आनंदगढ़ का महासचिव चुना गया तब मुझे पहली बार, स्टेज को हैंडल करते समय अनुभव हुआ कि, गुरु रविदास जी के, जीवन चरित्र को जिस ढंग से, सिखों ने दर्शाया है, वह गुरुओं के गुरु रविदास जी से अन्याय है। जब वहां सन्त सम्मेलन में, पंजाबी जत्थे गुरु रविदास जी के, शब्द गाते थे और उसमें गुरु जी को जूतियाँ गंडें कहें, तो मुझ से बर्दास्त नहीं होता था मगर मैंने उन्हें स्पष्ट आदेश ही दे दिया, भाई यहां जूतियाँ गंडे गुंडे नहीं चलेगा, अगर गाना हो तो गुरु नानकदेव जी के "गुरु" को, गुरु पुकारना होगा अन्यथा यहां आकर, हमारा ही सिर और हमारी जूतियाँ नहीं चलेगी, तब सिख ढाडी जत्थे और रागी रागनों ने भगत शब्द कहना छोड़ा। जब मैं...

गुरु रविदास और आदिप्रकाश ग्रँथ की मान्यता के प्रमुख कारण।।

गुरु रविदास और आदिप्रकाश ग्रँथ की मॉन्यता के प्रमुख कारण। गुरु रविदास जी महाराज के साथ, जिस किसी का हाथ स्पर्श हो जाता था, वह भी बहुमूल्य हीरा बन जाता था, जिसने भी गुरु रविदास जी की वाणी कानों से तनिक भी सुनी वह भी सुखी हो जाता था। बालक गुरु नानकदेव जी ने रास्ते से गुजरते हुए ही कानों से गुरु जी की वाणी "को बनजारों राम कू, मेरा टांडा लादिया जाई रे" को सुना था और उसी के कारण व्यापारी परिवार का बेटा व्यापारी ना बन कर, अवतार बन गया, फिर इससे बड़ा कौतुक देखने के लिए और क्या हो सकता? उस समय तो सत्संग के लिये काव्यात्मक, सुरीले, धुंन वाले शब्द नहीं थे मगर गुरु रविदास जी, ऐसी रचनाएं रच रहे थे कि, जिन्हें सुन कर नेचर भी कुछ पलों के लिए चलने से रुक जाती थी। गुरु नानकदेव जी जब गुरु रविदास जी के दर्शन करने कांशी गए थे, तभी वे, पवित्र चालीस शब्द और एक दोहा लिखकर ले आए थे, जिनका वे हररोज मधुर लय में गायन करते थे। कीर्तन करते थे, सत्संग करते थे, जिन्हें बाद में सिखों के कल्याणार्थ, जीवन को सफल बनाने के लिए, सबसे पहले, पूज्य गुरु ग्रँथ साहिब में शामिल किया गया था, उन्हीं गुरु रविदास जी महारा...

गुरु रविदास के आदिधर्म का समर्थन विश्व साधु संप्रदाय ने क्यों किया?

गुरु रविदास के आदिधर्म का समर्थन विश्व साधु संप्रदाय ने क्यों किया। गुरु रविदास जी ने आजीवन एक मूलमंत्र, एक वैश्विकधर्म, एक वैश्विक धर्मग्रंथ, एक वैश्विक सरकार की स्थापना के लिये ही अपने मन मष्तिष्क को केंद्रित कर रखा था, जिसमें वे पूर्ण सफल रहे थे। आदर्श बेगमपुरा की ऐतिहासिक स्थापना को भी बादशाह सिकन्दर लोदी और बादशाह बाबर से करवा लिया था। गुरु रविदास जी के ज्योतिर्लीन हो जाने पर भारत में कोई भी साधु सन्त, उनके समान शक्तिशाली नहीं रहा तो, जिस का नाजायज लाभ उठाकर ब्राह्मणों ने, गुरु रविदास जी का सारे का सारे इतिहास खत्म कर दिया था और सारा साहित्य जला दिया था, जिसका उल्लेख कानपुर के इतिहासकार रामचरण कुरील जी ने गुरु रविदास जी की "सत्य कथा" में वर्णन अठाहरवीं शताब्दी में किया हुआ है। उन्होंने लिखा हुआ है कि, गुरु रविदास महाराज का कांशी में स्वर्ण मंदिर भी था, जिसे ब्राह्मणों ने नष्ट भ्रष्ट कर दिया था मगर, गुरु नानकदेव जी, गुरु रविदास जी के पोथीसाहिब का कुछ अंश अपने पास ले आए थे, जिसे पंजाब में सुरक्षित रखा हुआ था, जो गुरु ग्रँथ साहिब में दर्ज किया गया है, आज हमें यही गुरु रविदा...

गुरु रविदास के आदिधर्म का समर्थन, विश्व साधु संप्रदाय ने क्यों किया?

गुरु रविदास के आदिधर्म का समर्थन विश्व साधु संप्रदाय ने क्यों किया। गुरु रविदास जी ने आजीवन एक मूलमंत्र, एक वैश्विकधर्म, एक वैश्विक धर्मग्रंथ, एक वैश्विक सरकार की स्थापना के लिये ही अपने मन मष्तिष्क को केंद्रित कर रखा था, जिसमें वे पूर्ण सफल रहे थे। आदर्श बेगमपुरा की ऐतिहासिक स्थापना को भी बादशाह सिकन्दर लोदी और बादशाह बाबर से करवा लिया था। गुरु रविदास जी के ज्योतिर्लीन हो जाने पर भारत में कोई भी साधु सन्त, उनके समान शक्तिशाली नहीं रहा तो, जिस का नाजायज लाभ उठाकर ब्राह्मणों ने, गुरु रविदास जी का सारे का सारे इतिहास खत्म कर दिया था और सारा साहित्य जला दिया था, जिसका उल्लेख कानपुर के इतिहासकार रामचरण कुरील जी ने गुरु रविदास जी की "सत्य कथा" में वर्णन अठाहरवीं शताब्दी में किया हुआ है। उन्होंने लिखा हुआ है कि, गुरु रविदास महाराज का कांशी में स्वर्ण मंदिर भी था, जिसे ब्राह्मणों ने नष्ट भ्रष्ट कर दिया था मगर, गुरु नानकदेव जी, गुरु रविदास जी के पोथीसाहिब का कुछ अंश अपने पास ले आए थे, जिसे पंजाब में सुरक्षित रखा हुआ था, जो गुरु ग्रँथ साहिब में दर्ज किया गया है, आज हमें यही गुरु रविदा...

गुरु रविदास जी और साधु संप्रदाय व आदिधर्म।

।।गुरु रविदास जी और साधु संप्रदाय व आदिधर्म।। गुरु रविदास जी महाराज, आदिधर्म के एकछत्र सर्वोच्च, सर्वश्रेष्ठ अवतार हुए हैं जिनकी सत्ता को कोई भी चैलेंज नहीं कर सकता है। भविष्य तय करेगा कि, भारत की पवित्र भूमि पर ही, आदिपुरुष के रूप में गुरु रविदास जी ही प्रकट हुए हैं, भले ही ब्राह्मणों ने गुरु रविदास जी को जातीयता के अमानवीय कलंक से, उनके सर्वोच्च सम्मान को ग्रहण लगाया हो, मगर वह दिन दूर नहीं, जब ये ब्राह्मण अपने दुष्कर्मों की सजा अवश्य भुगतेंगे। आदिधर्म आदिपुरुष द्वारा स्थापित, आदिवंशी आदिवासियों का आदिकाल से चला रहा धर्म है, जिसे कोई भो धूमिल नहीं कर सकता है, क्योंकि ये स्पष्ट सत्य है:----- आद से परगट भयो, जा को ना कोउ अंत। आदधर्म रविदास का,जाने बिरला सन्त।। गुरु रविदास जी महाराज के, आदिधर्म के इस कथन ने, विश्व साधुसंप्रदाय को अपनी ओर आकृष्ट कर लिया है, इसके अध्यक्ष सन्त कुलबन्त जी भरोमाजरा और उनके साथी सन्तों ने , गुरु रविदास की सरपरस्ती में, आदिधर्म को जन जन तक पहुंचाने के लिये कमर कस ली है, सन्त कुलबन्त जी ने तो, गत दिवस, अपने सभी लाखों, हजारों समर्थकों के साथ, ऐलान कर दिया है कि,...

गुरु रविदास जी और आदिधर्म का वर्तमान इतिहास

गुरु रविदास जी और आदिधर्म का वर्तमान इतिहास।। गुरु रविदास जी के वैश्विक आदिधर्म की पुनः आधारशिला रखने के बारे में, साहिबे कलाम मंगूराम मुगोबाल जी ने, अनुकूल समय मिलते ही, अंग्रेजी हकूमत को भी, विश्व आदिधर्म की जानकारी दे दी थी। चार मार्च सन 1932 को फ्रेंचाइज कमेटी ने भारत के सभी धर्मों के प्रतिनिधियों के साथ वार्ता शुरू कर दी थी, ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त कमीशन के अध्यक्ष, लार्ड लोथियन के आदेशानुसार लाहौर पुलिस ने, आदिधर्म के आंदोलनकारियों को छाया में बैठा दिया। मंगूराम जी अध्यक्ष पंजाव आदिधर्म मण्डल, महासचिब हजारा राम बीडीओ, मिस्त्री लभूराम, सेठ सुंदर दास, भगत गुलाबा राम, श्री गणेश जी दलपति, सन्तराम आजाद, हकीम प्रताप चंद जी महाराज, हरनाम दास जंडाली, श्री साहिबा राम, खड़कू राम जमादार, किरपा राम जी, सुंदर सिंह, गुरदित जी, लाल चंद, पूर्ण चंद रमता, भुल्ला सिंह फौजी असेंबली हाल में चले गए। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी धर्मों के प्रतिनिधियों से वही सवाल पूछे गए जिन की कल्पना डाक्टर भीमराव अंवेदकर ने की थी। लार्ड लोथियन ने सभी से पूछा, कि आप कौन हैं, आप का धर्म क्या है, आपके अवतार कौन कौ...

गुरु रविदास जी, को अवतार में कर आदिधर्म क्यों बनाना पड़ा?

।।गुरु रविदास जी को अवतार मानकर आदिधर्म क्यों बनाना पड़ा? गुरु रविदास जी की संगत को, ब्राह्मणों ने सन 1911 ईस्वी के भूमि आराजी एक्ट को थोंप कर बेजमीन कर के रखा हुआ था, बेघर करके रखा हुआ था, कंगाल बना कर रखा हुआ था, बेजुवां ही नहीं लाचार बना कर रखा हुआ था, बेइज्जत बना कर रखा हुआ था,आजादी थी तो केवल गन्दगी उठाने की, मरे हुए पशुओं को कंधों पर उठाकर चीड़फाड़ करके, चमड़ा उतारने की, गन्दे चमड़े को साफ करके जूते बना कर, ब्राह्मणों को पहनाने की, खाने के लिए मरे हुए पशुओं के मरे हुए मास को खाने की, ब्राह्मणों की टट्टी को टीन में भर कर, सिर पर उठाकर दूर गन्दे नालों में जा कर फेंकने की, सड़कों गलियों को साफ, स्वच्छ करने की तो पूर्ण आजादी थी, मगर स्वच्छ खाने की, स्वच्छ पीने की, स्वच्छ कपड़े पहनने की, लाल रंग के परिधान और कपड़े पहनने की, सुंदर आभूषण पहनने की, आकर्षक श्रृंगार करने की बोलने की, लिखने की, पढ़ने की, कथा सुनने की, प्रवचन करने और सुनने की, आजादी हरिगज नहीं थी और कोई ऐसा करे तो कानों में पिघला हुआ सिक्का डाला जाता, मुंह मे उबलता हुआ गुड़ डाला जाता, नदियों में वहाया जाता, देवताओं को खुश करने के लिए ...

गुरु रविदास जी, विश्व के सर्वोच्च महायोद्धा हुए हैं।

।। गुरु रविदास जी, विश्व के सर्वोच्च महायोद्धा हुए हैं।। गुरु रविदास महाराज का संपूर्ण जीवन, मानवता की रक्षा का प्रतीक बन गया था, अगर ये कहा जाए कि गुरु जी कास्ट क्रीड, धर्म-अधर्म, छूत-अछूत, उच्च-निम्न की वर्ग की दीवारों को ध्वस्त करने वाले मसीहा हुए हैं तो कोई भी अतिश्योक्ति नहीं होगी। गुरु जी ने, अपना नाम देदीप्यमान,करने के लिए, अछूतों का एकछत्र मसीहा बनने के लिए, अछूतों की समस्याओं का निवारण करने के लिए, उस का श्रेय लेने का कोई भी काम नहीं किया है, वे तो सामाजिक अत्याचारों, छलों, कपटों, बुराईओं को ध्वस्त करने के लिये चट्टान बन कर, शासन के आगे अड़ गए थे, उनके समक्ष जो भी कातिल,अत्याचारी-हितकारी-व्याभिचारी, पंडा-पुजारी,मोलामा-मुल्ला, पादरी-चर्चिल अड़े थे सब झड़ गये थे, बस बचा वही जो सत्य को पहचान गया, ईमान को अपना गया, तर्क को समझ गया, इंसानियत को भांप गया, बुराइयों के बाद अच्छाइयों का प्रतीक बन गया। गुरु जी का समय ऐसा था कि, पण्डे-मुल्ले, पुजारी-हितकारी, मौलाने-पादरी, ब्राह्मण -शेख, राजे-महाराजे, बेगम-बादशाह सभी विलासी जिंदगी जी रहे थे, और ये सभी धर्म के अंधे, पाप के धंधे की चादर ओढ़ कर,...

गुरु रविदास जी महाराज, अद्वितीय कवि।

।।गुरु रविदास जी महाराज, अद्वितीय कवि।। गुरु रविदास जी के संपूर्ण काव्य जगत को खोल कर अध्ययन किया जाए तो कोई भी कवि उनका सामना नहीं कर सकता हैं।कोई भी उनकी काव्य प्रतिभा के सामने टिक नहीं सकेगा। केवल यही नहीं समूचा साहित्य जगत चाहे वे लेखक,नाटककार, उपन्यासकार एकांकीकार कहानीकार ही क्यों ना हों मगर गुरु रविदास जी की काव्य कुशलता के सामने कोई बजन नहीं रखते। गुरु रविदास जी आज से पांच सौ साल पूर्व हुए हैं, उनके समकालीन, श्रेष्ठ कवियों की कविताओं से, तुलनात्मक अध्ययन किया, उन की शब्द रचनाओं से, तुलना की जाए कि, सभी ने अपनी जवानी के रंगीन पलों की परछाइयों में जीवन व्यतीत किया है, रंगीन सौंदर्य का लुत्फ उठाया है, रंगीन नायिकाओं की विकृत छटाओं को मन मे जज्ब किया था, वालपन की अदाओं को खुद किया है और देख कर उनका आनंद लिया है तभी तो, उनकी रचनाओं में उनके हाव भावों का चित्रण उन कवियों ने किया क्यों, रामचन्द्र शुक्ला जी कहते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है मगर मैं तो ये भी कहता हूं कि" साहित्य में कवि लेखक भी छुपा हुआ होता है" क्योंकि साहित्यकार जो कुछ लिखता है, वह सारे का सारा उसका ...

गुरु रविदास जी, आदर्श गृहस्थी हुए हैं।

।।गुरु रविदास जी, आदर्श गृहस्थी हुए हैं।। गुरु रविदास जी महाराज ने, अपने परिवार के बीच में ही रह कर, आदर्श पति, आदर्श पिता, आदर्श पितृभक्त, आदर्शगुरु, आदर्श समाजसुधारक, आदर्श कवि एवं लेखक एवं साहित्यकार,आदर्श संगीतकार, आदर्श धार्मिक और राजनीतिक नेता के रूप में जीवन जिया है। गृहस्थ जीवन तो, ईसा मसीह ने भी जिया, मगर, अपने शरीर को बचा नहीं पाए और परिवार को तन्हा छोड़ कर चले गए, सँगत को असहाय अवस्था में छोड़ कर चले गए। पारिवारिक जीवन तो पैगंबर मुहम्मद ने भी जिया मगर जिन मान मर्यादाओं में गुरु रविदास महाराज ने जीवन जिया, वैसा जीवन उनका भी नजर नहीं आता मगर गुरु रविदास जी के जीवन की ओढ़नी पर सांसारिकता का रंच मात्र भी बदनुमा दाग नही मिलता है। गृहस्थी तो बुद्ध भी हुए मगर वह भी, पत्नी वच्चे को, घर में विलखते हुए छोड़ कर, अपनी सुख शान्ति की खोज के लिए वनों में चले गए। आदर्श पुत्र:----गुरु रविदास जी, ही विश्व में ऐसे बेटे हुए हैं, जिन्होंने अपने मातापिता का नाम सूर्य चांद की तरह रोशन किया है।जन्म लेते समय ही अंधी दाई को नेत्रदान देने वाले पहले अवतारी पुत्र वही हुए हैं। उसके बाद निर्जीव खिलौनों में भी...

गुरु रविदास जी, सर्वश्रेष्ठ संगीत सम्राट।।

।। गुरु रविदास जी, सर्वश्रेष्ठ संगीत सम्राट।। गुरु रविदास जी वहुआयामी, वहुप्रतिभा संपन्न क्रांतिकारी संगीतज्ञ, संगीत सम्राट हुए हैं, जिनके समक्ष, कोई भी वैज्ञानिक, धार्मिक, राजनैतिक नेता ठहर नहीं सकता है। जिस के प्रमाण प्रत्यक्ष, नृशंस बादशाह सिकन्दर लोदी, कातिल बादशाह बाबर हमारे सामने है। ब्राह्मणों की क्रूरता और मूर्खता तो जगज़ाहिर है ही, जिन्होंने मासूम दयालू राजाओँ और महाराजाओं को भी पुठठी पट्टी पढ़ा पढ़ा कर, इंसान से हैवान बना कर, राजपूतों को राजपूतों से लड़ा लड़ा कर, अकारण युद्धों में लड़ा-लड़ा कर शहीद करके, खुद एकछत्र शासन किया है, जिसे तत्कालीन अनपढ़ शासक समझ नहीं पाए थे, जिसके कारण भारत लंबे समय तक मुसलमानों और अंग्रेजों का गुलाम हो गया था। इन लोगों ने तीनों वर्णों को आपस में बुरी तरह लड़ाए रखा और खुद निठठले बन कर आनंदमय, सुखमय जीवन जीते रहे। प्रजा इन नृशंस भेड़ियों की शिकार होती रही मग़र ये लोग भेड़ियों की तरह जनता की मार काट करके नोच कर खाते रहे। गुरु रविदास की चमत्कारी वाणी:---गुरु जी की वाणी, किसी बिजली के करंट से कम नहीं थी, जब भी वे शव्द गायन करते थे, तब खूनी कातिल भी पिघल कर मोम बन...

गुरु रविदास महाराज और राग रचना।

।।गुरु रविदास महाराज और राग रचना।। गुरु रविदास जी ने, विश्व में अदभुत काव्य रचना की अद्वितीय मिसाल प्रस्तुत की हुई है, जिसका विश्व में कोई सानी नहीं है, एक शव्द के अलग अलग अर्थ, अगर ढूंढने हों तो, केवल गुरु रविदास जी की वाणी में ही मिलेंगे। गुरु जी ने राग सिरी में शव्द लिखा है कि:-- "तोही मोही मोही तोही अंतरू कैसा?" "कनक कटिक, जल तरंग जैसा।।" गुरु जी पहले अर्थ में, क्रान्ति की चिंगारी छोड़ते हुए ब्राह्मणवाद की सूखी घास की झोंपड़ियों में फेंकते हुए फरमाते हैं कि, हे मनुवादी! तेरे मेरे, मेरे तेरे बीच ये किस प्रकार का भेदभाव है। ये ऊँच नीच, छूत अछूत, छोटे बड़े का क्या अंतर है, जबकि तेरा मेरा कंचन (मांस) और हड्डियां एक जैसे ही हैं। एक जैसा ही खून तेरे और मेरे शरीर की धमनियों और वाहिनियों में पानी की लहरों की तरह वहता है, फिर तूं क्यों सोने (पवित्र, श्रेष्ठ) की तरह lअत्यंत श्रेष्ठ बना हुआ है, जिस प्रकार सोने से कई प्रकार के आभूषण बनाए जाते हैं, जिनके असँख्य नाम रखे जाते हैं, अनेकों आकार होते हैं, वैसे ही तूँ और मैं भी एक ही खून, पानी, हड्डी मांस से बने हुए हैं, जिन में कोई ...

गुरु रविदास और आदिधर्म ग्रँथ " गुरु आदिप्रकाश"।।

।।गुरु रविदास और आदिधर्म ग्रँथ "गुरु आदिप्रकाश"।। गुरु रविदास जी महाराज ने, अपनी अथाह वाणी लिख कर ही, सारे जानबरवाद को कत्ल करके मानवतावाद को जिंदा किया था। गुरु जी ने, कभी भी किसी को क्रोधित हो कर, जली कटी नहीं सुनाई, कभी भी किसी की आत्मा को अपने तीरों से आहत नहीं किया अगर कोई हुआ होगा तो अपने कुत्सित घृणित विचारों को जिंदा रखने के लिए ही घायल हुआ होगा, मानवीय मूल्यों को तहस नहस करने पर ही जरूर जख्मी हुआ होगा। मुस्लिमों, ईसाइयों ने भारत के लोगों को अपने हथियारों की नोक पर इस्लाम और क्रिश्चियन धर्म को स्वीकार करने के लिये विवश किया था, जो कर गए वे बच गए, जो नहीं कर सके थे, वे मर गए, मगर इस्लाम को स्वीकार, करने वाले तो बड़े बुद्धिमान निकले और प्राण बचा गए परन्तु जिन्होंने स्वीकार नहीं किया है, वे मूर्ख निकले और काल का ग्रास बन गए, अपनी बहुमूल्य जिंदगी गंवा बैठे। धर्म तो केवल, जीवन को सुचारू रूप से, आदर्श इंसान बनने के लिए, अच्छे सिद्धांतों को अपनाने का ढंग बताता है। ये सिद्धांत सभी धर्मों में हैं, मग़र इन धर्मों के ठेकेदारों ने अपनी दादागिरी दिखाने,अपना रौव, अपनी धौंस जमाने के ल...

गुरु रविदास जी के साथी और ब्राह्मणों का शात्रार्थ।

।।गुरु रविदास जी के साथी ब्राह्मणों का शारत्रार्थ और विजय।। गुरु रविदास जी महाराज, ने भारत में फैले अन्याय, अनाचार, अत्याचार, व्यभिचार के खिलाफ, मोर्चा खोला था, उनसे पूर्व किसी ने भी, ऐसी हिम्मत नहीं की थी। वहुजन क्रान्ति युग ही, गुरु रविदास जी के अवतार से ही, बिकर्मी सम्मत 1433 से शुरू हुआ था, जिसे गुरु रविदास युग कहना ही ठीक समीचीन है। जिस मान सम्मान को ब्राह्मण लेखकों ने, अपने ही तर्कहीन दन्तकथाओं को लिखने वाले तुलसीदास को दिया है जो किसी भी हालत में, गुरु रविदास महाराज के साथ बिल्कुल साम्य नहीं रखता और मेरा तो आलोचनात्मक दृष्टिकोण ही यही है कि, वह अति पिछड़ा हुआ लेखक हुआ है क्योंकि वह लिखता है कि मूर्ख ब्राह्मण की ही पूजा होनी चाहिए, जबकि विद्वान शूद्र की पूजा नहीं होनी चाहिए, जिस माता ने जन्म दिया, जिस पत्नी ने एक सेवक की तरह सेवा की, और अंधे प्रेमी को धिक धिक कह कर, लेखक बनाया उसी नारी को ही ताड़न की अधिकारी लिखता है। वास्तव में औरत भी गलतियां करती आई हैं मगर सभी को एक ही डंडे से नहीं हांका जा सकता। बिकर्मी  सम्मत 1413 में गुरु नामदेव जी ने भी महाराष्ट्र में, जन्म लेकर, वहुजन स...

गुरु रविदास और आदिधर्म ग्रँथ " गुरु आदिप्रकाश"।।

।।गुरु रविदास और आदिधर्म ग्रँथ "गुरु आदिप्रकाश"।। गुरु रविदास जी महाराज ने, अपनी अथाह वाणी लिख कर ही, सारे जानबरवाद को कत्ल करके मानवतावाद को जिंदा किया था। गुरु जी ने, कभी भी किसी को क्रोधित हो कर, जली कटी नहीं सुनाई, कभी भी किसी की आत्मा को अपने तीरों से आहत नहीं किया अगर कोई हुआ होगा तो अपने कुत्सित घृणित विचारों को जिंदा रखने के लिए ही घायल हुआ होगा, मानवीय मूल्यों को तहस नहस करने पर ही जरूर जख्मी हुआ होगा। मुस्लिमों, ईसाइयों ने भारत के लोगों को अपने हथियारों की नोक पर इस्लाम और क्रिश्चियन धर्म को स्वीकार करने के लिये विवश किया था, जो कर गए वे बच गए, जो नहीं कर सके थे, वे मर गए, मगर इस्लाम को स्वीकार, करने वाले तो बड़े बुद्धिमान निकले और प्राण बचा गए परन्तु जिन्होंने स्वीकार नहीं किया है, वे मूर्ख निकले और काल का ग्रास बन गए, अपनी बहुमूल्य जिंदगी गंवा बैठे। धर्म तो केवल, जीवन को सुचारू रूप से, आदर्श इंसान बनने के लिए, अच्छे सिद्धांतों को अपनाने का ढंग बताता है। ये सिद्धांत सभी धर्मों में हैं, मग़र इन धर्मों के ठेकेदारों ने अपनी दादागिरी दिखाने,अपना रौव, अपनी धौंस जमाने के ल...