गुरु रविदास जी के साथी और ब्राह्मणों का शात्रार्थ।

।।गुरु रविदास जी के साथी ब्राह्मणों का शारत्रार्थ और विजय।।
गुरु रविदास जी महाराज, ने भारत में फैले अन्याय, अनाचार, अत्याचार, व्यभिचार के खिलाफ, मोर्चा खोला था, उनसे पूर्व किसी ने भी, ऐसी हिम्मत नहीं की थी। वहुजन क्रान्ति युग ही, गुरु रविदास जी के अवतार से ही, बिकर्मी सम्मत 1433 से शुरू हुआ था, जिसे गुरु रविदास युग कहना ही ठीक समीचीन है। जिस मान सम्मान को ब्राह्मण लेखकों ने, अपने ही तर्कहीन दन्तकथाओं को लिखने वाले तुलसीदास को दिया है जो किसी भी हालत में, गुरु रविदास महाराज के साथ बिल्कुल साम्य नहीं रखता और मेरा तो आलोचनात्मक दृष्टिकोण ही यही है कि, वह अति पिछड़ा हुआ लेखक हुआ है क्योंकि वह लिखता है कि मूर्ख ब्राह्मण की ही पूजा होनी चाहिए, जबकि विद्वान शूद्र की पूजा नहीं होनी चाहिए, जिस माता ने जन्म दिया, जिस पत्नी ने एक सेवक की तरह सेवा की, और अंधे प्रेमी को धिक धिक कह कर, लेखक बनाया उसी नारी को ही ताड़न की अधिकारी लिखता है। वास्तव में औरत भी गलतियां करती आई हैं मगर सभी को एक ही डंडे से नहीं हांका जा सकता। बिकर्मी  सम्मत 1413 में गुरु नामदेव जी ने भी महाराष्ट्र में, जन्म लेकर, वहुजन समाज में व्याप्त बुराइयों, कमियों और उनके ऊपर होने वाले, अत्याचारों को उजागर करने के लिए, जीवन को खतरे में डाला लिया था मगर वे अपने मुख से वाणी गा गा कर ही अपना क्रोध निकाल लेते थे, परन्तु  गुरु रविदास महाराज ने तो जन्म लेते समय ही, धारदार वाणी रूपी तलबार से ब्राह्मणवाद को बुरी तरह कत्ल करना शुरू कर दिया था, अंधी दाई को आंखों की ज्योति की बख्शिश ने तो गुरु जी की अपरम्पार शक्ति की धूमें, ब्राह्मणों की घास से बनी हुई ज्ञान की झोंपड़ियों में, दाबानल की तरह आग लगा दी थी। ब्राह्मणवाद के तंबू गुरु जी के दैवीय तूफ़ान से उड़ने लगे, अपनी दिव्य करामात से कसाई सधना को अपनी ओर खींच लिया, खींचा ही नहीं उसे अपना शिष्य बना लिया, जिस की आंच ने सभी काजियों, मौलवियों, मुल्लों की नींद हराम कर दी, बादशाहों के होश उड़ गए। काजियों, मुल्लों के ढोंग भी जमीदोज होने लगे। गुरु जी के करिश्मों ने, हिन्दू और मुस्लिम दोनो को ही, अपने जानी दुश्मन बना लिए। ये जो कुछ लुआटा लगा रहे थे, वह केवल बालक रविदास ही लगा रहे थे, लेकिन उनके कृत्यों के दण्ड चमार जाति की लोग ही, सबसे अधिक भुगत रहे थे, गुरु जी ने नित नए तीर छोड़ कर, ब्राह्मणों को पंगा लेने केलिए विवश करते और उन्हें उकसाया, भड़काया, हड़काया करते और अंततः उनकी सहनशीलता को ही खत्म कर दिया करते थे। धोती, तिलक और शंख बजा कर, पूर्णरूपेण ब्राह्मण भेष बना कर, आठ साल की आयु में कपटी ब्राह्मणवाद के परखच्चे उड़ा दिये, "सोहम" जाप करते हुए वैरागन को देख कर, तो उन्हें अपनी भक्ति के निकम्मेपन पर शर्म आती थी। ये सब कुछ देख कर, ब्राह्मणों के सबर के बांध टूट गए, सहनशीलता की सीमाएं ध्वस्त हो गईं और सभी ब्राह्मण हो भी गये किंकर्तव्यमविमूढ़? अंततः उन्होंने अपनी आरामदायक रोजी, रोटी, कपड़ा और निठल्लापन छिनते देख कर, हथियार उठाने का मन मना ही लिया। परन्तु, कुछ बुद्धिमान ब्राह्मणों ने, कुछ अक्ल से काम, लिया और उतेजित ब्राह्मणों को सबर से काम लेंने का आग्रह भी किया और कहा, कि पहले प्यार और शांति से समझा बुझा कर रास्ते पर लाने का प्रयास करो, फिर नहीं माना तो थोड़ा वहुत डराओ फिर भी नहीं माना तो माता-पिता को कह दो कि, वच्चे को समझा लो, फिर भी नहीं माना तो भी वच्चे को परेशान मत करो, भक्ति का हक सभी को है। गुंडागर्दी करने वालों ने, गुरु रविदास जी को बुला कर, गड़ाघाट पर पंचायत फिक्स कर दी और ब्राह्मणों ने, मरासी आलिया को हुक्म दिया कि आप जा कर रविदास को बुला लाओ और बाबा कालूदास को साथ ले आना, क्योंकि पिता सन्तोषदास घर पर नहीं हैं। आलिया हुक्म मिलते ही, दो टक्के कमाने के लिए उनके घर भागा भागा चला गया। जिन अछूत व मुसलमान लोगों की लड़ाई गुरु जी लड़ रहे थे, उनमें से ही कुछ धूर्त, स्वार्थी, लालची और महामूर्ख अपनी जमीर को बेच कर, ब्राह्मणों के साथ मिल गए और गुरु जी के खिलाफ षडयन्त्र में शामिल हो गए थे। उनमें से एक मुसलमान आलिया गुरु जी के घर जा कर, गांव वासियों को डराता और धमकाता हुआ पूछता है कि, कहाँ है, रविदास? जिसने सारे संसार मे तरथल मचा रखा है। ना खुद, आराम से रहता है, ना खाता पीता है और ना ही हमें खाने पीने देता, ना आराम से रहने देता, मैं थक गया, ब्राह्मणों को समझाता बुझाता कि, छोड़ो बच्चा है, बड़ा हो कर वह समझ जाएगा। आज नहीं तो कल अवश्य ज़मझ जाएगा मगर इसने तो ब्राह्मणों के ही नाक में दम नहीं कर रखा अपितु सारे शूद्रों का जीना भी मुश्किल कर रखा है। मैं, पूरे चार साल तक ब्राह्मणों को रोकता रहा मगर ये बच्चा नहीं है, ये कोई उपद्रवी है, जिस ने सारे ब्राह्मणों को चिंता में जला रखा है, वेचारे घर में, आराम और सुख चैन से बैठे बैठाए खाते थे, कहीं कोई कभी काम नही करते थे, चुपचाप खाते और हजम करते थे, नित नई नई कथाएँ घड़ते फिरते थे।इस रविदास वच्चे ने, ब्राह्मणों का सारा आबा ऊत कर दिया, छोटे बड़े का फासला ही खत्म कर दिया। इसने सारे बीड़ बन्ने ही खत्म कर दिए हैं। सभी ब्राह्मण पागल हो कर, आज गड़ाघाट पर भाले बरच्छे ले कर, मरणव्रत धारण कर बैठ गए हैं, चलो कालूदास जी आप भी चलो, आप को भी बुलाया गया है। चलो निपटो चल कर अब मेरे वस की बात नहीं रहीं,अब चल कर उन्हें जबाब दो। कालूदास जी अभी तैयार ही हो रहे थे,मग़र बालक श्री, रविदास महाराज धूर्त मरासी आलिया के साथ अकेले ही, गड़ाघाट की ओर चल दिये, बाबा कालूदास जी ने, सभी पड़ोसियों को कहा, कि गड़ाघाट पर सभी ब्राह्मण इकठ्ठा हो कर पंचायत कर रहे हैं, आप भी साथ चलो, मगर कोई भी चमार चलने को ततपर नहीं हुआ। रविदास को गए, हुए को बड़ी देर ही गई थी मगर कोई भी चमार हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था कि, गड़ाघाट पर जाया जाए क्योंकि गुंडों ने इस जाति के ऊपर अनगिनत अत्याचार और सितम ढाए हुए थे, जिससे उनकी सहमी हुई अंतरात्मा भयभीत थी, कि वे गड़ाघाट पर जाने की हिम्मत ही नहीं जुटा पा रहे थे। अंत मे एक वृद्ध ने, सभी को फटकार कर कहा, हमारा बच्चा अकेला खूंखार भेड़ियों से हमाते हितों की लड़ाई लड़ रहा है और उसके साथ, आज एक भी चमार नहीं गया तुम्हारी गैरत को  लानत है! ऐसा सुन कर सभी चमार भागे और गड़ाघाट पहुंच गए, तो जाते ही वहां क्या देखते हैं? कि बालक रविदास ने, सभी ब्राह्मणों के हेंडज अप करवा कर रखे हैं, उनके डंडे, भाले और तलबारें सिर पर ही खड़ी कर रखीं हुई थी। बालक रविदास के कौतुक को देख कर, सभी कह रहे थे, ""धन रविदासा तेरियां करामातां""। किसी भी चमार के साथ, ब्राह्मणों की कोई बात करने की हिम्मत नहीं हो रही थीं, वस बोले तो कालूदास जी, ओए ब्राह्मणों! इस छोटे से, निमाणे वच्चे को परेशान करते हो,ऐसा पापकर्म करते हुए आपको शर्म क्यों नही आई?। पंगा लेना है तो मुझ लो, मैं अकेला ही आप को निगल सकता हूँ, चमार का रंबा और बयांग, टेढ़े मेढ़े चमड़े को तुरंत सीधा कर देते हैं, ये मेरा ही खून है, अब भुगतो अपने कारनामों के परिणामो को। ब्राह्मण कालूदास जी के पास, कातर दृष्टि से रुक रुक कर गिड़गिड़ाने लगे, और कहने लगे, हम से भूल हो गई, बाबा जी माफ़ करो। कालूदास ने गुस्से से कहा, माफी मांगो, बालक रविदास से जिन्हें आप लोगों ने नाहक परेशान कर रखा हुआ है। जब ब्राह्मण, बालक रविदास की ओर चलें तो, अंधे हो जाते, जब पीछे को मुड़ें, तो आंखों में दिखाई देने लग पड़े। गुरु जी ने आधे दिन तक, ब्राह्मणों से इसी तरह की आंख मिचौनी करबाई, इसी तरह की उठापटक करवाई। गुंडों के लाख तरले मिन्नते करने पर भी रविदास ने उन्हें माफ कर दिया और चेतावनी देते हुए कहा,भविष्य में सन्तों से कभी पंगा मत लेना, अन्यथा इस से कठोर और अधिक दण्ड मिलेगा।सभी प्रकाण्ड पंडित, उनके पावों पर गिरे और नाक रगड़े अंत में बालक से माफ मांगी, फिर गुरुमंत्र लेकर अमृत पान किया और घर वापस आए। गुरु जी के सभी पड़ोसियों ने भी शुक्र मनाया कि, समस्याओं का समाधान शांति पूर्वक हो गया, बालक रविदास जी को सभी ने गले लगाया और कहा, ये भई! बालक नहीं है, हमारा दुखभंजन अवतार है। बाबा कालूदास ने, बालक को अपने  सीने और  गले लगाकर, हाथ की उंगली से पकड़ कर घर ले आए। इस विष्मयकारी घटना से, सारा ब्राह्मणवाद सकते में पड़ गया।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
अगस्त 12, 2020।

Comments

Popular posts from this blog

गुरु रविदास जी की क्रांतिकारी वाणी दोधारी है।

क्रांतिकारी शूरवीर गुरु रविदास जी महाराज।।

।।राम बिन संशय गाँठि न छूटे।।