गुरु रविदास और आदिधर्म ग्रँथ " गुरु आदिप्रकाश"।।

।।गुरु रविदास और आदिधर्म ग्रँथ "गुरु आदिप्रकाश"।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, अपनी अथाह वाणी लिख कर ही, सारे जानबरवाद को कत्ल करके मानवतावाद को जिंदा किया था। गुरु जी ने, कभी भी किसी को क्रोधित हो कर, जली कटी नहीं सुनाई, कभी भी किसी की आत्मा को अपने तीरों से आहत नहीं किया अगर कोई हुआ होगा तो अपने कुत्सित घृणित विचारों को जिंदा रखने के लिए ही घायल हुआ होगा, मानवीय मूल्यों को तहस नहस करने पर ही जरूर जख्मी हुआ होगा। मुस्लिमों, ईसाइयों ने भारत के लोगों को अपने हथियारों की नोक पर इस्लाम और क्रिश्चियन धर्म को स्वीकार करने के लिये विवश किया था, जो कर गए वे बच गए, जो नहीं कर सके थे, वे मर गए, मगर इस्लाम को स्वीकार, करने वाले तो बड़े बुद्धिमान निकले और प्राण बचा गए परन्तु जिन्होंने स्वीकार नहीं किया है, वे मूर्ख निकले और काल का ग्रास बन गए, अपनी बहुमूल्य जिंदगी गंवा बैठे। धर्म तो केवल, जीवन को सुचारू रूप से, आदर्श इंसान बनने के लिए, अच्छे सिद्धांतों को अपनाने का ढंग बताता है। ये सिद्धांत सभी धर्मों में हैं, मग़र इन धर्मों के ठेकेदारों ने अपनी दादागिरी दिखाने,अपना रौव, अपनी धौंस जमाने के लिए, अपने अपने अवतारों और पैग़ंबरों को एक दूसरे से बड़ा प्रमाणित करने की मूर्खता करके, अपनी जनसँख्या बढ़ाने के लिए, इंसानों की बलि देता आए हैं, जिसके खिलाफ अगर किसी ने जी जान से अपने प्राणों की बाजी लगाई है, तो केवल गुरु रविदास जी चमार, कबीर साहिब जुलाह, दो ही माँ के वीर सपूतों ने लगाई है, कबीर साहिब को मुसलमान का मुलम्मा केवल, उनकी पहचान शूद्र वर्ग से अलग करके मुसलमानों के बीच, ब्राह्मण लेखकों ने दिखाई हुईं हैं। कबीर को कोरी, कोली कहा गया है, जो कि किसी किसी स्थान पर चमड़े का ही काम करते हैं, हमारे वर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी भी इसी उपजाति से संबन्ध रखते हैं मगर हैं वे चमार ही हैं, फिर कबीर साहिब को, जो विधवा ब्राह्मणी से जन्मा और नीरू-नीमा मुस्लिम दंपति द्वारा पालन पोषण बता कर कबीर साहिब की विद्वता का जो मजाक ब्राह्मणों ने उड़ाया है, वह बड़ा हास्यस्पद ही लगता है, क्योंकि कहीं भी, कोई भी विधबा हजारों लोगों के सामने, वच्चे को जन्म नहीं देती है, और उनके सामने जा कर तालाब पर छोड़ती है, छोड़ती भी हैं तो केवल अकेली और चोरी चोरी ही जा कर, छोड़ती है, फिर कबीर जी का कैसे, किसी को पता चला कि उन्हें विधवा और वह भी ब्राह्मणी ने ही जन्म दिया है। गुरु रविदास जी को भी पिछले जन्म में, ब्राह्मण के रूप में दिखाया गया है, मग़र जब कोई पिछला जन्म होता ही नहीं है, तो कैसे ये झूठ के ढक्कन, अवतारों के ऊपर चढ़ाए गए हैं। कबीर साहिब गर्म दल के क्रांतिकारी थे, और गुरु रविदास जी नरम दल के पाप विध्वंसक हुए हैं। दोनों महापुरुषों ने ही, ब्राह्मणों के लाक्षागृह को, आग और पानी के बिना ही नेस्तनाबूद किया है, बाकी सन्तों की मंडली इन गुरुओं के पीछे पीछे चलने वाले ही हुए है। नरम दल के आगू गुरु रविदास जी ने सभी को तर्कसंगत ढंग से जीने के लिए, गुणवान लोगों की पूजा करना समझाया कि:----
रविदास बामन मति पूजिए,जउ होवै गुनहीना।
पूजहिं चरण चंडाल के, जउ होवै गुण परवीना।
मगर गर्म दल के आगू सतगुरु कबीर साहिब फरमाते हैं कि:----
जे तूँ तुर्क तुर्कनी जाया, खतना भीतर क्यों नहीं कराया।
जे तूँ बाहमन बहमनी जाया, तिलक भीतर क्यों नहीं लगाया।
इन्हीं  हिरदय विदारक दृष्टान्तों के कारण दोनों ही क्रांतिकारियों को, समाप्त करने के लिए बहुत कुछ किया गया, केवल जीवन लीला खत्म इसलिए नहीं हुई कि वे निरंकार आदिपुरुष द्वारा भेजे अबधूत थे जिन्हें तीर लग नहीं सका और तलबार काट नहीं सकी। इन दोनों के पास केवल मिजायल थे, तो केवल शव्दों के ही थे, जिसके सिवाए वे कोई भी किसी प्रकार  का औजार आत्मसुरक्षा के लिए नहीं रखते थे। इसी वाणी की अग्नि से आहत होकर दोनो ही धार्मिक नेताओं को अपमानित करने के लिए, षडयन्त्रों की भरमार लगाई गई थी मग़र हर बार ब्राह्मण मुंह की खाकर औंधे मुंह ही गिरे।
ब्राह्मणों के छल, कपटों, षडयन्त्रों से स्पष्ट है कि, गुरु रविदास जी और कबीर साहिब ने बड़े तर्कपूर्ण ढंग से असत्य को सत्य की तलबार से काटा, ब्राह्मणों ने, सत्पुरुषों को कुतर्कपूर्ण ढंग से अपमानित करके, अपने रास्ते से हटाने का निंदनीय प्रयास किये हैं, जिसके कारण, गुरुओं ने ब्राह्मणों की बुरी तरह से रेल बनाई है, ब्राह्मणों के पाखण्डों की पोल खोल कर, उनका जग में ढिंढोरा पीटा है, ब्राह्मणों के आडंबरों को जनता के बीच बड़ी बेरहमी से नँगा किया है। दोनों ही पीरों ने सर्वसमाज के हित की ही बात की हुई हैं। जिसका संग्रह इन दोनों गुरुओं के शिष्यों, गुरु नानकदेव जी महाराज और गुरु धर्मदास जी ने किया था, मगर सतगुरु रविदास और गुरु कबीर जी के ज्योतिर्लीन होने पर ब्राह्मण छलियों ने उनकी वाणियों को रसातल कर दिया था, मगर सत्य को कोई मिटा नहीं सकता है, जिसके कारण पुनः आदिशक्ति ने, स्वामी ईशरदास जी महाराज के रूप में, सन 1900 में पंजाब के गांव सोहलपुर, जिला जालन्धर में पिता देवराज माता खेमों के घर अवतार लिया और बारह वर्ष की आयु में ही इन्होंने गुरु रविदास और कबीर साहिब सहित सात सौ सन्तों की ध्वस्त की हुई वाणी को लिखना शुरू किया, जिसे गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ के नाम से जाना जाता है, इस पवित्र ग्रँथ में सात सौ सन्तों, गुरुओं और महापुरुषों की वाणी संग्रहीत की गई है, जो केवल स्वामी ईशरदास जी की ही लिखी हुई है, यही धर्म ग्रँथ भविष्य में, विश्वग्रँथ के रूप में सम्मान पाएगा, जिस की बर्बादी गुरु रविदास जी के ज्योतिर्लीन होने पर ब्राह्मणों ने की थीं। इस ग्रँथ की वाणी जो जो लोग सुनेंगे उन्हें वर्तमान कोरोना महामारी के बीच भी कोई आंच नहीं आएगी, इस बात को ब्राह्मण भी अच्छी तरह, चिरकाल से जानते आए हैं कि, कोई चमार जन्मेगा और वह धर्मग्रँथ लिखेगा, जिसकी वाणी जिस जिस व्यक्ति के कान में पड़ेगी, उसे प्रलय के दिनों में कोई आंच नहीं आएगी, इसी लिये विश्व धर्मग्रँथ गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ को ही, केवल और केवल अपना एकमात्र ग्रंथ स्वीकारो।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
अगस्त 11, 2020।

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