गुरु रविदास प्रदत्त गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ से इतराज क्यों?

।।गुरु रविदास प्रदत्त गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ से इतराज क्यों?
गुरु रविदास जी ने, भारतवर्ष में, जन्म ही समतावादी समाज बनाने के लिये लिया था, क्योंकि भारत युरेशियनों के पाशविक अत्याचारों के कारण कत्लगाह, बूचड़खाना बन चुका था। ब्राह्मणों के अत्याचारों की सीमा खत्म ही चुकी थी। शूद्रों से काम तो लिया जा सकता था, मगर ये कहाँ की इंसानियत थी कि, काम के बदले में खाने को केवल लस्सी, साग जिसका भी कोई स्वाद नहीं, वह भी मनुवादियों के घरों से दूर बैठे हुए मूलनिवासियों को, दूर से फेंका जाता था। पानी भी आठ आठ फुट लंबे बांस से बने पुल से फेंक कर पिलाया जाता था, काम अथाह लेने के बाद, उन्हें फिर छोटी मोटी गलती के लिए पीटा जाता था, जब भी किसी देवता को खुश करना होता था तो बलि के नाम पर शूद्र को काटा और मारा जाता था। ये आजादी से पहले की बात है, मगर आज फिर स्वतंत्र भारत में, अछूतों, मुसलमानों को माब्लिंचिंग में, दस बीस लोग छाती पर चढ़ कर मार रहे, कोई छुड़ाने की हिम्मत नहीं करता, कोई पुलिस वाला बचाने के लिए तैयार नहीं, कोई अखबार लिखने को तैयार नहीं, उलटे जो पर्चा कटाने जा रहे हैं, उन्हीं लोगों पर केस दर्ज किए जा रहे हैं, आज देश में इतना अंधेर फिर फैल गया है। शासन, प्रशासन आपस में, मिलजुल कर, अछूतों, शूद्रों के साथ, जंगली जानबरों से भी बढ़ कर अत्यंत बदतर दुर्व्यवहार कर रहा है, मगर कानून नाम की कोई चीज नहीं बची हुई है। अगर कोई गलती हो, तो दोषी को कानून के दायरे में रह कर दण्ड कोर्ट दें, फिर चाहे सजा ऐ मौत ही क्यों ना दी जाए, सहन की जा सकती है मगर शूद्र मन मसोस कर सब कुछ बर्दाश्त करता जा रहा है, परन्तु किसी दिन सहन करने की अंतिम सीमा खत्म हो जाएगी, लोग जीने की अपेक्षा बदला लेने के लिए अपनी जान देते देते अत्याचारियों की भी जान ले लेने लग पड़ेंगे, फिर क्या होगा? जिस का स्वतः अनुमान लगाया जा सकता है। प्राचीन काले इतिहास को फिर दोहराया जा रहा है। मगर आज जरूरत है, अच्छे धार्मिक सदव्यवहार की, समाज को मानवतावादी सत्संग की, कुछ लोग अच्छे इंसान बनने के लिए विश्व के सभी धर्मों के मूल आदिधर्म को अपना रहे हैं, अपनी अपनी पसंद की धार्मिक पुस्तकें पढ़ने की कोशिश कर रहे है, तो उन्हें क्यों रोका जा रहा? धार्मिक आगू शूद्रों को क्यों रोक रहे? यह चिंतन का विषय है। सभी अपने अपने उद्धारकों की ही पूजा पसन्द करते है, राम ने सवर्णों के लिए काम किये हैं, तभी तो वे राम को भगवान मानते हैं, जबकि राम ने शूद्रों के ऊपर अत्याचार ढाए थे, राम ने छलबल से रावण को मारा, मेघनाथ, रावण को मारा, बाली को मारा था। महाऋषि शंबूक की हत्या की थी, लक्ष्मण ने स्वरूप नखा की हत्या की थी, गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा कटवाया था, कृष्ण ने छलबल से सम्राट कंस को मारा था, उनके काले कारनामों को छुपाने के लिए झूठी तर्कहीन कथाएं लिखकर, अछूतों और शूद्रों को उनके प्रति गुमराह किया गया है, जबकि मुझे नहीं लगता कि,राम, कृष्ण ने शूद्रों के ऊपर ऐसे घोर अत्याचार किये है क्योंकि राम सूर्यवंशी थे और कृष्ण यदुवंशी हुए है, जिन का संबन्ध मूलनिवासियों से ही रहा है, मगर उन्हें मूलनिवासियों शूद्रों के खिलाफ, करने के लिए झूठी कथाएँ घड़ी गई लगती हैं, ताकि यूरेशियन आर्य अपने अत्याचारों को ढक सकें और अपनी सारी काली करतूतों पर पर्दा डाल सकें। यूरेशियन तो ब्राह्मण बन गए, जिन्होंने शूद्रों के वंशजों, राजपूतों को छलबल से अपना बनाया हुआ है, उनसे भी अनेकों अत्याचार करवाए जा रहे, कुषाण जाति के लोग भी कृषि करते करते किसान बन कर जाट बन गए, वे भी ब्राह्मणों के ही नक्शे कदमों पर चल कर शूद्रों के ऊपर सामाजिक, धार्मिक राजनैतिक अत्याचार करने से पीछे नहीं हैं, यही लोग हमारे गुरुओं की वाणी को लेकर अपना गुरु ग्रँथ साहिब बना कर गुरुदुआरों में प्रकाश कर रहे, और उन्हीं गुरुओं के अनुयायियों को गुरुदुआरों में प्रवेश करने पर रोका जा रहा है, उन्हीं पर जुल्म करते जा रहे, अलग अछूत आददुआरे बनाने पर भी दादागिरी दिखाई जा रही, ये गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ का प्रकाश क्यों करते हो? अलग प्रकाश क्यों करने का क्या अर्थ है?
प्रोफेसर लालसिंह जी अपने शोध काव्य, आदिधर्म बनाम  विश्व धर्म ग्रँथ दे सिरजक सतिगुरु रविदास जी के पृष्ठ 21-22 पर लिखते हैं कि, जे कर मूलनिवासी अछूत शूद्र, गुरु रविदास की के अनुयायी अपने आदि गुरुओं की वाणी का अलग ग्रँथ का सृजन करते हैं, उसकी पूजा करते हैं,उससे आत्मिक उन्नति के लिए नेतृत्व प्राप्त करते हैं, तो फिर किसी को इतराज क्यों होता है? अर्थात किसी को कोई इतराज नहीं होना चाहिए, जे कर कोई करता है, तो वह गुरु ग्रँथ साहिब की भावना के अनुसार और कुदरत के नियमानुसार बिलकुल ही निर्मूल है, बेबुनियाद है। हां जे कर, कोई नया ग्रँथ बनाने  के रास्ते में रुकाबट बनता है, तो इस का अर्थ यही है कि, मूलनिवासी शूद्रों, अछूतों, रविदास जी के अनुयायियों के हकों  के ऊपर हिन्दू धर्म की तरह ही डाका मारा जा रहा है और उन्हें अपनी मर्जी के साथ अपने बजुर्ग दादे, पड़दादे के, खजाने को इकठ्ठे करके उसे पूजने, उस से ज्ञान प्राप्ति के लिए अगबाई करने से रोका जा रहा है और उनकी स्वतन्त्रता के ऊपर डाका मार कर, पुनः हिन्दू धर्म  के मनुवादी कानून लागू करके, उनको पशुओं की तरह पुनः गुलाम बनाने का प्रबंध किया जा रहा है, इसलिए यदि उच्च जाति के जट सिख जगत की ओर से, मूलनिवासियों को दी जा रहीं धमकियां शूद्रों, अछूतों के हकों पर हमला है, तो फिर ये, गुरु ग्रँथ साहिब, गुरु नामदेव गुरु नानकदेव जी, गुरु सेनजी, गुरु रविदास और गुरु अर्जुनदेव के आदेशों का उलंघ्घन ही है, मनुष्यता का कत्ल है। गुरु ग्रँथ साहिब के पृष्ठ 199 (गौउड़ी महला 5) पर लिखा गया है कि:---
हक पराया नानका।
उस सुआर उस गाए।।
गरीबां उपरि जि खिंजै दाढ़ी।।
पारब्रह्मी सा अगन महि साड़ी।।१।।
पूरा निआऊँ करे करतारु।।
अपने दास कउ रखन हार।।१।।रहाउ।।
आदि जुगादि प्रगटि प्रतापु।।
निंदक मुआ उपजि वड ताप।।२।।
तीनि मारिआ जि राखे ना कोई।।
आरी पीछे मंदी सोई।।३।।
आपुने दास राखै कंठि लाइ।।
सरणि नानक हरनामु धिआइ।।४।।
इस प्रकार दोनों ही हुक्मनामें गुरु रविदास जी की ग्रँथों के प्रति, प्रभु के आगे दी गई दुहाई की प्रौढ़ता करते हैं, कि मेरी प्रभु प्राप्ति का क्या लाभ, जब मेरी औलादें ही (समूचे गरीब) नरक की जिंदगी जीती हैं।
जब गुरु, दूसरों के अधिकारों को मार कर, खाने को पाप कर्म मानते हैं, दूसरों को ज्योतिर्ज्ञान प्राप्ति से रोका जाता है, फिर भगवान दूध का दूध, पानी का पानी करके न्याय करता है, वह रक्षक किसी को भी माफ नहीं करता है, तो फिर ये वर्तमान सिख क्यों मॉनवता विरोधी, कार्य करके गुरुओं के निर्देशों का उलंघ्घन करते हैं? क्यों गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ को अपना कर आदिपुरुष से, तादात्म्य जोड़ने से रोकते हैं मगर शूद्रों, अछूतों को भी स्वतः ही हिम्मत करनी चाहिये, ईंट का जबाब पत्थर से दे देना चाहिए, क्योंकि सिखों के ही दसवें गुरु गोविंदसिंह जी ने भी दुखी हो कर अपनी तलवारें उठा ली थीं और पाप कर्म, जबर जन्नाह करने वालों, खून खराबे करने वालों को, मौत के घाट उतार कर मॉनवता की रक्षा की थी।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
अगस्त 29,2020।

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