गुरु रविदास जी और आदिधर्म का वर्तमान इतिहास
गुरु रविदास जी और आदिधर्म का वर्तमान इतिहास।।
गुरु रविदास जी के वैश्विक आदिधर्म की पुनः आधारशिला रखने के बारे में, साहिबे कलाम मंगूराम मुगोबाल जी ने, अनुकूल समय मिलते ही, अंग्रेजी हकूमत को भी, विश्व आदिधर्म की जानकारी दे दी थी। चार मार्च सन 1932 को फ्रेंचाइज कमेटी ने भारत के सभी धर्मों के प्रतिनिधियों के साथ वार्ता शुरू कर दी थी, ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त कमीशन के अध्यक्ष, लार्ड लोथियन के आदेशानुसार लाहौर पुलिस ने, आदिधर्म के आंदोलनकारियों को छाया में बैठा दिया। मंगूराम जी अध्यक्ष पंजाव आदिधर्म मण्डल, महासचिब हजारा राम बीडीओ, मिस्त्री लभूराम, सेठ सुंदर दास, भगत गुलाबा राम, श्री गणेश जी दलपति, सन्तराम आजाद, हकीम प्रताप चंद जी महाराज, हरनाम दास जंडाली, श्री साहिबा राम, खड़कू राम जमादार, किरपा राम जी, सुंदर सिंह, गुरदित जी, लाल चंद, पूर्ण चंद रमता, भुल्ला सिंह फौजी असेंबली हाल में चले गए।
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी धर्मों के प्रतिनिधियों से वही सवाल पूछे गए जिन की कल्पना डाक्टर भीमराव अंवेदकर ने की थी। लार्ड लोथियन ने सभी से पूछा, कि आप कौन हैं, आप का धर्म क्या है, आपके अवतार कौन कौन हैं, आपके धर्म ग्रँथों के क्या नाम हैं? और अपने अपने धर्म ग्रँथ भी दिखाओ, आपके ध्यान लगाने वाले पवित्र शव्द क्या क्या हैं। सभी ने ये उतर बड़ी ही आसानी से दे दिए। उनके बाद मंगू राम जी से भी लोथियन ने सवाल पूछने शुरू किये।
पहला सवाल:----आप कौन हो?
जबाव:------------हम आदिधर्मी है।
लोथियन का सवाल:----- आदिधर्मी का क्या अर्थ है
जबाब:---------सर हम भारत के असली वाशिंदों की औलाद हैं, इसीलिये हम सभी आदवंशी, आदिवासी, मूलनिवासी और आदिधर्मी हैं। हिन्दू तो तिब्बत और मध्य एशिया से आए हुए हैं। मुसलमान अरब देशों से आए हुए हैं। ये हिन्दू मुसलमान सिख दो जन्मे हैं, हम सभी आदिवासी, आदिधर्मी एक जन्मे हैं।
लोथियन का प्रश्न:----- ये हिन्दू, मुस्लिम, सिख दो जन्मे किस प्रकार हैं?
हमारा जबाब:-----तीनों ही एक बार माँ के गर्भ से जन्म लेते हैं, उसके बाद जब हिन्दू जनेऊ धारण करता है, तब पक्का हिन्दू बनता है, जब मुसलमान खतना करबाता है, तब पक्का मुस्लिम बनता है, जब सिख पाँच कक्के धारण करके अमृत छकता है, तब पक्का सिख बनता है। हम एक बार माँ के गर्भ से जन्म लेते हैं, उसके बाद कोई आडंबर नहीं करते हैं, हम तो परमात्मा के उसूलों के मुताबिक जिस शक्ल में पैदा होते हैं, उसी में रह कर मर जाते हैं।
लोथियन का प्रश्न:-----आपका धर्म क्या है ?
हमारा जबाब:------ हमारा धर्म, आदिधर्म है, क्योंकि हम इस देश के, आदिकाल से रह रहे आदिवासी हैं, इसीलिए हमारा धर्म भी आदिधर्म है।
सिखों का हस्ताक्षेप:-----सर इन लोगों में से कुछ लोग गुरु ग्रँथ साहिब को मानते हैं, विवाह शादी के समय गुरु ग्रँथ साहिब में से आनंद कारज पढ़ते हैं, इसलिये इन लोगों की गिनती आधी सिखों में की जाए।
हमारी ओर से जबाब:-- सर ना हम आनंद कारज पढ़ते हैं, ना ही हम सहजधारी सिख हैं, गुरु ग्रँथ साहिब को हम सभी इसलिये नमस्कारी करते है, कि उसमें हमारे आदि गुरूओं गुरु रविदास जी महाराज, ऋषि वाल्मीकि जी, सतगुरू कबीरजी, सतगुर नामदेब जी, सतगुरू सेन जी, की वाणी है।
मुस्लिमों की ओर से जबाब:---- सर इन लोगों में से कुछ कुरान को मानते हैं, और नमाज पढ़ते हैं, अपने मुर्दों को दफनाते हैं इसलिये इनकी गिनती आधी मुसलमानों में की जाए।
हमारा जबाब:---- सर हम ना नमाज पढ़ने के आदि हैं, ना ही मुर्दे दफनाते हैं, केवल मुसलमान अपने गांवों के समीप बसने वाले अछूतों को डरा धमका कर अपने पीछे लगा लेते हैं, हिन्दू और सिख भी अपने गांवों के समीप बसने वाले अछूतों को अपने रिवाजों के अनुसार डरा धमका कर अपने पीछे लगा लेते हैं।
हिंदुओं की ओर से जबाब:----सर ये लोग हमारे वेदों को मानते हैं, विवाह शादी के समय वेदों के फेरे लेते हैं, इसलिये ये सारे हिन्दू ही हैं। इनकी गिनती के हकदार तो हिंदुओं के बिना कोई नहीं है। इसलिये इन सब की गिनती हिंदुओं में ही की जाए, इन के हकदार केबल हम ही हैं, इस प्रकार अपनी अपनी संख्या बढ़ाने की सारी फ़ितरतें, बाबा साहिब भीमराव अंवेदकर और साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल ने नाकाम कर दी और आदिधर्म को सिंधु घाटी की सभ्यता के बाद पुनः स्थापित करवा लिया।
प्रोफेसर लालसिंह जी, अपने शोध काव्य, " आदिधर्म बनाम, विश्व धर्मग्रंथ आदि पोथीसाहिब दे सिरजक सतिगुरु रविदास जी" के पृष्ठ 17 पर लिखते हैं कि, ग्रँथ का नाम"आदि प्रकाश ग्रँथ है"।आदिप्रकाश ग्रँथ का हिमाचल प्रदेश, पंजाब, दिल्ली हरियाणा और विदेशों में प्रकाश होता है।इस लिये डेरा बल्लां के सन्तों का तीस जनबरी का ऐलान व्यर्थ है। डेरा सचखंड बल्लां ने अलग धर्म और ग्रँथ का ऐलान करके, अपने डेरे की महत्ता, सिद्ध करने के लिए, समूचे भारत और विश्व में चल रहे "" आदिधर्म"" का विरोध किया है। यही नहीं बल्लां वालों ने अपने ही संस्थापक सन्त सरवन दास जी महाराज का विरोध किया है, क्योंकि ""आदिप्रकाश"" का सृजन और स्थापना उनकी ही सहमति से ही हुई है। बल्लां डेरे ने ही आदिधर्म और सोहम को अपना कर, परवान करके, स्थापित करने वालों में बल्लां वाले, सुशिक्षित बुद्धिजीवी सन्त सरवन दास जी का विशेष योगदान रहा है।
वास्तव में, डेरा बल्लां के, पहले पूज्य सन्त पिपलदास जी महाराज ने, आदिधर्म के दूसरे अवतार स्वामी ईशरदास जी महाराज को, गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ को संपूर्ण करने के लिए अपना पूर्ण समर्थन दिया था और सन्त सरवन दास जी को भी, ग्रँथ को छपवाने के लिए, धन संग्रह करने के लिए कहा था। सन्त सरवन दास जी, स्वामी ईशरदास जी महाराज के साथ कंधे से कंधा मिला कर, ग्रँथ को छंपबाने के लिए, कार्य करते रहे। आदिधर्म को स्थापित करने में, बल्लां डेरे के तत्कालीन योग्य सन्तों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है जिसके लिए, उन्हें कभी भी भुलाया नहीं जाएगा।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
अगस्त 22, 2020।
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