गुरु रविदास जी, को अवतार में कर आदिधर्म क्यों बनाना पड़ा?
।।गुरु रविदास जी को अवतार मानकर आदिधर्म क्यों बनाना पड़ा?
गुरु रविदास जी की संगत को, ब्राह्मणों ने सन 1911 ईस्वी के भूमि आराजी एक्ट को थोंप कर बेजमीन कर के रखा हुआ था, बेघर करके रखा हुआ था, कंगाल बना कर रखा हुआ था, बेजुवां ही नहीं लाचार बना कर रखा हुआ था, बेइज्जत बना कर रखा हुआ था,आजादी थी तो केवल गन्दगी उठाने की, मरे हुए पशुओं को कंधों पर उठाकर चीड़फाड़ करके, चमड़ा उतारने की, गन्दे चमड़े को साफ करके जूते बना कर, ब्राह्मणों को पहनाने की, खाने के लिए मरे हुए पशुओं के मरे हुए मास को खाने की, ब्राह्मणों की टट्टी को टीन में भर कर, सिर पर उठाकर दूर गन्दे नालों में जा कर फेंकने की, सड़कों गलियों को साफ, स्वच्छ करने की तो पूर्ण आजादी थी, मगर स्वच्छ खाने की, स्वच्छ पीने की, स्वच्छ कपड़े पहनने की, लाल रंग के परिधान और कपड़े पहनने की, सुंदर आभूषण पहनने की, आकर्षक श्रृंगार करने की बोलने की, लिखने की, पढ़ने की, कथा सुनने की, प्रवचन करने और सुनने की, आजादी हरिगज नहीं थी और कोई ऐसा करे तो कानों में पिघला हुआ सिक्का डाला जाता, मुंह मे उबलता हुआ गुड़ डाला जाता, नदियों में वहाया जाता, देवताओं को खुश करने के लिए बलि दी जाती थी, जिसके फलस्वरूप, जनकल्याण के लिए सतगुरु रविदास जी, गुरु कबीर जी, गुरु नानकदेव जी, गुरु नामदेब जी, गुरु सेन जी, गुरु पीपा जी, गुरु सधना जी, को अवतार लेना पड़ा, जिन्होंने इन यातनाओं को खुद सहन किया और तिलकधारियों धोतिधारियों, ब्राह्मणों के नाकों में दम कर के, मानवता की रक्षा की। जो मॉनवता की रक्षा करे, उसे ही लोग अपना मुक्ति दाता भगवान, रहबर, अवतार, पैगंबर, अल्ला रहीम, गॉड और रसूल मानते हैं।
स्वतंत्रता सेनानी साहिबे कलाम मूंग राम मुगोबाल जी भारत भूमि की आजादी के लिए वर्षों तक जेलों और जंगलों में रह कर वनवास काट कर, जब अफ्रीका के जंगलों से बापस अपने पंजाब के गाँव मुगोबाल पँहुचे तो सिर मुंडाते ओले फिर पड़ गये। एक दिन दबंग जाट उनकी औरतों के काटे हुए घास को उठा कर, ये कह कर ले गया कि, ये घास आपने हमारी जमीन से काटा है, इसीलिए मैं ले जा रहा हूँ, जिसे सुन कर टाइगर मंगू राम ने पटवारी और वकील को पूछा कि जमीन हमारे नाम कैसे हो सकती है? उन्होंने बताया तुम अपनी जाति, धर्म का कोई और नाम रख लो, तभी ऐसा हो सकता है,1924 से, मंगू राम जी ने सारे भारत का दौरा शुरू कियाऔर 11/12 जून 1926 को गाँव मुगोबाल में ही शूद्रों की विशाल कांफ्रेंस करके घोषणा कर दी कि, आज से हम हिन्दू नहीं हैं, हमारा हिंदू धर्म भी नहीं है और ना ही हम इस गाली को मॉन्यता देते हैं। आज से हम आदिधर्म को पुनः जिंदा करके, आदिधर्म को अपना धर्म मानते है।
उधर पांचवें गुरु अर्जुनदेव जी महाराज ने भी, आदिधर्म ग्रँथ में, गुरु रविदास जी के, केवल 40 शव्दों को ही सर्वोच्च मान्यता देकर सर्वश्रेष्ठता प्रदान करके इन्हें गुरु ग्रँथ साहिब में दर्ज करने के हुक्म दिए थे जिन से उन्होंने स्पष्ट संकेत देते हुए केवल गुरु रविदास जी को ही सर्वोच्च ज्योतिर्ज्ञानी स्वीकार कर, ज्योतिर्ज्ञान का सर्वश्रेष्ठ, एक छत्र मालिक घोषित किया था जिसे आधार मॉनकर साहिबे कलाम मंगूराम मुगोवाल जी ने, आदिधर्म की नींव को पुनः सुरजीत किया है। प्रोफेसर लालसिंह जी कहते है कि, गुरु रविदास जी की वाणी पढ़ कर राजाओँ, महाराजाओं, सिकन्दर लोदी, बहलोंन लोधी, बाबर आदि कई बादशाहों, महारानी झालाबाई, मीराबाई आदि ने भी मुक्ति प्राप्त की थी, इसीलिए पुनः नए विश्व धर्म का सृजन करके, नए विश्व धर्मग्रंथ का सृजन किया गया, जिसका नाम गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ रखा गया है। मान्यवर प्रोफेसर लालसिंह जी, अपने शोध काव्य,"आदिधर्म बनाम विश्व धर्मग्रंथ आदि पोथीसाहिब दे सिरजक सतिगुरु रविदास जी" के पृष्ठ 16 पर लिखते हैं कि,गुरु रविदास जी के सेवक ग्रँथ की पूजा और संम्मान करके प्रभु की प्राप्ति करते थे और करते हैं। आजादी के घुलाटी ( क्रांतिकारी) गद्दरी बाबा साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल और भी अन्य अछूत बुद्धिजीवी, सिखों और ब्राह्मणों की तरह जातपात की कटड़ता के साथ अमल में लाते थे और उन्होंने शूद्रों के साथ पशुओं की तरह बर्ताब को अच्छी तरह समझ और परख लिया था, कि जट सिख उनके महान पुरुषों गुरु रविदास जी, सतगुरु कबीर जी, आदि का भगत कह कर, अपमान करते हैं, उनका प्रसाद गुरुदुआरों में स्वीकार नहीं करते हैं, रोटी बेटी की सांझ तो आज भी 21सवीं सदी में भी सिख जगत के बीच मान्य नहीं है। इन परिस्थितियों के बीच अछूत शूद्र बुद्धिजीवियों की दूरदर्शिता के कारण अपने मान सम्मान की खातिर सन 1926 में ही अपना अलग धर्म और अलग धर्मग्रंथ का ऐलान कर दिया था।
प्रोफेसर लालसिंह जी लिखते हैं कि, इन अछूत बुद्धिजीवियों की दूरदर्शिता उस समय जगजाहिर होती है, जब सिखों की अछूतों के प्रति, अति घिणौनी, मॉनवता मारू, अपमान से भरपूर, अनकही नफरत समूचे जगत में नशर होती है और सिख, जाट और अकाली दुनियाँ के मन्ने परमनने विद्वान, चलते फिरते इनसाइक्लोपीडिया के साथ सम्मानित, भारत रत्न डाक्टर भीमराव अंवेदकर को सिख बनने नहीं दिया। वे लिखते हैं कि, इससे बड़ी घिनोनी छुआछूत के साथ लवालव भरी नफरत का उदाहरण और कहीं नहीं मिलता है। इसी अकेली घटना ने साबित कर दिया है कि, गुरु ग्रँथ साहिब को भी ये लोग कत्ल कर सकते हैं, परंतु छुआछूत के भूत को नहीं। इसी तरह की नफरतों और अपमानों के कारण आदिवंशी आदिवासी, शूद्रों, अछूतों को अपना अलग धर्म, धर्मग्रंथ बनाने के लिए मजबूर किया गया।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
अगस्त 22,2020।
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