गुरु रविदास जी, सर्वश्रेष्ठ संगीत सम्राट।।
।। गुरु रविदास जी, सर्वश्रेष्ठ संगीत सम्राट।।
गुरु रविदास जी वहुआयामी, वहुप्रतिभा संपन्न क्रांतिकारी संगीतज्ञ, संगीत सम्राट हुए हैं, जिनके समक्ष, कोई भी वैज्ञानिक, धार्मिक, राजनैतिक नेता ठहर नहीं सकता है। जिस के प्रमाण प्रत्यक्ष, नृशंस बादशाह सिकन्दर लोदी, कातिल बादशाह बाबर हमारे सामने है। ब्राह्मणों की क्रूरता और मूर्खता तो जगज़ाहिर है ही, जिन्होंने मासूम दयालू राजाओँ और महाराजाओं को भी पुठठी पट्टी पढ़ा पढ़ा कर, इंसान से हैवान बना कर, राजपूतों को राजपूतों से लड़ा लड़ा कर, अकारण युद्धों में लड़ा-लड़ा कर शहीद करके, खुद एकछत्र शासन किया है, जिसे तत्कालीन अनपढ़ शासक समझ नहीं पाए थे, जिसके कारण भारत लंबे समय तक मुसलमानों और अंग्रेजों का गुलाम हो गया था। इन लोगों ने तीनों वर्णों को आपस में बुरी तरह लड़ाए रखा और खुद निठठले बन कर आनंदमय, सुखमय जीवन जीते रहे। प्रजा इन नृशंस भेड़ियों की शिकार होती रही मग़र ये लोग भेड़ियों की तरह जनता की मार काट करके नोच कर खाते रहे।
गुरु रविदास की चमत्कारी वाणी:---गुरु जी की वाणी, किसी बिजली के करंट से कम नहीं थी, जब भी वे शव्द गायन करते थे, तब खूनी कातिल भी पिघल कर मोम बन जाते थे। जब क्रूर ब्राह्मणों ने महाराजा नागरमल के पास झूठी दुर्खास्त देकर, झूठे इल्जाम लगा कर, राज दरबार में बुलाकर मानसिक रूप से प्रताड़ित करने लगे तब, गुरु रविदास जी महाराज का जो स्वरूप, राजा नागरमल ने देखा, उसे देख कर वह दंग रह गया:----
।।शब्द मेघ।।
जदों देखिआ राजे ने, रूप गुरां दा, देख के तां दंग हो गया। इह तां रव दा सरूप वण आया, दीवा देख मैं पतंग हो गया।। राजा नागरमल ऐंयूँ मसताना हो, ज्यूँ पी पी भंग मलंग हो गया।। अज देखांगे कौतुक अजब दा, देखणे दा ढंग हो गया।। चेता आ गया राजे प्रताप दा, दसणे दा ई प्रसंग हो गया। वल्लों ब्राह्मणा बड़ी दलगिरी होई सी, गुरां वल्लों खुशी, जित जंग हो गया।।
जब राजा नागरमल ने, गुरु जी को दरबार में खड़े होकर बोलते समय सुना, तो उन का सुंदर स्वरुप देख कर, उसके होश उड़ गए और बड़ा हैरान हो गया। ये तो कोई भगवान का रूप बन कर आ गया, जिस ज्योतिपुंज को देख कर, वह पतंगे की तरह उस में जलने के लिए तैयार हो गया। राजे का रूप ऐसा हो गया कि, लग रहा था कि, उसने भांग पी ली हो और मस्ताना हो गया हो। वह मन में सोच रहा था कि, ब्राह्मणों और गुरु रविदास जी के दँद्ध महायुद्ध का कौतुक देखने का विशेष अंदाज हो गया है। जिस प्रकार राजा प्रताप कुत्ते की मौत मरा था, उसी तरह आज फिर, वैसा ही कटु प्रसंग दोहराया जाएगा। ब्राह्मणों से वहुत बड़ी गलती हो गई है, गुरु जी शास्त्रार्थ में उनसे जीत गए, जिससे उपस्थित सँगत खुशी हो गई। गुरु रविदास जी का स्वरूप को देख कर, सभी मुग्ध हो गए थे, फिर उन्हें देख कर, ऐसा महसूस हो रहा था कि, वे सभी नशे में धुत हो गए हों।
इस प्रमाण से ज्ञात होता है कि, परम पिता परमेश्वर के ज्ञानी अबधूत, गुरु रविदास जी कितने बड़े आध्यात्मिक रागशक्ति और संगीत के सम्राट थे। गुरु जी ने, मारू राग में गाया है कि:---
"ऐसी लाल तुझ बिने कउन करै"।।
"गरीब निवाजु गूसिंयां मेरा"।
ये रचना तो आज हर इंसान की जुवां पर चढ़ी हुई है, जिस आज तक, कोई भी कवि आल्टरनेटिव ढूंढ नहीं सका और ना ही, इस शब्द की मधुरता और भगवान की ऐसी अतुलनीय स्तुति नहीं लिख सका।
राग भैरव में, गुरु रविदास जी ने, लिख कर सभी धर्मों के ठेकेदारों को, अक्ल देदी कि आदिपुरुष का अस्तित्व है, उसके सामने कोई भी देवी देवता नहीं है:-----
बिनु देखे ऊपजै नहीं आसा।।
जो दीसै, सो होइ विनासै।।
दो ही पंक्तियों में गुरु जी ने,सभी धर्मों के अवतारों को धराशायी करते हुए कहा, कि निरंकार को देखे और अनुभव किये बिना उसे पाने की तमन्ना ही मन में, जन्म नहीं ही लेती है, जो कुछ हम देखते हैं, वे सर्वस्व खत्म होने वाला है। तेती करोड़ देवते, इन्हीं शव्दों के भय से, पाताल लोक भाग गए और ब्राह्मणों की गरीबों को और उन्हें लूटने वाले पाखण्ड भी हवा हवाई हो गए।
बसन्त राग में रानी झालाबाई को, उसके पहरावे को, देख कर गुरु जी कहते हैं:---
तुझहिं सूझन्ता कछु नाहिं।।
पहिरावा देखै उभी जाहिं।।
महारानी झालाबाई अत्यंत सुंदर हार श्रृंगार करके, भद्दे कपड़े पहन कर, गुरु जी का सत्संग सुनने बैठ गई, उसके फूहड़ ड्रेस को देख कर, गुरु रविदास जी झालाबाई को बुरी तरह फटकारते हुए कहते हैं, हे रानी! तुझे कुछ दिखाई नहीं देता है, तुझे अपना ही पहरावा देख कर बुरा नहीं लगता है। गुरु जी कितने डिक्टेटर सम्राट हुए हैं कि, वे तत्कालीन पावरफुल महारानी के, अश्लील ड्रेस को देख कर उसे बुरी तरह झाड़ते हुए कह देते है, तुझे अपने भद्दे ड्रेस को देख कर शर्म नहीं आ रही है।
राग मल्हार में, गुरु जी लिखते हैं कि:---
नागर जना मेरी जात बिखिआत चमारं।।
हिरदै राम गोविंद गुन सारं।।
गुरु रविदास जी ब्राह्मणों के काल्पनिक बड़प्पन पर, पाषाण प्रहार करते हुए राजा नागरमल को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे राजा! मेरी जाति प्रसिद्ध चमार है, मेरे दिल में हर समय राम रहता है, जो सभी अच्छाइयों का निचोड़ है अर्थात ब्राह्मणों की खिल्ली उड़ाते हुए फरमाते हैं कि, हम उस जाति से हैं, जो चमड़े का गन्दा काम करते है मगर फिर भी भगवान तो हमारे दिल में निवास करते हैं।
राग सूही में, सुहागिन अपने प्राणप्रिय पति के प्यार का चित्रण करते हुए गुरु रविदास जी लिखते हैं:----
सह की सार सुहागन जानै।
तजि अभिमान सुख रलिआं मानै।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, पति परमेश्वर के अस्तित्व को केवल सुहागिन ही जानती है, वह अपना सारा घमंड त्याग कर, उसे खुश करके बड़े गर्व से सुखी हो कर, प्रतिदिन आनंद अनुभव करती है।
राग सोरठ में, गुरु जी लिखते हैं कि:---
जब हम होते तब तूँ नाहिं।
अब तूंही, है हम नाहिं।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, जब हम आपको नहीं पहचानते थे, तब आप नहीं थे, अब जब हमने आप को देख लिया है, तब हम नहीं रहे, अर्थात, आपके दर्शन से मेरी आत्मा आपकी आत्मा में विलीन हो गई है। अब मुझे आप ही नजर आते है कि आप ही हैं और मैं नहीं रहा हूं।
गुरु रविदास जी ने संगीतमय मधुर धुंन में ही शव्द वाणों को, ब्राह्मणवाद के किले में फेंका था, जिन से जल कर होकर ये लोग मूर्खता के नशे में व्याकुल हो कर, मदहोश हो कर आत्मविस्मृत होते गए, अर्थात मूर्ख बन कर सांसारिक आकर्षणों में, माया, मोह, के कीचड़ में धंस गए हैं। शासक भी गुरु रविदास जी की वाणी को सुन कर, हैवानों से इंसान बनते गए। गुरु रविदास जी के शव्द वाण, छंदों, अलंकारों, शव्द शक्तियों और रागों से अलंकृत होते थे, जिनके जाल में उलझ कर, ये अत्याचारी शासक, प्रशासक और सँगत तो सुधरते ही गये मगर ब्राह्मण नहीं सुधरे और आज तक भी नहीं सुधर पाए हैं।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
अगस्त 17, 2020।
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