गुरु रविदास महाराज और राग रचना।
।।गुरु रविदास महाराज और राग रचना।।
गुरु रविदास जी ने, विश्व में अदभुत काव्य रचना की अद्वितीय मिसाल प्रस्तुत की हुई है, जिसका विश्व में कोई सानी नहीं है, एक शव्द के अलग अलग अर्थ, अगर ढूंढने हों तो, केवल गुरु रविदास जी की वाणी में ही मिलेंगे। गुरु जी ने राग सिरी में शव्द लिखा है कि:--
"तोही मोही मोही तोही अंतरू कैसा?"
"कनक कटिक, जल तरंग जैसा।।"
गुरु जी पहले अर्थ में, क्रान्ति की चिंगारी छोड़ते हुए ब्राह्मणवाद की सूखी घास की झोंपड़ियों में फेंकते हुए फरमाते हैं कि, हे मनुवादी! तेरे मेरे, मेरे तेरे बीच ये किस प्रकार का भेदभाव है। ये ऊँच नीच, छूत अछूत, छोटे बड़े का क्या अंतर है, जबकि तेरा मेरा कंचन (मांस) और हड्डियां एक जैसे ही हैं। एक जैसा ही खून तेरे और मेरे शरीर की धमनियों और वाहिनियों में पानी की लहरों की तरह वहता है, फिर तूं क्यों सोने (पवित्र, श्रेष्ठ) की तरह lअत्यंत श्रेष्ठ बना हुआ है, जिस प्रकार सोने से कई प्रकार के आभूषण बनाए जाते हैं, जिनके असँख्य नाम रखे जाते हैं, अनेकों आकार होते हैं, वैसे ही तूँ और मैं भी एक ही खून, पानी, हड्डी मांस से बने हुए हैं, जिन में कोई अन्तर नहीं है। तूँ क्यों श्रेष्ठ बना हुआ है? क्यों मुझे लोहा समझता है? गुरु जी स्पष्ट इशारा करते है कि हे, शूद्रों! कोई ब्राह्मण नहीं है, सभी निरंकार दिव्यात्मा की एक जैसी सन्तानें है, किसी के गुलाम बन कर नहीं रहना चाहिए, अगर कोई ऐसा करता है तो उसका प्रतिकार करने आत्मसम्मान को आंच नहीं लगने देनी चाहिए, जिसकी रक्षा के लिए जो भी बलिदान करना पड़े, करना चाहिए।
दूसरे अर्थ में गुरु जी फरमाते हैं कि, हम ने आदिपुरुष के दर्शन कर लिए हैं, जब से गुरु जी ने उनके दिव्य स्वरूप को देखा है तब से ही वे कहते हैं कि, हे मेरे, परम् पिता परमेश्वर, आपके और मेरे बीच तो कोई भी अंतर अर्थात भेद नहीं है। जिस प्रकार सोने से असँख्य प्रकार के आभूषण, गहने बनते हैं मगर अनेकों रूप हो जाने पर भी वह सोना ही कहलाता है। सागर में पानी की संख्या तरंगे उठती हैं मगर कुछ ही क्षणों में वे पुनः पानी ही नजर आती हैं, वैसा साम्य ही तो, मेरे और आप के बीच है। इसी सिरी राग की विस्तारपूर्वक व्याख्या करते हुए, प्रोफेसर लालसिंह जी अपने शोध प्रबंध काव्य ""आदिधर्म बनाम विश्व धर्मग्रंथ पोथीसाहिब दे सिरजक सतिगुरु रविदास जी के पृष्ठ संख्या122-123"" पर लिखते हैं कि, सिरी राग में पतित हुई आत्मा को पुनः पवित्र और जीवित करने का सिद्धांत है, जिसे तोही मोही, मोही तोही शव्द के ""रहाउ"" के बीच समूचे शव्द के विषय को निश्चित किया गया है। परमात्मा, जीवात्मा के विकारों को पावन, पवित्र करने का पूरा सामर्थ्य रखता है, इसी कारण गुरु रविदास जी ने आदिपुरुष को पतित पावन कहा है।
पहले बन्द में सृष्टि की रचना के समय, आत्मा पवित्र थी परन्तु रहाउ के बीच पतित बन गई है। परमात्मा जीव आत्मा को पापों से मुक्त कर के, उसे वापस पवित्र और सजीव करने में समर्थ है:---
"जउपै हम ना पाप करंता,अते अनन्ता।।
"पतित पावन नाम कैसे हुँता।रहाउ।।"
प्रोफेसर लालसिंह जी लिखते हैं कि, इस शव्द में अज्ञानता के अंधकार से" ज्ञान के प्रकाश के बीच ला कर दुबारा सजीव करने की सामर्थ्य केवल प्रभु के पास ही है। ये शव्द सिरी राग में लिखा गया है। सिरी राग का स्वभाव और उसके अनुसार मंतव्य भी भ्रष्ट और अपवित्र हुई जीवात्मा को वापस सजीव करना ही है।
""राग नादि नादु शवदी सोहणे"" पुस्तक में गठित भारत के प्रमुख संगीत शास्त्रियों की गोष्ठी का प्रमाणित निर्णय भी, गुरु रविदास जी के शव्द में निरूपित पुनः सजीव करने की प्रौढ़ता को परिपक्व करता है।
सिरी राग अत्यंत कलिष्ठ एवं पुरातनतम मधुर राग है, इस राग को पुनर्जीवती का राग माना गया है।
गुरु रविदास जी ने, अपनी वाणी रागों में ही लिखी हुई है, भले ही उनसे पूर्व बाबा फरीद और सतगुरु नामदेव जी ने भी राग परंपरा का शुभारंभ कर दिया था, मगर उनके रागों में भी जो चमत्कारी दर्शन का समावेश किया है, वह भी गुरु रविदास जी ने ही किया है। प्रोफेसर लालसिंह जी ने सिद्ध किया है कि, भारत के प्रसिद्ध संगीत शास्त्रियों ने भी गुरु जी के रागों की महत्ता को सर्वसम्मति से स्वीकार किया है। जब कोई संस्था इस प्रकार का निर्णय देती है, तो वह वहुत बड़ी बात होती है और उन के समर्थन का संदेश संबंधित पात्र का सम्मान हजारों गुना बढ़ा देता है। वास्तव में गुरु रविदास जी, इसी सम्मान के पात्र हैं। गुरु जी के समक्ष कोई भी शक्ति और व्यक्ति उनकी आध्यात्मिक शक्ति का मुकाबला नहीं कर सका है और भविष्य में भी नहीं कर पाएगा। उन्हों ने केवल सिरी, केदारा जैतश्री, सूही चार आदर्श राग और मधुर रागनियों को जन्म दिया है। इन चारों ही राग रागनियों से निकली धुंन, प्राणियों को मदहोश कर देती है। इनकी मधुर ध्वनि जब कानों में पड़ती है, तो प्राणी मदहोश हो कर आत्मविस्मृत हो जाता है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
अगस्त 16, 2020।।
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