गुरु रविदास जी, आदर्श गृहस्थी हुए हैं।

।।गुरु रविदास जी, आदर्श गृहस्थी हुए हैं।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, अपने परिवार के बीच में ही रह कर, आदर्श पति, आदर्श पिता, आदर्श पितृभक्त, आदर्शगुरु, आदर्श समाजसुधारक, आदर्श कवि एवं लेखक एवं साहित्यकार,आदर्श संगीतकार, आदर्श धार्मिक और राजनीतिक नेता के रूप में जीवन जिया है। गृहस्थ जीवन तो, ईसा मसीह ने भी जिया, मगर, अपने शरीर को बचा नहीं पाए और परिवार को तन्हा छोड़ कर चले गए, सँगत को असहाय अवस्था में छोड़ कर चले गए। पारिवारिक जीवन तो पैगंबर मुहम्मद ने भी जिया मगर जिन मान मर्यादाओं में गुरु रविदास महाराज ने जीवन जिया, वैसा जीवन उनका भी नजर नहीं आता मगर गुरु रविदास जी के जीवन की ओढ़नी पर सांसारिकता का रंच मात्र भी बदनुमा दाग नही मिलता है। गृहस्थी तो बुद्ध भी हुए मगर वह भी, पत्नी वच्चे को, घर में विलखते हुए छोड़ कर, अपनी सुख शान्ति की खोज के लिए वनों में चले गए।
आदर्श पुत्र:----गुरु रविदास जी, ही विश्व में ऐसे बेटे हुए हैं, जिन्होंने अपने मातापिता का नाम सूर्य चांद की तरह रोशन किया है।जन्म लेते समय ही अंधी दाई को नेत्रदान देने वाले पहले अवतारी पुत्र वही हुए हैं। उसके बाद निर्जीव खिलौनों में भी प्राण डाल कर, उन्होंने ही भगाया है। उन्होंने ही बुआ के बेटे रैदास जी महाराज और मामा के बेटे जीवनदास जी के मानसिक सन्देहों को दूर कर, अपने दिनरात के सेवक बना कर, देश विदेश में भ्रमण कर, सामाजिक परिवर्तन किया है।
सामाजिक परिवर्तन के मसीहा:---गुरु रविदास जी के समय तक, कोई भी अछूत गेहूं चावल जैसे स्वास्थ्य बर्धक अनाज नहीं खा सकते थे, मग़र गुरु जी ने ब्राह्मणवाद के, फ़तबों से शूद्रों को मुक्त करबाते हुए, राजाओँ बादशाहों से, इन प्रतिबंधों को समाप्त कराया है। कुओं और बाबलियों, से पानी भरने और पीने का प्रतिबंध हटाए।छुआछूत जैसे अमानवीय कानूनों को भी शासकों से समाप्त करवाया।
धार्मिक आजादी की क्रान्ति:---सिंधुघाटी की सभ्यताओं के बाद से, मनुवादियों की मनुस्मृतियों के आधार पर, शासन चलता आया था जिसके अनुसार शूद्र, किसी भी प्रकार का सत्संग, कथा, प्रवचन नहीं सुन सकते थे, सुनने पर शूद्रों के कानों में गर्म गर्म सिक्का भर दिया करते थे, जिह्वा काट दी जाती थी, जिंदा जला दिया जाता था, किसी को मारने के लिये बलि के नाम पर देवताओं को खुश किया जाता था जिसके लिये कोई दण्ड नहीं था, गुरु रविदास जी ने ऐसे  अमानवीय कानूनों को रद्द करवाया था, तभी धार्मिक आजादी दिलाई थी। जब शूद्रों को कोई नामदान, सत्संग प्रवचन देने वाला कोई नहीं था तो खुद ही गुरु रविदास जी ने धार्मिक रचनाएं रची, खुद ही उनके सत्संग किये, खुद ही उनकी व्याख्याएं की, खुद ही उपदेश दिए, खुद ही अछूत संगतों को राम नाम सोहम का दान किया, खुद ही संगतों से होने ब्राह्मणवादी अत्याचारों को सहन किया। गुरु जी ने क्रांतिकारी कदम उठाते हुए कहा:---
रविदास बामन मत पूजिए,जउ होवै गुणहीन।
पूजहिं चरण चंडाल के, जउ होवै गुन परवीन।।
जात पात ना पूछै ना कोय,
प्रभु को भजै सो प्रभु होय।
गुरु रविदास जी ने धार्मिक सन्तों का समूह भी तैयार किया जिसमें सतगुरु कबीर जी, सतगुरु नानकदेवजी, सतगुरु नामदेब जी, सतगुरु सेन जी, सतगुरु धना जी, सतगुरु सधना जी, सतगुरु पीपा जी,सतगुरु वेणी जी, सतगुरु कमाला जी। पूज्य मीराबाई सहजोबाई, झालाबाई, आदि असँख्य भक्तिनों को भी भक्तिमार्ग पर चला कर नारी भक्ति के निषेध को भी खत्म किया।
क्रांतिकारी राजनेता:---गुरु रविदास जी, एक क्रांतिकारी, परिवर्तनवादी, निरंकुश शासक हुए हैं। जिस किसी पापी को मृत्यु दंड देना होता था तो वह उसी के दुश्मन से दिला दिया करते थे, राजा कुंभसिंह ने, ना जाने कितने निरपराध लोगों को मौत के घाट उतार कर, कितनी औरतों के सुहाग उजाड़े होंगे मगर उसकी रानी झालाबाई के अनुरोध पर उसे शिष्य बनाना ही पड़ा था, तव उसी के पापी अत्याचारी बेटे उदय से, राजा कुंभसिंह को लड़वा कर, परीक्षा ले ली, कि क्या वह मेरा शिष्य बना रहता है या उसके दबाब में आ कर मुझे त्याग देता, जब उदय पिता को सवर्ण गुरु धारण करने के लिए विवश करता है और कुंभसिंह, बेटे उदय को ऐसा करने से, इन्कार कर देता है, तब राजकुमार उदय, अपने वाप का कत्ल कर देता, जो किसी भी शिष्य की सर्वोच्च परीक्षा ही कही जाएगी।
गुरु जी पक्के समाजवादी:---गुरु रविदास जी, विश्व के पहले स्टेटसमेन हुए, जिन्होंने समाजवाद की परिभाषा को जन्म दे कर, तानाशाही के कफ़न में ऐसी कीलें गाड़ी, कि तानाशाहों का जन्म कम हो गया, सभी तानाशाही त्याग कर गुरु जी के सिद्धान्त पर राज करने लगे।
ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिले सभन को अन्न।
छोटी बड़ सभ सम वसै, तां रविदास रहै प्रसन्न।
गुरु रविदास जी महाराज ने ही, शूद्रों को आदर्श जीवन जीने का स्वाद पैदा किया है, शूद्र गुलामी को भूल गए थे, शूद्र मौलिक अधिकारों को भूल गए थे, शूद्र भगवान के आदेशों को सर्वमान्य समझ बैठे थे और पशुओं की नारकीय जिंदगी जी रहे थे, क्योंकि ब्राह्मणों ने, शूद्रों के दिमाग में ये घुसेड़ दिया था कि, जातियां, कार्य, पेशे सब ऊपर से भगवान ने तय किए हुए हैं, जिन ईश्वरीय आदेशों को, शिरोधार्य करके टट्टी के ढेर सिर पर उठा कर भी शर्म, हया अनुभव नहीं किया करते थे, बस जानबरों की तरह ब्राह्मणों के गुलाम बन कर, अपने जीवन को हंका रहे थे। भगवान का भय भर दिया गया, जबकि ब्राह्मण अछूतों को भगवान के पास जा कर, उसके मन्दिरों का मुंह तक भी देखने नहीं देते थे, किसी भी शूद्र को, भगवान के दर्शन करने नही दिए जाते, ये भगवान को, मात्र योनि और लिंग कहते हैं, क्योंकि भग (स्त्रीयोनि) जमा वान (पुरुष लिंग) बराबर भगवान, पर जमा भू अर्थात पराई भू से आया हुआ प्रभु, ब्रह्मा नामक ब्राह्मण से ही ब्रह्मण्ड (ज्योतिर्मंडल) ब्रह्मलीन (ज्योतिर्लीन) ब्रह्मज्ञान (ज्योतिर्ज्ञान) ब्रह्मज्ञानी (ज्योतिर्ज्ञानी) ब्रह्मपुत्र, (ज्योतिर्पुत्र) ब्रह्मभोज (ज्योतिर्भोंज) ब्रह्मदत्त (ज्योतिर्दत्त) ब्रह्मकुमार (ज्योतिरकुमार) ब्रह्मकुमारी (ज्योतिरकुमारी) शब्दों की उतपत्ति की गई है। ब्रह्मा नामक खुंखार विदेशी यूरेशियन आक्रमणकारी के नाम पर रखे हुए कपटी, प्रपंची शब्दों के अर्थों को ब्राह्मण जानते हैं। यही कारण है कि, ये ब्राह्मण लोग भगवान को मात्र ढोंग मानते है, हम भगवान को स्वर्ग नरक देने वाला दाता, जन्म मरण देने वाला न्यायधीश मानते हैं, जबकि कोई जन्म मरण नहीं होता है, मरने के बाद आत्मा ज्योतिर्मंडल में समा कर ज्योतिर्लीन हो जाती है, जिस का प्रमाण हमारी सच्ची सरकार, बाबा सिद्ध चानो जी महाराज हैं, जिनका नाम लेते ही, हमारी समस्याओं का निपटारा शुरू हो जाता है, पीड़ित व्यक्ति तुरन्त स्वस्थ हो जाता है। वे ज्योतिर्मडल में नहीं होते, तो किस प्रकार हमारे दुखों का निवारण करते। वास्तव में, हमें दासता और असँख्य गुलामियों से मुक्त, केवल केवल गुरु रविदास जी ने किया है, जिनका हमारे लोग नाम ना लेकर, जाटों के डेरों में जा कर, बुरी तरह से जलील होते हैं।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
अगस्त 18, 2020।

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