गुरु रविदास जी का आदिधर्म अपनाना क्यों जरूरी?

गुरु रविदास जी का आदिधर्म अपनाना क्यों जरूरी?
गुरु रविदास महाराज ने आजीवन, वहुजन समाज की एकता, अखंडता, मान-सम्मान और वहुजन राज की स्थापना के लिए ही, अर्पित कर दिया था, मगर कुछ मनुवादी वहुजन समाज के राजनेता और धर्म नेता जो मनुवाद के दल्ले दलाल बन कर, उन के द्वारा, मुंह में डाली गई हड्डियां चूसते आ रहे हैं और वहुजन समाज के नाम पर कलंक बन कर, वहुजन लोगों के हितों को बेच कर खाते आ रहे हैं, जिसका परिणाम सुप्रीमकोर्ट ने, पच्चीस अगस्त को,आरक्षण खत्म करके निकाल दिया, आरक्षण का खून चूसने वाले सांसदों और विधायकों की जमीर ने सामूहिक त्यागपत्र देने की हिम्मत तक नहीं की। इन लोगों ने आरक्षण अपने परिवार की गरीबी को मिटाने के लिए, तेज हथियार बनाया हुआ है, मगर आरक्षण की रक्षा करने के लिए तैयार नहीं है।
गुरु रविदास जी ने राजा नागरमल, राजा पीपा से, आज से पांच सौ साल पहले ही अछूतों के लिए आरक्षण, मन्जूर करवाया था लेकिन उसकी नालायक औलादें, संसद और विधानसभाओं में बैठ कर, आरक्षण को बचा नहीं सकीं, अगर इन्होंने माँ का दूध पिया होता तो, पच्चीस अगस्त को ही सामुहिक त्यागपत्र देकर, बेईमान जजों की औकात दिखा देते, इन्हें तो प्रधानमंत्री भी मूर्ख बनाते आए है कि, ये वहुजन समाज के अधिकारों की सुरक्षा के लिए, कानून तो बना देते रहे, ताकि इन बुद्धिमानों का मुंह बंद कर दिया जाए मगर लागू नहीं करते, पचासिवां संशोधन इस बात का प्रमाण है। तीन प्रतिशत ब्राह्मणों के जजों ने, पचासी प्रतिशत वहुजन समाज को गुलाम बना कर रख दिया है, मगर पचासी प्रतिशत मूल  निवासी समाज के राजनेता और धर्मनेता, ब्राह्मणवाद की हड्डियां चूस कर, समाज को डिफेंस देने में असमर्थ हैं।
आदिधर्म मंडल के अध्यक्ष साहिबे कलाम मंगू राम मुगोबाल ने, सन 1931 तक आरक्षण लागू करवा लिया था, भारत की जनगणना में भी आदिधर्म को शामिल करबा लिया था, टीचरों के स्पेशल बैच निकलवा लिये थे, मकान की जमीनों के मालिक बना लिए थे मगर आज लोकसभा में बैठे दलाल वहुजन समाज के अधिकारों को बचा नहीं सके।
आदिधर्म मंडल को मजबूत करो, बाकी धर्मों के दलाल बन कर अपनी एकता खंडित मत करो अन्यथा इतिहास तुम्हें कदापि मॉफ नहीं करेगा। चमार जाति ही मार्शल जाति है मगर ब्राह्मणों ने, चमारों को बौद्ध बनाया, सिख बनाया, क्रिश्चियन बनाया, मुस्लिम बनाया, राधास्वामी बनाया निरंकारी बनाया, जैनी बनाया और नया धर्म रविदासी बनाया, जिससे, वहुजन समाज की एकता छिनभिन्न कर दी, जब से हमने, आदिधर्म को पुनः जिंदा करना शुरू किया हुआ है, तब से आदिधर्म से हिन्दू इतना भयभीत हो चुका है कि, अछूत संतों को भी खरीद लिया है, गुरु रविदास जी के नाम पर पीठें बना कर बड़े बड़े अध्यक्ष पदों के मालिक बना कर उनकी आंखों में धूल झोंकी हुई है, ताकि गुरु रविदास जी के नाम पर अछूत एक मंच पर आ कर इकठे हो ही ना सकें। 
अछूत सिख इसलिए बने थे कि, वहां सभी गुरुओं के जो सिख बनेंगे वे, एक समान सिख होंगे, कोई छुआछूत नहीं होगी, कोई ऊँच नीच नहीं होगी, सभी सिर पर केस धारण करके सरदार होंगे,सभी एक समान हकों के हकदार होंगे, सभी समझदार होंगे मगर वहां भी ब्राह्मणों ने अपने ब्राह्मण भरे हुए हैं, जिन्होंने डाक्टर भीमराव अंवेदकर को सिख धर्म मे शामिल नहीं होने दिया मगर फिर वह हिंदुओं के ही बनाए हीनो के लिए हीनयान बौद्ध धर्म में जबरन चले गए और आदिधर्म को, कत्ल कर गए, यदि वे आदिधर्म में रहते तो आज उनकी घर घर पूजा होती और आज मूलनिवासियों को आरक्षण के लिए रोना नहीं पड़ता, ना ही आरक्षण की जरूरत होती, ना ही गुलाम सांसद और विधायक होते, आज जज भी मूलनिवासी होते, जिलाधीश चीफ कमिश्नर भी मूलनिवासी होते, डीजीपी भी भारतीय मूलनिवासी होते और गुरु रविदास जी का बेगमपुरा वसा हुआ होता, मगर हम सब मूलनिवासियों को हमारे ही नेता धर्मों के जाल में उलझा कर गुलाम बनाते आए हैं। साहिबे कलाम मंगू राम मुगोबाल ही ऐसे वीर पुरुष हुए, जिसने ब्राह्मण, राजपूत, सिख, ईसाई, मुसलमान सब को आदिधर्म में शामिल किया था मगर उनके नालायकों ने आदिधर्म को जो आघात पंहुचाया उससे आज आरक्षण समाप्त हो गया। कहीं कोई सम्मान नहीं रहा, पंजाब के मूलनिवासियों ने सिख धर्म समानता के लिए ही अपनाया था, मगर 15 मार्च 2010 को जो छुआछूत की अमानवीय घटना, जो पंजाब लुधियाना के समीप नूरमहल में घटी थी, वह तो दिल को दहलाने वाली थी जिसका विवरण उस समय हिंदुस्तान टाइम्ज ने लिखा था:-----
" Members of the Sikh religion and Ravidasia community had been visiting the new Gurudwara premises too.At a later stage, on being objected to their entry in the new Gurudwara premises, members of Ravidasia community got annoyed,Tension got aggravated when both the factions indulged on bricks war batting outside the old Guru Duwara premises, अर्थात सिख धर्म और रविदासी कौम के लोक नए गुरुदुआरे में भी जाते थे।कुछ समय पूर्व सिख धर्म के लोगों ने (रविदासी कौम के लोगों को नए गुरुदुआरे के में प्रवेश करने से रोक दिया) तब रविदासी कौम के लोग नाराज हो गए।--------तनाब बढ़ गया और पुराने गुरुदुआरे के बाहर दोनो तरफ से ईंटों की बरसात शुरू हो गई।
प्रोफेसर लालसिंह जी, अपने शोध काव्य, "आदिधर्म बनाम विश्व धर्मग्रंथ आदि पोथी साहिब दे सिरजक सतिगुरु रविदास जी" के पृष्ठ 24-25 पर लिखते है कि, अछूतों,
आदिनिवासी, मूलनिवासी, शूद्रो को डराने धमकाने के लिए सिख जाटों ने गुरुदुआरों में प्रवेश करने से रोक दिया था। ये घटना जत्थेदार अकाल तख्त साहिब गुरवचन सिंह और एसजीपीसी के प्रधान अवतार सिंह मक्कड़ की दी गईं धमकियों का ही परिणाम है, कि उच्च जातीय जट सिखों ने, आदि निवासी अछूतों शूद्रों को बुरी तरह से डराया और धमकाया और नए गुरुदुआरे में प्रवेश करने नहीं दिया। सन1926 में बने आदिधर्म को पुनः सुरजीत करना इसलिए जरूरी हो गया था, क्योंकि एकनूर खालसा फ़ौज वाले मर्यादा का पज ( बहाना) पा कर गुरु ग्रँथ साहिब को उठा कर ले आते हैं। इस करके 1926 ईस्वी में घोषित किये गए आदिप्रकाश ग्रँथ को पुनः सुरजीत करना पड़ा।
गुरु रविदास जी ने कहा था:---- 
आद से परगट भयों, जा को ना कोउ अंत।
आदधर्म रविदास का, जाने कोउ विरला सन्त।
जब आदिधर्म, गुरु रविदास जी महाराज ने हमें, आज से पांच सौ साल पहले दिया था, तो फिर, शूद्र, मनुवादी मन्दिरों में जा कर धक्के क्यों खाते हैं? क्यों ब्राह्मणों, जाटों के मंदिरों में जा कर अपमानित होते हैं? जब तीन प्रतिशत ब्राह्मणों ने सारी धार्मिक व्यवस्था को हाईजैक करके, सारे भारत को अपनी धार्मिक गुलामी से लाद रखा हुआ है, तो सत्तानवे प्रतिशत भारतीय अपने पांवों पर खड़े होकर अपनी धार्मिक व्यवस्था कायम क्यों नहीं करते? क्यों ना अपने सच्चे गुरुओं सिद्धों के मंदिरों में पूजा अर्चना करते हैं? क्यों अपना धन दौलत उन मन्दिरों में चढ़ाते जहाँ, हमें कोई मान सम्मान नहीं मिलता है? गलती तो शूद्रों की अपनी है। भगवान चानो और उनकी पत्नी लोना चमारी उर्फ कामाख्या देवी ही सभी को न्याय देती है, सभी की मुशीबतों को सुन कर तत्काल कार्यवाही करते हैं, फिर क्यों उन लोगों के मंदिरों में जाते हैं जिन के अंदर कोई सत्य नहीं है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
अगस्त 31,क 2020।

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