गुरु रविदास जी महाराज, अद्वितीय कवि।
।।गुरु रविदास जी महाराज, अद्वितीय कवि।।
गुरु रविदास जी के संपूर्ण काव्य जगत को खोल कर अध्ययन किया जाए तो कोई भी कवि उनका सामना नहीं कर सकता हैं।कोई भी उनकी काव्य प्रतिभा के सामने टिक नहीं सकेगा। केवल यही नहीं समूचा साहित्य जगत चाहे वे लेखक,नाटककार, उपन्यासकार एकांकीकार कहानीकार ही क्यों ना हों मगर गुरु रविदास जी की काव्य कुशलता के सामने कोई बजन नहीं रखते। गुरु रविदास जी आज से पांच सौ साल पूर्व हुए हैं, उनके समकालीन, श्रेष्ठ कवियों की कविताओं से, तुलनात्मक अध्ययन किया, उन की शब्द रचनाओं से, तुलना की जाए कि, सभी ने अपनी जवानी के रंगीन पलों की परछाइयों में जीवन व्यतीत किया है, रंगीन सौंदर्य का लुत्फ उठाया है, रंगीन नायिकाओं की विकृत छटाओं को मन मे जज्ब किया था, वालपन की अदाओं को खुद किया है और देख कर उनका आनंद लिया है तभी तो, उनकी रचनाओं में उनके हाव भावों का चित्रण उन कवियों ने किया क्यों, रामचन्द्र शुक्ला जी कहते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है मगर मैं तो ये भी कहता हूं कि" साहित्य में कवि लेखक भी छुपा हुआ होता है" क्योंकि साहित्यकार जो कुछ लिखता है, वह सारे का सारा उसका अपना नहीं होता है, होता है तो केवल उस का मन, मष्तिष्क, बुद्धि, कल्पना और पारिवारिक संस्कार, बाकी उसके विषय जिन पर लिखता है, वे सभी समाज और वातावरण से ही, उधार ले कर, समाज के सामने उड़ेल देता है, जिस का प्रभाव समाज पर अवश्य पड़ता है, जिस प्रकार सूरदास जी ने, कृष्ण का भँवरगीत आदि में चित्रण किया है, गोपियों से कृष्ण की छेड़छाड़ का चित्रण किया हुआ, उससे वर्तमान युवा भी, वैसी ही हरकतें सीखते है और कृष्ण बन कर, लड़कियों पर भद्दे,गन्दे कमेंट हमने अपने कानों से सुने हुए हैं और आंखों देखे हैं तुलसीदास को, उसकी पत्नी ने फटकारा, कि "धिक धिक ऐसे प्रेम को दौड़े आईओ साथ" ने उसे नारी जाति का विद्रोही बना दिया, जिस के आहत हो कर वह अपनी बुद्धि का दिवाला ये कह कर निकालता है कि:----
ढोल गंवार शूद्र पशु नारी,
ये सभ ताड़न के अधिकारी।
क्या ये किसी सर्वश्रेष्ठ कवि की कल्पना हो सकती है? क्या ये कथन सराहनीय है? क्या ये पंक्तियां तुलसीदास की मूर्खता की पराकाष्ठा नहीं है? विकृत बुद्धि की द्योतक नहीं है? क्या ये कथन समाज सुधारक है? क्या कोई बुद्धिमान अपनी माताश्री वहन को ऐसा घटिया कमेंट कर सकते हैं? गुरु रविदास जी के संपूर्ण साहित्य को खरोल कर देख लो कि, कहीं भी रंच मात्र श्रृंगार का लेशमात्र भी पुट कहीं मिलता है, कहीं भी हास्य रस का चित्रण कहीं नहीं मिलता है, नारी ही नहीं किसी भी इंसान की शान के खिलाफ कोई भी टिप्पणी की हो, कहीं भी असहायों की शान के खिलाफ कोई आपत्तिजनक चित्रण किया है, फटकारा है तो पाखंडियों, ढोंगियों, आडंबरियों को ही फटकारा है, फटकारा है तो भोगविलासी शासकों को। सुधारा है तो भूले भटके हुए शासकों को बादशाहों को, लूटने वाले तिलकधारियों को, मुल्लों को काजियों को जो कि अल्ला, गॉड, राम ओर रहीम के नाम पर समाज को ठग कर, उनके खून पसीने की कमाई को निगलते आए है, फटकारा है उन्हें जो दूध को लिंग के उपर उड़ेलने वाले मूर्ख पण्डों को, ना कि सभी ब्राह्मणों को, वहुत बुरी तरह फटकारा है तो करोड़ों की संख्या में हरी चादरों को दफन किये गए मुल्लों मौलवियों के शवों पर चढ़ाने वालों को, फटकारा है तो क्रिश्चियन पादरियों को जो हररोज करोड़ों रुपयों की मोमबत्तियां जला कर धन को बर्बाद करते हैं, गुरु जी तो केवल और केवल घर में ही बीबी वच्चों के बीच सन्तोष सबर के साथ फालतू समय में जो रोजी रोटी कमाने के बाद बचता है उसमें, मौन धारण कर सो सो करते हुए सांस को दसवें द्वारे तक चढ़ाने और हम हम कहते हुए सांस को दसवें द्वार से धीरे धीरे पुनः नाभि तक वापस लाने के कहते है, जिससे एक पंथ दो काज होते हैं, एक तो मन मस्तिष्क स्वच्छ हो जाता है, दूसरा हंस प्राणयाम हो जाता हैं, जिससे शरीर में थोक में आक्सीजन प्रवेश करती जाती है और कार्बनडाइआक्साइड बाहर आती है क्योंकि जितनी मात्रा में शरीर में ऑक्सीजन अधिक जाती है उतनी ही मात्रा में शरीर की बीमारियां समाप्त होती हैं। गुरु जी एक वहुत बड़े वैज्ञानिक हुए है, उनकी सारी साधना विज्ञान पर आधारित है, रोजी रोटी पर आधारित है, ये नहीं कि बड़े बड़े धोतड़े लगा लो, बड़े बड़े तिलक लगा लो, बड़े बड़े त्रिपुण्ड लगा कर इंसान की शक्ल ही बदल कर भैरों की तरह रूप कुरूप बना लो। वे तो जिस ढंग से जन्में हैं वैसे ही जिंदगी जीने के लिए उपदेश दिया करते थे, यही सतसन्देश, गुरु जी की काव्य रचना में ही मिलता है, जो किसी भी कवि की रचना में नही मिलता है। गुरु जी ही पहले और अंतिम कवि हुए हैं जिनकी कविताओं, शब्दों में श्रृंगार और हास्य रस को इज्जत नहीं मिली। आज कवि औऱ कवयत्रियाँ तो इन्हीं दो रसों की उतपति है। भरे मंच पर ही, ये लोग इन्हीं रसों से बुरी तरह तरह लथपथ हो जाते हैं और जिससे उनका आनंद लुच्चे, गुंडे, रसिक ही ज्यादा उठाते है, इसलिए गुरु रविदास महाराज के सामने सभी साहित्यकार बौने ही हैं।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
अगस्त 19,2020।
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