गुरु रविदास और हिंदी गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ संस्करण।।

गुरु रविदास और हिंदी गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ संस्करण।।
गुरु रविदास जी महाराज ही, संसार में,एक ऐसी शक्ति हुई है जिसने, खूंखार बादशाहों की खूनी तलबारों को रोक कर, भारत में रह रहे यूरेशियन लोगों के प्राणों की रक्षा की है, मगर जब से अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए, तब से ही, बाकी बचे यूरेशियन, भारत के आदवंशी, मूलनिवासियों को अपनी दादागिरी दिखाने लगे हुए है। जब मैंने, पंजाब के आनंदगढ़-महिलांवाली में, गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ का पंजाबी से हिंदी में अनुवाद करके, हिंदी के प्रथम संस्करण का जब शुभारंभ किया था, उस दिन से ही पंजाब में भूचाल आ गया कि, गुरु रविदास जी के अनुयायियों ने नए ग्रँथ का प्रकाश करके पंजाब में वहुजन समाज को सिखों से अलग कर दिया है। पंजाब के मनुवादी लोगों को भयंकर खतरा हो गया कि, अब मूलनिवासी हमारी गुलामी को सहन नहीं करेंगे। पहले तो हमें मनुवादी अपने मन्दिरों गुरुदुआरों में प्रवेश करने ही नहीं देते थे, प्रवेश करें भी तो माब्लिंचिंग करते आए हैं। ये कितने धार्मिक लोग हैं, इनके कारनामों से ज्ञात हो जाता है। जो मनुवादी लोग धर्म के ठेकेदार बने हुए हों, फिर सच्चे मन से भगवान का नाम जपने वालों को गुंडागर्दी दिखाएं, डराने के लिये धमकियां देकर, कोर्ट और कचैहरियों का आतंक दिखाएं, वे कितने भगवान के भगत हैं! सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। हम अपने गुरुओं की वाणी इकठ्ठी करके अपनी पूजा करें, अर्चना करें, अगर उससे भी किसी को परेशानी हो, तो वे किस प्रकार के धार्मिक लोग हैं? कितने धर्म के सच्चे पैरोकार है? आसानी से समझा जा सकता है, फिर ये ढोंग करने वाले लोग किस प्रकार भगवान को प्रिय लगते है? भगवान किस प्रकार इन्हें, इन की गुंडागर्दी को माफ करेंगे। 
जब हम ने, गुरु रविदास जी महाराज की वाणी का ग्रँथ अपने भाइयों को उपलब्ध करबाना शुरू किया है तब से ही, पंजाब में गुरु रविदास आददुआरों से गुरु ग्रँथ साहिब को उठाना शुरू कर दिया गया, मगर जब किसी ने भी इस का विरोध नहीं किया और गुरु ग्रँथ साहिब को उठाने का तनिक भी विरोध नहीं किया, गुरु रविदास के सेवक खुद ही इसके स्थान पर गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ का प्रकाश करने लग पड़े, तब फिर मक्कड़ साहिब, गुरु ग्रँथ साहिब को, उठाने वालों को धमकियां देने लग पड़े। अरे भाई जब तुम चमारों को गुरुआरों में, प्रवेश से दुखी होते हो, गुरु ग्रँथ साहिब के हमें दर्शन करने से दुखी होते हो, तो कम से कम हमें अपने गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ को तो पढ़ने दो, उस का सत्संग तो करने दो और सुनने दो! क्या हम आप के गुलाम है? क्या अब भी पुष्यमित्र शुंग का युग है? कि, जैसे चाहो भारत के मूलनिवासियों को डराते रहो, धमकाते रहो अगर आप गुरुदुआरों में गुरुओं की भक्ति करते हो, तो भगत बन कर करो ना, भगतों को दादागिरी, गुंडागर्दी मत दिखाओ। हमारी भक्ति में तो गुरु रविदास जी महाराज ने शान्ति के बीच अशांति क्रिएट करने की बात तो नहीं की, और समझाया हुआ है, वे कहते हैं कि जियो और जीने दो। धरती पर सभी प्राणी स्वतंत्र हैं, जब भी कोई किसी की आजादी में खलल मचाता है, आदिपुरुष कभी सहन नहीं करता है। हम भगवान चानो चमार और माता लोना चमारी के पुत्र और पुत्रियां हैं, जिनसे जो पंगा लेता है, वह सुखी नहीं रहता है, उनके वंश तक भी चानो चमार जी खत्म करते आए है, अगर किसी को शक हो हिमाचल प्रदेश के गाँव संतोषगढ़ में, उस परिवार के बारे में पता कर लो, जिस ने गुरु रविदास जी महाराज के मंदिर की जमीन हथिया कर मंदिर गिरवाया था, जिस के एवज में, उसी परिवार ने 2009 में अपने ही  परिवार के सात आदमी इकठ्ठे खो दिए थे, इसलिये गुरु रविदास जी के अनुयायियों को डरा कर धमकियां देना उचित नहीं है।
प्रोफेसर लालसिंह जी "अपने शोध काव्य आदिधर्म बनाम विश्व धर्मग्रंथ आदि पोथी साहिब दे सिरजक गुरु रविदास जी" के पृष्ठ संख्या 24-25 पर पजाबी में लिखते हैं कि जन जागृति के एक फरवरी 2008 के अखवार में पुरखालवी लिखते हैं:----
"श्री पुरखालवी ने कहा है कि, बीते दिनों एकनूर खलसा फ़ौज द्वारा, पंजाब मालबे में रविदासी समाज के कई गुरुदुआरियों में से जबरदस्ती श्री गुरुग्रन्थ साहिब जी के सरूपों को उठाने की घटनाओं ने बहुजनों को यह कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा"।
प्रोफेसर लालसिंह जी लिखते हैं कि, "अब बिलकुल ही उलट हो गया है। अब एसजी पीसी के प्रधान, धमकियां दे रहे हैं कि, जो भी गुरु ग्रँथ साहिब के सरूप को उठाएगा, उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। क्या अब मर्यादा पालना शुरू हो गई है? मर्यादा तो पहले की ही तरह चल रही है, अब जब आदिवासी अछूतों की अणख(स्वाभिमान) ने हुलारा खाया है, उनकी अणख जाग गई है, वे अपनी इज्जत बचाने के लिए ही ऐसा कर रहे हैं।
प्रोफेसर लालसिंह जी आगे लिखते हैं कि, अब धमकियां ही नहीं बड़ी सख्त धमकियां मिल रहीं हैं। एसजीपीसी के प्रधान सख्ती के साथ निपटें गे, जो लोग गुरु रविदास जी की गुरु ग्रँथ साहिब के बीच दर्ज वाणी को एक पोथी का रूप देकर, पूजापाठ करेंगे, भावार्थ जोर जबर ( बलपूर्वक) के साथ नजिठिया (निपटा) जाएगा। जगवाणी के उन्नीस सितंबर 2009 के पृष्ठ-3 के ऊपर मक्कड़ साहिब का बयान इस तरह दर्ज है:----
" उन शरारती अंसराँ (तत्वों) को सख्त ताड़ना करते हुए कहा, कि जो लोग गुरु घर में गुरु मर्यादा के बीच तब्दीलियां करना चाहते हैं, वे किसी भी कीमत पर नहीं की जाएंगी, और भगत रविदास जी की वाणी को गुरुग्रँथ साहब से अलग नहीं होने दिया जाएगा। श्री गुरु ग्रँथ साहिब की बेअदबी हरगिज बर्दास्त नहीं की जाएगी औऱ इसके जिम्मेदार  दोषिओं के खिलाफ सख्ती से निपटा जाएगा।
यही खबर हिन्दोस्तान टाइम्ज पेपर के बीच 19-9-2009 को पृष्ठ-2 के ऊपर भी छपी है। 
प्रोफेसर लालसिंह जी आगे लिखते हैं कि, आज तक किसी ने नही कहा कि, गुरु ग्रँथ साहिब में से गुरु रविदास जी की वाणी निकाल दो, आदिवासी, शूद्र और अछूत तो अपने पियो-दादे की वाणी का पाठ करके,  उसके ऊपर अमल करके अपना जीवन सफल करना चाहते हैं, इसलिए ये इतराज करना उचित नहीं है।
अब गंभीर प्रश्न उतपन्न होते हैं कि:----
क्या अपने ही भारत में आदवंशी और मूलनिवासियों को अपनी इच्छानुसार, अपने गुरुओं पीरों की भक्ति से किसी को रोकने का अधिकार है?
क्या गुरु साहिवान, किसी के भी वाप की संपति है कि, जिसे कोई दूसरा व्यक्ति छीन सकता है? 
क्या मूलनिवासी किसी ब्राह्मण जाट के गुलाम हैं?
क्या किसी को ये ईश्वरीय अधिकार मिला हुआ है कि, वह किसी को दादागिरी दिखा कर धमकियां देता फिरे?
क्या किसी मंदिर और गुरुदुआरे के  सेवक को अधिकार है, कि वह किस किस को धर्मस्थलों के अंदर जाने से रोक सकता है?
क्या ऐसा करने वाले, ईश्वर के पुजारी या भगत हो सकते है?
आज राष्ट्रपति रामनाथ कोविद्व जी के साथ ऐसा हुआ है, कि उन्हें मंदिर में प्रवेश करने नहीं दिया गया, फिर अगर ऐसा ही सर्वोच्च पदासीन राष्ट्रपति से दुव्यवहार हो रहा हो, तो आम गरीब मूलनिवासियों के साथ क्या हो सकता है?  सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
मेरी समस्त मूलनिवासियों से अपील है कि सभी गुरुओं की वाणी की इज्जत करते हुए, अपने ही गुरुओं के पूजा स्थलों, गुरु घरों में पूजा अर्चना की जाए और वह भी अपने ही आदिवादी गुरुओं की, किसी भी ब्राह्मण और जाट के पूजा घरों में बिलकुल ना जाएं, ताकि उनकी पवित्रता को कोई भी किसी भी प्रकार की आंच ना आए और ना ही आप का चढ़ावा गलत स्थान पर जा कर बर्बाद हो सके, क्योंकि ये पूजा घर तो उन्होंने बनाए हैं, ये उनका अधिकार है कि वे किसी को वहां जाने दें या नहीं, इससे मनुवादी ब्राह्मणों और जाट लोगों की सारी परेशानियां भी समाप्त हो जाएंगी और आप का धन भी बर्बाद होने से बचेगा।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
सितंबर 01, 2020। 

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