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Showing posts from January, 2021

भारतवर्ष की संविधान सभा के सदस्य।

।।भारतवर्ष की संविधान सभा के मैंबर।। स्वतंत्र भारत के लिए संविधान लिखने के लिए, एक संविधान सभा का चुनाव किया गया था, जिस के 389 सदस्य चुने गए थे। भारत के सभी प्रांतों के 292, भारतीय रियासतों में से 93 और चार सदस्य चीफ कमिश्नर के प्रांतों में से लिये गए थे। इस कमेटी की एक उस समिति प्रारूप कमेटी बनाई गई थी, जिस के अध्यक्ष डॉक्टर भीमराव अंबेडकर मनोनीत किये गए थे। इस प्रारूप सभा के निम्नलिखित सात सदस्य थे:--- 1 डॉक्टर भीमराव अंबेडकर। 2 अलादी कृषणा स्वामी अय्यर। 3 एन गोपाल स्वामी अय्यंगर। 4 के एम मुंशी। 5 मुहम्मद साउदुल्ला। 6 बी एल मित्र।  संविधान की प्रारूप कमेटी की केवल पहली बैठक में ही बी एल मित्र ही शामिल हुए थे, उस के बाद वे बैठक में नही आए, जिस के कारण उन की सदस्यता समाप्त हो गई थी। पांच दिसंबर 1947 को, उन की जगह एन माधव राव को मनोनीत किया गया था। 7 एन माधव राव। 8 डी पी खेतान। 9 टी टी कृष्णामचारी। डॉक्टर भीमराव अंबेडकर प्रारूप सभा के अध्यक्ष :--डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को पहली ही बैठक में, प्रारूप कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया था। इस कमेटी में, अनुसूचित जाति के भी पन्द्रह सदस्य शामिल कि...

सन 1946 में पंजाब विधानसभा के आरक्षित विधायक।।

।।सन 1946 में पंजाब विधानसभा के आरक्षित विधायक।। दूसरे विश्व युद्ध के कारण सन 1942 में भारत में विधानसभा के चुनाव नहीं कराए गए थे, जिस के बाद ये चुनाव सन 1946 में करवाए गए थे। भारत में लोकतंत्र की स्थापना केवल अंग्रेज ही कर गए थे, जिस से भारत के मूलनिवासियों को वोट के अधिकार नसीब हो गए थे, अगर कहीं वे लोकतंत्र की स्थापना नहीं करते तो शायद भारत में वही पुरानी मनुस्मृति थोंप दी जाती और पुनः वही जातिवाद बना रहता, छुआछूत, ऊँच नीच कायम रहती। शायद आदपुरुष ने, ब्राह्मणवाद के खात्मे के लिए ही अंग्रेजों को भारत भेजा था, उन्होंने ही, अछूतों को गुलामी से मुक्त किया था, वही वोट का भी अधिकार दे गए थे, मोहनदास कर्म चन्द गांधी और जवाहर लाल नेहरू एंड कंपनी ने ऐड़ी छोटी का जोर लगा लिया था, ताकि भारत के मूलनिवासी लोगों को, वोट का अधिकार ना मिले, गांधी और उस के पिछलग्गू अछूत समाज के बिकाऊ दलालों ने भी साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी के आंदोलन का भी डट कर विरोध कर के, गांधी एंड कंपनी का ही साथ दिया था। आदधर्म मंडल के समानांतर ही अछूत सुधार मंडल जैसे फर्जी संगठन बना कर, पंजाब आदधर्म मंडल को धोखा दिया गया था...

सन 1946 की पंजाब विधानसभा के सदस्य।

।। सन1946 की पंजाब विधानसभा के सदस्य।। द्वितीय विश्व के कारण सन 1942 में अंग्रेज सरकार, विधानसभा चुनाव नहीं करवा सकी थी, जिस के कारण, चुनाव सन 1946 में करवाए गए थे। कांग्रेस को भी पूरे दस साल मिल गए थे, जिन में उन्होंने, साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल के गद्दारों को पहचानने, खरीदने का भी लंबा समय मिल गया। इन्ही दस वर्षों में पंजाब आदधर्म मंडल को, कांग्रेस ने, खेरू खेरू कर के, बाबू जी के आदधर्म मंडल के आंदोलन को धराशायी कर दिया गया। स्वार्थी लालची खुद भी बदनाम हुए और वहुजन समाज की नैया को डुबो बैठे। आदधर्म मंडल के दलबलुओं ने  आदधर्म मंडल को छोड़ कर, कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए थे और निम्नलिखित लोग चुनाव में सफल हो गए थे। 1 श्री राम शर्मा, पूर्वी टाउन। कांग्रेस। 2 शानो देवी, दक्षिण पूर्व टाउन। कांग्रेस। 3 सेठ सुदर्शन, पूर्वी टाउन।कांग्रेस। 4 भीम सेन सच्चर, लाहौर शहर।कांग्रेस। 5 सन्त राम सेठ, अमृतसर शहरी।कांग्रेस। 6 किशन गोपाल दत्त, उतर पूर्व टाउन।कांग्रेस। 7 चमन लाल, उतर पश्चिम टाउन।कांग्रेस। 8 मुंशी हरि लाल, दक्षिण पश्चिम। कांग्रेस। सामान्य ग्रामीण।। 9 रणजीत सिंह चौधरी, हिसार दक्षि...

सन 1937 में पंजाब विधानसभा के मंत्री और मुख्यमंत्री।।

।।सन 1937 में पंजाब विधानसभा के मंत्री और  मुख्यमंत्री।। अंग्रेजी सरकार ने, 1932 में निर्णय कर लिया था कि, भारत में विधानसभा चुनाव करवा कर, लोकतंत्र की स्थापना कर के, भारत को आजाद कर देंगे। इसीलिए सन 1937 के चुनाब करवाए गए थे, उस के बाद, जब गुलाम भारत का पहला मंत्रिमंडल बना था, उस के निम्नलिखित मंत्री और मुख्यमंत्री बनाए गए थे :---- मुख्यमंत्री------सर सिकन्दर हयात खान। राजस्व मंत्री----सुंदर सिंह मजिठिया। विकास मंत्री----छोटू राम। वित्त मंत्री------- मनोहर लाल। पब्लिक कार्य मंत्री--खिजार हयात टिबाना। शिक्षा मंत्री------- अब्दुल हयात। पंजाब विधानसभा में, जीत कर आए अनुसूचित जाति आदधर्म मंडल के विधायक। चौधरी प्रेम सिंह ठेकेदार, हिदायतपुर छावनी।गुड़गांव। फकीर चन्द चौधरी, करनाल। लाला हरनाम दास अध्यापक चक नंबर 196- आर बी इस्लामावाद, जिला लायलपुर। सेठ किशन दास, गांव व डाकखाना खाम्बरा जालंधर। जुगल किशोर, गांव माजरी चमाराँ, डाकखाना जगाधरी, अंबाला। भगत हंस राज पलीडर, पूरन नगर सियालकोट शहर। सरदार गोपाल सिंह अमरीकन मर्चेंट, गाँव लील, डाकखाना पखोवाल लुधियाना। मूला सिंह, गाँव व डाकखाना बालाचौर, ...

गुरु रविदास जी और "ऐसी लाल तुझ बिन कौन करै"।।

।।गुरु रविदास जी और "ऐसी लाल तुझ बिन कौन करै"।। गुरु रविदास जी महाराज का जिस समय जन्म हुआ था, उसी समय उन्होंने अपनी दैवी शक्ति का जलवा ब्राह्मणों को दिखा दिया था, जन्म से अंधी दाई की आंखों में ज्योति डाल कर, उसे सुनयनीं बना दिया था, नवजात शिशु के, इस चमत्कार को देख कर दाई ने कहा था कि, कालू दास जी महाराज, ये बच्चा कोई रवि नूर धरती पर अवतरित हुआ है, ये कोई साधारण बालक नहीं है, ये चारों वर्णों का गुरु जरूर बनेगा, जो वास्तव में ही आज कल सत्य सिद्ध हो चुका है। जब चार वर्ष की आयु हुई थी तभी गुरु रविदास जी ने, अपना दहिना शंख बजा दिया था, जिस की ध्वनि सुन कर, ब्राह्मणों की कुलियों में आग के शोले बड़ी तीव्रता से धधक उठे थे, जिन के कारण सारे ब्राह्मण निकलती हुई मासूम कोंपल को कुचलने के लिए लामबंद हो गए थे। आठ साल की आयु में, गढ़ाघाट पर गुरु जी महाराज को ब्राह्मणों ने शास्त्रार्थ के लिए बुला लिया था, जिस में वे बुरी तरह से पराजित हो गए। उस समय कोई कानून नहीं था, कोई दलील, अपील नहीं चलती थी, कोई जज नहीं थे, वस था तो केवल एक ब्राह्मण मंत्री जो हमेशा ही राजा को उलटी ही सलाह देकर निराप्राधिय...

पंजाब विधानसभा सन 1937 के सदस्य।।

।।पंजाब विधानसभा सन 1937 के सदस्य।। सन 1936-1937 में गुलाम भारतवर्ष में पहले विधानसभा चुनाव चुनाव हुए थे, जिस में साहिबे कलाम मंगू राम जी ने, चुनाव लड़ कर आदधर्म का परचम सारे विश्व में, लहराया था। वे इसी चुनाव में अछूतों को आरक्षण लागू करवाने में भी सफल हो गए थे। भारतवर्ष का संविधान तो 1947 में बनना श्रु हुआ था और लागू 1950 में हुआ था, मगर ये महाउपलब्धि परमपूज्य साहिबे कलामें मंगू राम मुगोवाल जी, गुरु आदि परगास ग्रँथ के रचयिता स्वामी ईशरदास जी महाराज, बीडीओ हजारा सिंह पिपलांवाला पंजाब और स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज कानपुर उतर प्रदेश के आंदोलनकारियों, प्रदर्शनकारियों की ही थी। पंजाब विधानसभा के 175 विधायकों के लिये चुनाव मार्च 1937 में हुए थे, जिन का विवरण निम्नलिखित है। 1 सर्व माननीय मेजर सरदार सर सिकन्दर हयात खान पश्चिम पंजाब। 2 सरदार बहादुर डॉक्टर सरदार सर सुंदर सिंह बटाला सिख ग्रामीण। 3 राव बहादुर चौधरी छोटू राम झझर सेंट्रल सामान्य ग्रामीण। 4 माननीय मिस्टर मनोहर लाल विश्वविद्यालय। 5 नबाबजादा मेजर मलिक खिजार हयात खान टिवाणा, खुशहाब मुहम्मदन ग्रामीण। 6 मियां अब्दुल हयात खान, दक्षिण पूर...

गुरु रविदास जी और "ऐसी लाल तुझ बिन कौन करै"।।

।।गुरु रविदास जी और "ऐसी लाल तुझ बिन कौन करै"।। गुरु रविदास जी महाराज का जिस समय जन्म हुआ था, उसी समय उन्होंने अपनी दैवी शक्ति का जलवा ब्राह्मणों को दिखा दिया था, जन्म से अंधी दाई की आंखों में ज्योति डाल कर, उसे सुनयनीं बना दिया था, नवजात शिशु के, इस चमत्कार को देख कर दाई ने कहा था कि, कालू दास जी महाराज, ये बच्चा कोई रवि नूर धरती पर अवतरित हुआ है, ये कोई साधारण बालक नहीं है, ये चारों वर्णों का गुरु जरूर बनेगा, जो वास्तव में ही आज कल सत्य सिद्ध हो चुका है। जब चार वर्ष की आयु हुई थी तभी गुरु रविदास जी ने, अपना दहिना शंख बजा दिया था, जिस की ध्वनि सुन कर, ब्राह्मणों की कुलियों में आग के शोले बड़ी तीव्रता से धधक उठे थे, जिन के कारण सारे ब्राह्मण निकलती हुई मासूम कोंपल को कुचलने के लिए लामबंद हो गए थे। आठ साल की आयु में, गढ़ाघाट पर गुरु जी महाराज को ब्राह्मणों ने शास्त्रार्थ के लिए बुला लिया था, जिस में वे बुरी तरह से पराजित हो गए। उस समय कोई कानून नहीं था, कोई दलील, अपील नहीं चलती थी, कोई जज नहीं थे, वस था तो केवल एक ब्राह्मण मंत्री जो हमेशा ही राजा को उलटी ही सलाह देकर निराप्राधिय...

गुरु रविदास जी फरमाते मैंने राम नाम धन लादिया विख लाड़ी संसारी।।

।।गुरु रविदास जी फरमाते "मैं राम नाम धन लादिया विख लादी संसारी"।। गुरु रविदास जी महाराज की वाणी क्रान्ति का उदघोष है, जिसे समझने, परखने और उस की व्याख्या करना साधारण आदमी के वश की बात नहीं है। उन्होंने जिस चँवर उर्फ चमार वंश में जन्म लिया था, उसे विदेशी यूरेशियन घुसपैठियों ने, पांच हजार सालों से शिक्षा से वंचित कर के रखा हुआ था। गुरु रविदास जी महाराज से पूर्व का इतिहास खोल कर देखा जाए तो, कोई भी मूलनिवासी साहित्यकार दिखाई नहीं देता है। जब अक्षर ज्ञान पर ही प्रतिबंध था तो साहित्य लिखने का सवाल ही पैदा नहीं होता है। जब दिव्य शक्ति के मालिक गुरु रविदास जी महाराज ने, लिखना चाहा था, तो उन्हें देंवनागरी लिपि का भी प्रयोग करने नहीं दिया था, मगर दिव्य ज्योति को तो कोई रोक नहीं सकता, उस की किरणों का प्रकाश स्वत ही ज्योतिर्मंडल में विकीर्ण हो ही जाता है। ये तो उस समय की बात है, जब मूलनिवासियों को पढ़ने, लिखने और सत्संग में प्रवचन करने का अधिकार नहीं था, स्वतंत्रता के बाद से यही गुलामी चलती आ रही है। ऊनी सौ बहत्तर में, जब मैंने आर्टिकल लिख कर, मनुवादी अखबारों को भेजना शुरू किए तो उन के स...

गुरु रविदास जी महाराज और कहि रविदास खलास चमारा!!

।।गुरु रविदास जी महाराज और कहि रविदास खलास चमारा!! गुरु रविदास जी महाराज ने, नेगेटिव भावों को पॉजिटिव कर के, अछूत समाज को सिर ऊंचा कर के स्वाभिमान से जीने की कला सिखाई है। वे जानते थे कि, ब्राह्मणवाद के कारण ही भारत के मूलनिवासी गुलाम है, मूलनिवासी नारकीय जिंदगी जी रहे हैं, शोषण की चक्की तले पिस रह हैं, पशुओं, जानवरों से भी बदतर समझे जा रहे हैं, जिन की दुर्दशा को देख कर वे स्वयं ही, अत्याचार सहन करने के लिए, मैदान में आ गए थे। उन्होंने सामाजिक विषमता के लिए ब्राह्मणों को ही, जिम्मेदार समझा और उन्हें सुधारने के लिए, धार्मिक विचारधारा को अपनाया मगर ये जाति सुधरने की अपेक्षा, और उग्र होती ही गई, जिस के कारण गुरु जी को ब्राह्मणों के कोप का स्वयं भाजन बनना पड़ा। ब्राह्मणों ने, अपनी पाखण्डवाद और आडंबरवाद की कागज की नैया को बचाने के लिए, तत्कालीन बादशाहों का अनुचित लाभ उठाया और उन को उकसा और भड़का कर, गुरु जी को मानसिक, शारीरिक यातनाएँ दिलाई। गुरु जी ने, डट कर ब्राह्मणवाद का सामना किया। जब सिकन्दर लोदी, गुरु जी से शास्त्रार्थ में बुरी तरह पराजित हो गया, उन के तलवे चाट कर हार गया, उन्हें राजपाठ,...

गुरु रविदास जी ने धोती तिलक लगा कर शंख क्यों बजाया ?

।।गुरु रविदास जी ने धोती तिलक लगा कर शंख क्यों बजाया? गुरु रविदास जी के समय में ब्राह्मणों का आतंक इतना फैल चुका था कि, गुरु रविदास महाराज को भी चँवरवंशी ना कह कर चमार कहा गया था। ब्राह्मण कोई नहीं मारा जा रहा था मगर मुस्लिम बादशाहों ने, केवल भारत के पचासी प्रतिशत मूलभारतीयों को ही यातनाएँ देकर, अत्याचार किये। ब्राह्मण ही मुस्लिम बादशाहों को उकसाते थे, उन्हें भड़काते थे, उनके कंधों पर बंदूकें रख कर फायर करते थे, जिन के आतंक का मुकाबला कोई भी किसी भी जाति का नेता नहीं कर रहा था। केवल मूलनिवासी महाराणा प्रताप, महाराजा रणजीत सिंह, वीर शिवाजी ही, मुस्लिमों से, उलझ रहे थे, वे भी इसलिए कि वे भारत के मूलनिवासी ही थे। ये मूलनिवासी जनरक्षक ही युद्धों में घायल हो कर, शहीद होते जाते रहे थे। मूलनिवासी मुसलमान नहीं बन रहे थे, जिन्हें मुस्लिम बादशाह अंधाधुंध कत्ल करते जा रहे थे, जिन्हें ना तो राजा बचा रहे थे, ना ही ब्राह्मण मगर गुरु रविदास जी ने मूलनिवासी जनता की रक्षा की कमान अपने हाथ ले ली थी। उन को ना तो बादशाह, कोई आंच पहुँचा सके और ना उन के सलाहकार ब्राह्मण मरवा सके, केवल गुरु जी को असँख्य रुकाब...

गुरु रविदास जी कहते जैसे रंग कुसुंभ का तैसा इह संसार।

 ।।गुरु रविदास जी कहते जैसा रंग कुसुंभ का तैसा इह संसार।। गुरु रविदास जी महाराज ने, अपनी वाणी की रचना करते समय, एक एक वर्ण, एक एक शब्द वैसे ही चुन कर काव्य रचना में जड़े हुए हैं, जिस प्रकार जयमाला में फूल पिरोए जाते हैं। उन की रचना के शब्द पढ़ने, देखने और सुनने में वहुत ही सरल होते हैं मगर उन के अर्थ अत्यंत गंभीर होते हैं, जिन के अर्थों को समझना किसी भी अनाड़ी व्यक्ति का काम नहीं है। बिहारी कवि की कविताओं की बारीकी को ध्यान में रख कर, कुछ आलोचकों ने लिखा हुआ है कि:------ सत सैया के दोहरे, ज्यों नाविक के तीर, देखन में छोटे लगें घाव करें गंभीर।। बिहारी कवि गागर में सागर भरने, अपने भावों को अपने शब्दजाल में पिरोने में तो प्रशंसनीय और सिद्धहस्त थे, जिस के कारण ही उन्हें इन शब्दों से नवाजा गया है, मगर उन के भाव और शब्द सुंदरियों के हाव भावों, कटाक्षों, निर्लज कारनामों को ही दर्शाते हैं, उन के श्रृंगार, लचक, कृत्रिम दिखाबे को ही व्यान करते हैं, मगर गुरु रविदास जी महाराज ने कहीं भी, नारी को भोग विलास की वस्तु समझ कर, उस के अंगों प्रत्यंगों का चित्रण नहीं किया है, अपितु उन्होंने, समाज की दुखत...

गुरु रविदास जी महाराज और सतिसँगत मिली रहियो माधो।।

।। गुरु रविदास जी महाराज और सतिसँगत मिली रहियो माधो। गुरु रविदास जी महाराज ने, सँगत को आपस में अच्छी सँगत में रह कर, मिल जुल कर, एकता बना कर, रहने का निर्देश दिया है। वर्तमान में युग में भी यही कहा जाता है कि:--- "संघे शक्ति कलियुगे"! वैसे मैं तो काल विभाजन को सही नहीं मानता हूँ, क्योंकि ये काल विभाजन केवल भारत के ब्राह्मणों ने किया हुआ है, अन्य किसी देश में ऐसा काल विभाजन नहीं है। ब्राह्मणों ने केवल कलियुग को अपनी रोजी रोटी का साधन बनाया हुआ है, जिस के आतंक से हिन्दू भयभीत रहते हैं मगर ये कथन सत्य ही है कि, आज संगठन में ही शक्ति है। आज के विद्वान भी यही कहते हैं कि, यदि सुख से जीना चाहते हो, दुष्टों से भी सुरक्षित रहना चाहते हो, दुष्ट अत्याचारियों के अत्याचारों से सुरक्षित रहना चाहते हो, हिंसक जीवों से प्राण रक्षा चाहते हो तो आपस में मिल जुल कर रहो और रास्ते पर भी चलो, मिल जुल कर जीवन बसर करो अन्यथा आप की आवाज तक बन्द कर दी जाएगी, आप को बोलने तक नहीं दिया जाएगा, आप का शोषक, शोषण कर के, आप को नङ्गे, भूखे, प्यासे और कैद में डाल कर रखेंगे, जिस का आज साक्षात उदाहरण मोदी शासन आप ...

गुरु रविदास जी महाराज और सच के व्यापारी।

।।गुरु रविदास जी महाराज और सच के व्यापारी।। गुरु रविदास जी महाराज, केवल सच के पुजारी हुए हैं, उन्होंने सँगत को सत्य के महत्व और उपयोगिता को समझा कर, खुद सच के मार्ग पर चलते हुए कर्म कर के, फल प्राप्त कर के आनंद सहित जीवन बिताने का उपदेश दिया है। गुरु जी ने स्वयं भी सत्य के मार्ग पर चल कर, कदम कदम पर सफलताएँ हासिल कीं थी, जिन के सामने सभी छली कपटी विद्रोही षडयंत्रकारी धराशायी हो गए थे, बड़े बड़े खूनी बादाशाहों की तलबारें बार करने में असमर्थ हो गईं थीं, बड़े बड़े षडयंत्रकारी ब्राह्मणों को मुंह की खानी पड़ी थी, मगर गुरु जी उन का सामना करते करते अवतार बनते गए। गुरु जी ने सच का ही सँगत को सन्देश दिया है, जिस के कारण आज भी मूलनिवासी सच से डर कर ही जीवन व्यतीत करते आए हैं। जितने भी महापुरुषों ने अवतार लिये हैं, इन्हीं सत्य के पुजारियों के घरों में लिए हैं, चाहे चँवरवंशी गुरु रविदास जी हों, कबीर कोली जी हों, गुरु आदिपरगास ग्रँथ के रचयिता स्वामी ईशर दास जी हों,साहिबे कलाम मंगू राम मुगोबाल जी हों, स्वामी अच्छूतानंद ही महाराज जी हों, डाक्टर भीम राव अंवेदकर हों, बाबू जगजीवन राम हों, चाहे वर्तमान वहुजन ...

गुरु रविदास जी महाराज और सच्चा व्यापार।

          ।। गुरु रविदास जी महाराज और सच्चा व्यापार।। गुरु रविदास जी महाराज ने, सँगत को सच्चा व्यापार करने की हिदायत दी हुई है। जिस घट में सत्य निवास करता है, जिस की जिह्वा से सत्य ही निकलता है, उसे कोई भी पराजित नहीं कर सकता है, उसे कोई भी हानि पहुंचा नहीं सकता, प्रत्येक कोर्ट कचैहरी में उसे विजय हासिल होती है, सभी उस के चरण कमलों में नमन करने के लिए विवश हो जाते हैं। गुरु रविदास जी ने, खुद भी जीवन में सच्चा व्यापार किया है, जिस के बल पर, विश्व की सभी राजे रयितें उन के चरणों पर दण्डवत हो कर झुकीं और उन के समक्ष आत्मसमर्पण किया, केवल आत्मसमर्पण ही नहीं किया अपितु गुरु जी के निर्देश से शासन भी किया, जिस से प्रजा सुखी रही, समृद्ध भी हुई, बेगम भी रही। शासक भी अमर हो कर सम्मानित भी हुए और इतिहास पुरुष बन गए, जिन शासकों ने प्रजा के खून से अपने हाथ लथपथ किये थे, खून की नदियां बहाईं थी, वे गुरु जी के सानिध्य में आ कर, बड़े सम्मान से, इतिहास में अमर भी हो गए हैं। इसीलिये गुरु जी ने, मानव को सच है व्यापार करने का उपदेश देते हुए, स्वामी ईशरदास जी महाराज के शब्दों में, गुरु...

गुरु रविदास जी महाराज के अनुसार मानव जीवन बड़े सौभाग्य से मिलता।।

।।गुरु रविदास जी के अनुसार मानव जीवन बड़े सौभाग्य से मिलता।। गुरु रविदास जी महाराज ने, जीव के जन्म से पूर्व और जन्म के बाद की परिस्थितियों का बड़े ही सजीव ढंग से, साध-सँगत को अपने सत्संग में, फरमाया है कि, जब जीव गर्भावस्था में होता है, तब वह गर्भवास में उलटा लटका हुआ होता है, अर्थात शीश नीचे की ओर और पांव ऊपर की ओर होते हैं, जो माता पिता, ही नहीं सारे परिवार और शुभचिंतकों को, खुशी का आलम होता है, मगर जो जीव नौ मास, गर्भ में उलटा लटक कर  जी रहा होता है, तब उस की क्या मन:स्थिति होती होगी, चिंतनीय विषय है। जब मानव गर्भावस्था में होता है, तब उस के दोनों हाथ, जुड़े हुए होते हैं, उससे लगता है कि, वह उस समय आदिपुरुख से यही प्रार्थना करता है, कि जब मैं संसार के दर्शन करूंगा तब, दोनों ही हाथ जोड़ कर, आप का ही नाम जपूंगा, मगर जब आदमी को संसारिक हवा लगती है, आदमी सांसारिक हवा में जीने लगता है, तब क्या क्या करता है? स्वामी ईशरदास जी महाराज, गुरु रविदास जी के भावों को, गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 961-962 पर बड़े तर्कपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करते हैं:--          ...

गुरु रविदास जी के अनुसार कपटी वैरागी जीव की दशा।।

।।गुरु रविदास जी के अनुसार कपटी वैरागी जीव की दशा।। गुरु रविदास जी महाराज, अपने साथ वैरागण रखते थे, जिसका सहारा उस समय लेते थे, जब उन्हें, तप में बैठ बैठ कर, थकान महसूस होती थी और अपना शारीरिक संतुलन बनाने के लिए, साधना के समय, उसे अपनी कोहनी के साथ लगाते थे, मगर उन का ये कोई आडंबर नहीं था, कोई बाह्य दिखावा नहीं था, इतना तो अवश्य था कि, वैरागण का सीधा संबंध, वैराग से, वैरागी से ही है। गुरु जी के अनुसार वैरागी, वैराग धारण कर लेता है, वैरागियों के साथ ही चलता फिरता है, वैरागण को साथ रखता है, मगर उस वैरागी का मन ना तो वैरागी होता है और ना ही वैरागण भी उस की नैया को पार लगाती है। बनाबटी वैरागी, केवल नाम का ही वैरागी बन कर रह जाता है, जिस का उसे कोई लाभ नहीं होता है, उलटा जीवन ही नरकमय बन जाता है। जब भी कोई सामाजिक, राजनैतिक मुशीबत खड़ी हो जाती है, तब उस का वैराग, उस का कोई साथ नहीं देता है, कोई भी भक्ति उसे सुरक्षा प्रदान नहीं करती, फिर उसे कई प्रकार के घोर दंड, सजाएं भुगतनी पड़ती हैं, जिस के उदाहरण आज जेलों में बंद पड़े बड़े बड़े डेरों के मालिक हैं, मगर सतगुरु रविदास जी, सतगुरु नानकदेव जी, सतग...

गुरु रविदास के आदिधर्म का समर्थन विश्व साधु संप्रदाय ने क्यों किया?

गुरु रविदास के आदिधर्म का समर्थन विश्व साधु संप्रदाय ने क्यों किया। गुरु रविदास जी ने आजीवन एक मूलमंत्र, एक वैश्विकधर्म, एक वैश्विक धर्मग्रंथ, एक वैश्विक सरकार की स्थापना के लिये ही अपने मन मष्तिष्क को केंद्रित कर रखा था, जिसमें वे पूर्ण सफल रहे थे। आदर्श बेगमपुरा की ऐतिहासिक स्थापना को भी बादशाह सिकन्दर लोदी और बादशाह बाबर से करवा लिया था। गुरु रविदास जी के ज्योतिर्लीन हो जाने पर भारत में कोई भी साधु सन्त, उनके समान शक्तिशाली नहीं रहा तो, जिस का नाजायज लाभ उठाकर ब्राह्मणों ने, गुरु रविदास जी का सारे का सारे इतिहास खत्म कर दिया था और सारा साहित्य जला दिया था, जिसका उल्लेख कानपुर के इतिहासकार रामचरण कुरील जी ने गुरु रविदास जी की "सत्य कथा" में वर्णन अठाहरवीं शताब्दी में किया हुआ है। उन्होंने लिखा हुआ है कि, गुरु रविदास महाराज का कांशी में स्वर्ण मंदिर भी था, जिसे ब्राह्मणों ने नष्ट भ्रष्ट कर दिया था मगर, गुरु नानकदेव जी, गुरु रविदास जी के पोथीसाहिब का कुछ अंश अपने पास ले आए थे, जिसे पंजाब में सुरक्षित रखा हुआ था, जो गुरु ग्रँथ साहिब में दर्ज किया गया है, आज हमें यही गुरु रविदा...

गुरु रविदास जी महाराज के अनुसार मानव शरीर चन्दन है।।

   ।।गुरु रविदास जी महाराज के अनुसार मानव शरीर चन्दन है।। गुरु रविदास जी महाराज ने, असँख्य जीवों में केवल और केवल मानव को सर्वश्रेष्ठ, सर्वोच्च स्थान दिया है। वास्तव में ही, मानव की रचना आदपुरुष ने, बड़े ही सोच विचार के साथ की हुई है, क्योंकि नौ दरबाजे तो केवल मानव को ही लगाए हुए हैं, सब से अनुपम, अद्वितीय और सुंदर संरचना मानव की ही हुई है। कुछ प्राणियों को तो कीड़े मकोड़े ही खाने के लिए दिए हुए हैं, कुछ के लिए घास फूस ही खाने के लिए दी हुई है, कुछ को केवल मांस और खून ही भोजन के रूप में स्वीकृत किया हुआ है, कुछ को मांस और अनाज दोनों ही खाने के लिए दिया हुआ है, मगर मानव जाति को, इन सब जीवों से हट कर, केवल सर्वश्रेष्ठ भोजन दूध, दही, घी, फल, मेवे, अनाज, सब्जियाँ और जड़ी बूटियां प्रदान की हुई हैं। सभी जीवों की अपेक्षा सोचने की शक्ति भी मानव को अनूठी ही दी हुई है। इतना ही नहीं सभी जीवों का भी मानव को सिरमौर ही बनाया हुआ है, सभी प्राणी केवल मानव के सामने ही हथियार डालते हैं, चाहे वह शेर, चीता, टाइगर, हाथी, मगरमच्छ और अजगर ही क्यों ना हो। आदपुरुष ने मानव को, चन्दन जैसा सुगन्धित शरीर और ज...

गुरु रविदास जी महाराज और गुरुओं से बैर।।

    ।।गुरु रविदास जी महाराज और गुरुओं से बैर।। गुरु रविदास जी ही सर्वशक्तिमान, ज्योतिर्ज्ञानी और सर्वज्ञ हुए हैं। मंसूर, यीशू मसीह को सूली पर चढ़ा दिया गया था, शम्स की चमड़ी उधेड़ दी गई, खलील को जिंदा जलाया गया था, कोई भी जालिमों के जुल्मों से उनकी रक्षा नहीं कर सका था, ना ही वे अपने आप को बचा सके, मगर गुरु रविदास महाराज और उन के, परिपूर्ण शिष्यों को कोई भी जरा भी आंच नहीं पहुंचा सके थे। सतगुर कबीर साहिब को खूनी हाथी के आगे डाला गया, गहरी नदी में वहाया गया, सतगुरू मीरांबाई को जहर का पिआला पिलाया गया था पिटारे में सांप भेजा गया, मगर उन का कोई भी बाल बांका नहीं कर सका। सदना कसाई जिंदा दीवार में चिनवाया गया था मगर दीवार भी गिर गई थी, फिर भी तत्कालीन शासकों ने गुरुओं, सन्तों और पीरों को मानसिक और शारीरिक रूप से वहुत परेशान किया था। गुरु रविदास जी महाराज को तो, आजीवन ही मनुबाद ने इतना सताया कि, उस का वर्णन करना भी कठिन है। गुरु रविदास जी इतने आध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न थे कि, जिस का आज तक कोई भी सानी नहीं हुआ है, कोई भी उन का साम्य नहीं रखता है। कोई भी उनको सूली पर चढ़ा नहीं सका, जिस से ...

गुरु रविदास जी महाराज और साधु संतों को कष्ट।।

।।गुरु रविदास जी महाराज और साधु-संतों के कष्ट।। गुरु रविदास जी ने आजीवन कष्टों को गले लगा कर रखा मगर मूर्खों और दुर्जनों को होश नहीं आई कि, हम नीच हरकतें कर के अपने ही पांवों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। दुर्जन कभी नहीं सोचते कि जो नीच कर्म मैं कर रहा हूँ, जो छलकपट मैं कर रहा हूँ, जो कत्लोगारद मैं कर कर रहा हूँ, जो पशुता मैं कर रहा हूँ, एक ना एक दिन उस का परिणाम भी मुझे भुगतना पड़ेगा। आदिकाल से ही ये, अच्छाई और बुराई नामक दो ध्रुव साथ साथ चलते आए हैं, मगर बुरा कर्म करने वाले जहान से चलती बार रोते, चिल्लाते हुए, तड़फ तड़फ कर, वर्षों चारपाई पर पड़े रह कर, सड़ सड़, कर मरते देखे गए हैं मगर जिन्होंने, किसी की आत्मा को कष्ट नहीं पहुँचाया औऱ भगवान की रजा में रह कर ही, जीवन जिया वे ऐसे दुख कभी प्राप्त नही करते है। गुरु रविदास जी ने ऐसे ही पापियों के कल्याण के लिए ही अपना सारा जीवन दुखों में डाले रखा था। स्वामी ईशरदास जी महाराज गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 631-632 पर सन्तों और गुरुओं को दिए गये कष्टों के बारे में फरमाते हैं कि:----               ।। चौपाई।। अनलहक...

सिकन्दर लोदी और गुरु रविदास जी महाराज।।

।गुरु रविदास जी महाराज और बादशाह सिकंदर लोधी।। सिकंदर लोदी ने, साधना गुरु रविदास जी महाराज के पास भेजा कि उन्हें इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए विवश कर मगर जब वह गुरु रविदास जी को इस्लाम धर्म पर ज्ञान विज्ञान की बातें करने लगा, यहां तक कि वह गुरु जी से शास्त्रार्थ करने पर उतर आया, तो फिर गुरु रविदास जी ने, उसे प्रत्येक प्रश्न के उत्तर में बुरी तरह पराजित कर दिया ओर गुरु रविदास जी से सधना शात्रार्थ में बुरी तरह हार गया, जिस के कारण वह, गुरु रविदास जी के चरण कमलों पर गिर पड़ा और गुरु जी को अपना पीर स्वीकार कर लिया, जिसकी चारों ओर खबर फैल गई।जब ये खबर बादशाह सिकन्दर लोधी के कानों में पड़ी तो वह आग बबूला हो कर लाल तबे की तरह जलने लगा। अपने अहदियों, मंत्रियों को तत्काल आदेश देकर सधने को बुला लिया।बेचारा सधना भी आदेश मिलते ही बादशाह सिकन्दर की अदालत में हाजर हो गया, और बादशाह सिकंदर को झुक कर अदाब कह कर, अति विनीत होकर बड़े स्वाभिमान से खड़ा हो गया। लाल लाल नेत्रों से सिकंदर लोधी, सधने को पूछने लगा, कि क्या सधनिया तूँ, इस्लाम को हतक करके गुरु रविदास को अपना पीर बना लिया है ? सधना:---जी हजूर प...