सिकन्दर लोदी और गुरु रविदास जी महाराज।।

।गुरु रविदास जी महाराज और बादशाह सिकंदर लोधी।।
सिकंदर लोदी ने, साधना गुरु रविदास जी महाराज के पास भेजा कि उन्हें इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए विवश कर मगर जब वह गुरु रविदास जी को इस्लाम धर्म पर ज्ञान विज्ञान की बातें करने लगा, यहां तक कि वह गुरु जी से शास्त्रार्थ करने पर उतर आया, तो फिर गुरु रविदास जी ने, उसे प्रत्येक प्रश्न के उत्तर में बुरी तरह पराजित कर दिया ओर गुरु रविदास जी से सधना शात्रार्थ में बुरी तरह हार गया, जिस के कारण वह, गुरु रविदास जी के चरण कमलों पर गिर पड़ा और गुरु जी को अपना पीर स्वीकार कर लिया, जिसकी चारों ओर खबर फैल गई।जब ये खबर बादशाह सिकन्दर लोधी के कानों में पड़ी तो वह आग बबूला हो कर लाल तबे की तरह जलने लगा। अपने अहदियों, मंत्रियों को तत्काल आदेश देकर सधने को बुला लिया।बेचारा सधना भी आदेश मिलते ही बादशाह सिकन्दर की अदालत में हाजर हो गया, और बादशाह सिकंदर को झुक कर अदाब कह कर, अति विनीत होकर बड़े स्वाभिमान से खड़ा हो गया। लाल लाल नेत्रों से सिकंदर लोधी, सधने को पूछने लगा, कि क्या सधनिया तूँ, इस्लाम को हतक करके गुरु रविदास को अपना पीर बना लिया है ?
सधना:---जी हजूर पातशाह ! हम गुरु रविदास जी महाराज से ज्ञान गोष्ठी में हार गए जिस के बारे में जो उन्होंने तर्क दिए सुनो:----
सधनिया जे तूँ तरना हो जा सुन्न महासुन्न ते पार।सहंस दल कमल मुसलसी छड के मॉन सरोवर गुसल सार।।
सुन्न महासुन्न ते हुतल तज के आलम हुतल कार।
अलख अगम अनामी शहर वेख के अनहद तार बजा।।
इत मारग में इस्लाम को लाए, सब का होए उधार।
चश्म गोश लव बिन कोह कलमा इस्लाम करे एह अपार।।
सो मेरे आका ! मैं,
हार खाए के सधना सिकंदर लोधी दे आए दरबार खड़ा।
सलाम आख के बाहमा नूँ चक, आंखे रो रो के करे पुकार खड़ा।
अज लुटिया ऐ चमियार ने, सच आखदा हूँ सरकार खड़ा।
किता हतक दीन इस्लाम सन्दा बंदोबस्त करो कहां हार खड़ा।।
सधने की दर्द भरी दास्तां सुन कर सिकन्दर लोधी हतप्रभ हो गया। सधना फफक फफक कर रोता हुआ सिकन्दर लोदी को बताता है,
मेरे आका मैंने कई तर्क वितर्क करके इस्लाम की खूबियों को एक एक करके गिनाया मगर वह पीर ऐसा है, कि कोई उसे आज तक हरा नहीं सका। परमानंद, रामानंद, पीपा, गोरखनाथ जैसे प्रकांड ब्राह्मण भी उनके चरणों की धूड़ बन गए, फिर मेरे अन्नदाता मेरी तो औकात ही क्या है ?
ठीक है सधनिया तेरी तो औकात ही नहीं है, कि किसी सन्त महापुरुष को हरा सके। सुनो मेरे बुद्धिमान मंत्रियो, रथ तैयार कर के जाओ और कांशी से गुरु रविदास को तुरन्त ले आओ।सिकन्दर मन मे घात रखकर मंत्री और सारथी को समझाता है, कि तुम गुरु रविदास को बड़े अदब, मॉन सम्मान से रथ पर सवार करना और रास्ते में, डाडे पीर को कोई भी दुख तकलीफ ना हो। अगर वह बन गया मोमन, तो इस्लाम के झंडे सारे संसार में झुलाएगा।
दूसरे दिन मंत्री और सारथी रथ को लेकर कांशी को रवाना हो गए। एक महीने के बाद रथ कांशी पहुँच गया। जाते ही मंत्रियों ने गुरु रविदास जी के चरण कमलों में झुक कर शीश निवाया और सिकन्दर लोधी बादशाह का पैगाम नजर किया।गुरु जी ने भी तत्काल ही, सन्त जीवन दास और रैदास जी के साथ विचारविमर्श करके कांशी के लिये प्रस्थान कर दिया। रथ एक महीने के बाद दिल्ली पहुँचा। ज्यों ही गुरु रविदास जी महाराज के आगमन की सूचना बादशाह सिकन्दर को मिली त्यों ही वह अपने सब मंत्रियों, अहलकारों, बेगमों को लेकर महल के मुख्य तोरण पर, हार लेकर खड़े हो गए। रथ से उतरते ही बादशाह सिकन्दर सबसे पहले गुरु रविदास जी के चरण कमलों पर झुका और हार डालकर राजकीय सम्मान किया, उसके बाद मंत्रियों, बेगमों ने गुरु जी का सम्मान किया। शाही अंदाज से गुरु जी को सिकन्दर अपने सिंहासन तक ले आया और उन्हें सिंहासन पर सुशोभित होने केलिये अनुनय विनय करने लगा। गुरु रविदास जी महाराज ने कहा, बादशाह हम तो फकीर ठहरे, हमें क्या मतलब सिंहासन से, हमें तो भूमि आसन ही चाहिए, ये तो आप जैसे राजाओँ महाराजाओं, बादशाहों को ही शोभा देते हैं, आप ही सिंहासन पर बैठो। सिकन्दर लोधी गुरु जी के तरले बास्ते करने लगा और कहा, महाराज आओ हम इकठ्ठे ही सिंहासन पर बैठते हैं, सिकन्दर लोधी ने, गुरु जी को बलपूर्वक ही अपने साथ सिंहासन पर बैठा लिया। गुरु जी को जल पान करवाया गया और ततपश्चात, सिकन्दर लोधी ऊँन से फरियाद करने लगा, हे ! दुनियां के सर्वोच्च पीर, पैगंबर गुरु रविदास जी हमारी आपके चरणों में यह अरजोई है, कि आप इस्लाम धर्म स्वीकार कर लो, हम आप के चरण धो धो कर पियेंगे। आप के नेतृत्व से इस्लाम के झंडे सारे संसार में झूलेंगे। गुरु जी को सिकन्दर लोधी की मक्कारी का तो पहले ही आभास था, गुरु जी ने कहा, हे ! बादशाह:----
" हिन्दू अंधा मुस्लिम काणा"
इसलिए आप हमें इन झमेलों में क्यों डालते हो, जिसे सुन कर लोधी के होश उड़ गए। सिकन्दर ने पुनः अरजोई करते हुए, पंजाब का राजपाठ, हूरें परियां धन दौलत की पेशकश की, जिसे गुरु जी ठुकरा दिया था, जिस से आहत हो कर सिकन्दर लोदी ने, गुरु जी को तुगलकाबाद की भयानक कैद में बन्द कर दिया था।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
जनवरी 14, 2021।

Comments

Popular posts from this blog

गुरु रविदास जी की क्रांतिकारी वाणी दोधारी है।

क्रांतिकारी शूरवीर गुरु रविदास जी महाराज।।

उत्तर प्रदेश में चल रहा बुलडोजर।