गुरु रविदास जी ने धोती तिलक लगा कर शंख क्यों बजाया ?
।।गुरु रविदास जी ने धोती तिलक लगा कर शंख क्यों बजाया?
गुरु रविदास जी के समय में ब्राह्मणों का आतंक इतना फैल चुका था कि, गुरु रविदास महाराज को भी चँवरवंशी ना कह कर चमार कहा गया था। ब्राह्मण कोई नहीं मारा जा रहा था मगर मुस्लिम बादशाहों ने, केवल भारत के पचासी प्रतिशत मूलभारतीयों को ही यातनाएँ देकर, अत्याचार किये। ब्राह्मण ही मुस्लिम बादशाहों को उकसाते थे, उन्हें भड़काते थे, उनके कंधों पर बंदूकें रख कर फायर करते थे, जिन के आतंक का मुकाबला कोई भी किसी भी जाति का नेता नहीं कर रहा था। केवल मूलनिवासी महाराणा प्रताप, महाराजा रणजीत सिंह, वीर शिवाजी ही, मुस्लिमों से, उलझ रहे थे, वे भी इसलिए कि वे भारत के मूलनिवासी ही थे। ये मूलनिवासी जनरक्षक ही युद्धों में घायल हो कर, शहीद होते जाते रहे थे। मूलनिवासी मुसलमान नहीं बन रहे थे, जिन्हें मुस्लिम बादशाह अंधाधुंध कत्ल करते जा रहे थे, जिन्हें ना तो राजा बचा रहे थे, ना ही ब्राह्मण मगर गुरु रविदास जी ने मूलनिवासी जनता की रक्षा की कमान अपने हाथ ले ली थी। उन को ना तो बादशाह, कोई आंच पहुँचा सके और ना उन के सलाहकार ब्राह्मण मरवा सके, केवल गुरु जी को असँख्य रुकाबटों का सामना करना पड़ा था, जिन्हें गुरु जी अपनी आध्यात्मिक शक्ति से निपट लिया करते थे।
गुरु रविदास जी महाराज के पास कोई सैन्य बल नहीं था, कोई तीर, तलवार नहीं नहीं थी, कोई उड़न खटोला नहीं था, कोई हनुमान नहीं था, कोई सुदर्शन चक्र नहीं था, कोई दुर्भाशा ऋषि का अभिशाप नहीं था, कोई मिजायल नहीं था। अगर उन के पास थे, तो केवल शब्द थे, केवल कलम थी, केवल दिमाग था, जिस के बल पर, खूंखार सिकन्दर लोदी जैसा हैवान भी, उन के तलवे चाटने लग पड़ा था। बाबर जैसा कातिल भी उन के चरणकमलों पर गिर कर, एक अच्छा इंसान बन गया था, ब्राह्मणों की तो उनके समक्ष कोई औकात थी ही नहीं। जब गुरु जी ने चार साल की आयु में ही धोती तिलक लगा कर शंख बजाया था, तभी उन्होंने, ब्राह्मणों के तंबुओं में आग लगा थी, उस समय अछूतों को, विशेष कर चमार जाति को धोती लगाना मौत को निमंत्रण देना था, शंख बजाने की तो किसी को कला ही नही थी, शंख तो ब्राह्मण भी बजाने में असमर्थ ही थे, जब गुरु रविदास जी ने शंख से अद्वतीय (Matchless) ध्वनि निकाल कर, कांशी शहर में सुनाई, उस से सारा ब्राह्मण समाज हतप्रभ हो गया था, सभी की सिटी पिटी हो गई थी, सभी दांतों में उंगली देकर मूक दर्शक बन गए थे, कि ये दैवीय ध्वनि कहाँ से आई।
धोती तिलक शंख का प्रयोग खूनी क्रान्ति की शुरुआत थी:----धोती लगा कर, गुरु रविदास जी ने, अछूत खूनी क्रान्ति का शंखनाद किया था, सामाजिक मान्यताओं के खिलाफ विद्रोह का खूनी बिगुल बजाया था, तिलक लगा कर ब्राह्मणों का भेष बनाना अछूतों को खूनी क्रान्ति करने के लिए आह्वान था। धोती, तिलक और शंख पर पुनः गुरु जी ने अधिकार जमा कर, ब्राह्मणों के पाखण्डों का मजाक उड़ाया था। मुस्लिम बादशाहों के खूनी शासन में ये कार्य कोई साधारण बात नहीं थी, ऊंची जातियों के, बड़े बड़े लोगों के गुर्दों में दम नहीं नही था कि वे ब्राह्मणवाद और काफर मुस्लिम बादशाहों के साथ पंगा ले सकें। छः हजार जातियां और भी थीं, मगर किसी भी जाति के किसी व्यक्ति की हिम्मत नहीं हुई थी, कि कोई ब्राह्मणों के आतंक और मुसलमानों की खूनी तलवारों का सामना कर सके। केवल गुरु रविदास जी महाराज ही, एक ऐसे वीर योद्धा हुए हैं, जिन्होंने शब्दबाण अपने तरकश में भरे और अकेले ही अश्वमेध यज्ञ के घोड़े पर सवार होकर कांशी नगरी से, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक समानता के लिए, युद्ध की रणभेरी बजाते हुए, अपने दो जांवाज सैनिकों रैदास जी महाराज और जीवनदास जी महाराज के साथ कूच कर गए थे, रास्ते में वीर सपूत सतगुरु कबीर साहिब मिल गए, चूहड़खाने में सतगुरू नानकदेव जी मिल गए, कुछ समय के बाद सतगुरू सेन जी महाराज और सत्पुरुष सदना जी मिल गए, वस यही गुरु जी की सेना थी, यही कमांडर थे, यही उन के तीर, मिजायल, परमाणु हथियार थे, जिन के बल पर, ब्राह्मणों के नाक में दम कर दिया गया और मुस्लिम खूनी बादशाहों को रक्तपात छोड़ कर, गुरु जी के बताए, बेगमपुरा सिद्धान्त पर शासन करने के लिये विवश होना पड़ा था। गुरु रविदास जी की वाणी ही सारे अत्याचारियों का ऑपरेशन करती थी, उन के गले सड़े अंगों को काट कर नए अंगों का प्रत्यारोपण करती जा रही थी।
गुरु जी ने, कहीं भी धोती और तिलक लगा कर मन्दिर में बैठ कर, शंख बजा कर परमात्मा की भक्ति नहीं की, कहीं भी किसी को अत्याचार सहन कर के लिये भक्ति करने की हिदायत नहीं दी, कहीं भी किसी को नहीं कहा कि, तुम मेरे अवसान पर मेरी भक्ति करना, मेरे मन्दिर बनवा कर, मेरी मूर्तियां स्थापित करना। वे तो अपना उदाहरण पेश कर गए थे, कि तुम भी ब्राह्मणवाद को नेशतनाबूद करने के लिए, लामबंद होकर, समाजवाद स्थापित करना, तभी तो वह कह गए हैं कि:---
ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिले सभन को अन्न। छोट बड़ सँभ सम बसें तां रविदास रहे प्रसन्न।
मगर आज तो, ये कहाँ हो रहा, आज तो गुरु जी को मन्दिरों में बैठा कर, उन के नाम पर धंधा चल रहा, बड़े मजे से पेट पाले जा रहे, उन की खूनी क्रान्ति को मन्दिरों में कैद कर के ब्राह्मणों के दुमछुल्ले बन कर, मूलनिवासियों के शोषण करने वाले प्रधानमंत्रियों, मुख्यमंत्रियों को गले में सरोपे डाल कर सम्मानित किया जा रहा है, और उन के तलवे चाटे जा रहे हैं। काश ये गद्दार गुरु रविदास जी महाराज के नाम को उज्ज्वल करने के लिए, उन के बताए मार्ग पर चलते और चल कर वहुजन राज की स्थापना कर के, जातीय वर्ण व्यवस्था को ध्वस्त करते, सभी जातियों को समाप्त कर के, सभी गरीबों को, रोटी, कपड़ा और मकान उपलब्ध कराने में सहयोग करते।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
जनवरी 24, 2021।
Comments
Post a Comment