गुरु रविदास जी के अनुसार कपटी वैरागी जीव की दशा।।

।।गुरु रविदास जी के अनुसार कपटी वैरागी जीव की दशा।।
गुरु रविदास जी महाराज, अपने साथ वैरागण रखते थे, जिसका सहारा उस समय लेते थे, जब उन्हें, तप में बैठ बैठ कर, थकान महसूस होती थी और अपना शारीरिक संतुलन बनाने के लिए, साधना के समय, उसे अपनी कोहनी के साथ लगाते थे, मगर उन का ये कोई आडंबर नहीं था, कोई बाह्य दिखावा नहीं था, इतना तो अवश्य था कि, वैरागण का सीधा संबंध, वैराग से, वैरागी से ही है। गुरु जी के अनुसार वैरागी, वैराग धारण कर लेता है, वैरागियों के साथ ही चलता फिरता है, वैरागण को साथ रखता है, मगर उस वैरागी का मन ना तो वैरागी होता है और ना ही वैरागण भी उस की नैया को पार लगाती है। बनाबटी वैरागी, केवल नाम का ही वैरागी बन कर रह जाता है, जिस का उसे कोई लाभ नहीं होता है, उलटा जीवन ही नरकमय बन जाता है। जब भी कोई सामाजिक, राजनैतिक मुशीबत खड़ी हो जाती है, तब उस का वैराग, उस का कोई साथ नहीं देता है, कोई भी भक्ति उसे सुरक्षा प्रदान नहीं करती, फिर उसे कई प्रकार के घोर दंड, सजाएं भुगतनी पड़ती हैं, जिस के उदाहरण आज जेलों में बंद पड़े बड़े बड़े डेरों के मालिक हैं, मगर सतगुरु रविदास जी, सतगुरु नानकदेव जी, सतगुरू कबीर जी, सतगुरू नामदेब जी, सतगुरु सेन जी और सतगुरु सदना जी को, अगर राजेताओं और धर्म नेताओं ने, दुख भी दिए तो, उन्होंनें अपनी भक्ति की दिव्य शक्ति से, राजनेताओं और धार्मिक नेताओं को, उन की औकात अवश्य दिखाई है, उन्हें इन सतगुरुओं की शक्ति के सामने हारना पड़ा, मुंह की खानी पड़ी, उनके चरणों में झुकना पड़ा था, माफी मांग कर उन का शिष्य बनना पड़ा, मगर आज के वैरागी होकर भी दुखों को सहन करते जा रहे, जो खुद को बचा नहीं सका, जो अपने आप की रक्षा नहीं कर सका, जो अपने आप को भी पुलिस और  कोर्ट कचैहारियों से नहीं बचा सके, वे अपने पिछलगुओं को और शिष्यों को कैसे बचा सकते हैं। गुरु रविदास जी महाराज ने ऐसे ही वैरागियों की कलई खोली हुई है, ऐसे ही छली, बनाबटी फकड़ों को उन की औकात भी बताई है, उनकी कमियों को उजागर कर के, सन्मार्ग पर चलने का ढंग भी प्रशस्त किया है। स्वामी ईशरदास जी के शब्दों में, गुरु रविदास जी महाराज, गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ साहिब के पृष्ठ संख्या 783-784 पर सँगत को समझाते हैं कि:----
                      ।। दोहा।।
शब्द गुरु का विराग ना करहि, भेख अनेक। 
कहे रविदास अंत समे, तूँ जमदूतां को वेख।
गुरु रविदास जी महाराज ने, ढोंगी वैरागियों और साधुओं के अंडबरों का भांडाफोड़ करते हुए उन के बहुरूपिए रूप, करूप को, उजागर करते हुए कहा है कि, हे ढोंगी सन्तों ! गुरु के बताए शब्द के साथ तूँ ने कोई वैराग नहीं किया। तुम ने शब्द के साथ विराग धारण नहीं किया, जबकि तुम ने अनेकों भेष बना लिए। गुरु रविदास जी इन भेड़ की खाल में छुपे हुए वैरागियों को, समझाते हुए फरमाते हैं कि, जब मृत्यु का समय आएगा, जब मौत के एजेंट आएंगे, जब तेरे कर्मों का लेखा जोखा देखा जाएगा, तब तेरा कृत्रिम वैराग, तेरा साथ नहीं देगा और तेरे वहुरूपीए रूप की सजा निर्दयी यमदूतों के गुरजों की मार से मिलेगी, तब तूँ चीखेगा, चिल्लाएगा, विलाप करेगा, रोयेगा मगर उस समय तेरा कोई सहाई नहीं होगा। तुझे यमदूतों के दर्शन करने पड़ेंगे, उन के डंडे सहन करने ही पड़ेंगे।
                  ।।शब्द आसा।।
जमदूतां वल जीड़ा वेख डरिआ, डरिआ, तां डरिआ। मानस जनम क्यों गुआया, ना ही नाम धिआया। आघ करम में समा विहाया हुण वेला आया। नाम बिहूणा मंद लेख फड़िया, फड़िया, तां फड़िआ। मार मार धाह जीड़ा रोया पछताया। शुभ करम मुझ से ना होया शरमोया। औगुणा दे विच जीड़ा देख भरिआ, भरिआ, क्यों भरिया। करदे नसीहतां लख सिआणें मैं कीते भाणें। करां की उपा वक़त विहाणे पछताई राणें। दोजख दी सूली जीड़ा देख चढ़िया, चढ़िया, तां चढ़िया। दास कहे किसे चल चाली ना जाईं खाली। राम नाम बिंना नहीं कोई बाली लै संभाली। राम नाम बिन तूँ झूठा भेख धरिया, धरिया, क्यों धरिया।
गुरु रविदास महाराज फरमाते हैं कि, भयानक कुरूप यमदूतों को देख कर, जिंदा रहने वाला, जीव (जियड़ा) जब डरने लगता है, तो डरता ही रहता है, हे मानव! तुम ने ये जीवन बर्बाद क्यों किया, क्यों सारी आयु आदपुरुष का नाम नहीं लिया, पाप कर्मों में ही तूँ ने समय बिताया, अब जब आखिरी समय आ गया और नाम के बिना बुरे कर्मों के लेख ही दिखाई दे रहे हैं, जो कर्म तूँ ने पकड़े हुए थे। अब आखिरी समय पर, तूँ जीव सिर मार मार कर, रो रो कर, चिल्ला चिल्ला कर पच्छता रहा है, शर्म के मारे कह रहा है, कि मैंने कोई भी अच्छा काम नहीं किया। अबगुणों से ही भरा रहा, अब सोच रहा है कि, मैं इन से क्यों भरा रहा। सियाणे, बुद्धिमान लोग लाखों उपदेश देते थे मगर मैंने अपनी ही मनमर्जी की। अब तो समय बीत चुका है, समय बीत जाने पर बड़े बड़े राजे महाराजे भी पछताते ही हैं। नरक की सूली की सजा सुन कर, जीव उस पर चढ़ गया तो चढ़ता ही रहा। दास कहते हैं कि जिस चाल से जीव तूँ चलता रहा है, उस की कमाई कभी भी खाली नहीं जाती है। राम नाम के बिना तेरा कोई भी सहयोगी नहीं है, राम नाम के बिना तुम ने झूठा ही भेष धारण किया हुआ था, ऐसा भेष क्यों धारण किया हुआ था।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
जनवरी 18, 2020।

Comments

Popular posts from this blog

गुरु रविदास जी की क्रांतिकारी वाणी दोधारी है।

क्रांतिकारी शूरवीर गुरु रविदास जी महाराज।।

उत्तर प्रदेश में चल रहा बुलडोजर।