गुरु रविदास जी और "ऐसी लाल तुझ बिन कौन करै"।।
।।गुरु रविदास जी और "ऐसी लाल तुझ बिन कौन करै"।।
गुरु रविदास जी महाराज का जिस समय जन्म हुआ था, उसी समय उन्होंने अपनी दैवी शक्ति का जलवा ब्राह्मणों को दिखा दिया था, जन्म से अंधी दाई की आंखों में ज्योति डाल कर, उसे सुनयनीं बना दिया था, नवजात शिशु के, इस चमत्कार को देख कर दाई ने कहा था कि, कालू दास जी महाराज, ये बच्चा कोई रवि नूर धरती पर अवतरित हुआ है, ये कोई साधारण बालक नहीं है, ये चारों वर्णों का गुरु जरूर बनेगा, जो वास्तव में ही आज कल सत्य सिद्ध हो चुका है। जब चार वर्ष की आयु हुई थी तभी गुरु रविदास जी ने, अपना दहिना शंख बजा दिया था, जिस की ध्वनि सुन कर, ब्राह्मणों की कुलियों में आग के शोले बड़ी तीव्रता से धधक उठे थे, जिन के कारण सारे ब्राह्मण निकलती हुई मासूम कोंपल को कुचलने के लिए लामबंद हो गए थे। आठ साल की आयु में, गढ़ाघाट पर गुरु जी महाराज को ब्राह्मणों ने शास्त्रार्थ के लिए बुला लिया था, जिस में वे बुरी तरह से पराजित हो गए। उस समय कोई कानून नहीं था, कोई दलील, अपील नहीं चलती थी, कोई जज नहीं थे, वस था तो केवल एक ब्राह्मण मंत्री जो हमेशा ही राजा को उलटी ही सलाह देकर निराप्राधियों को भी सूली पर टँगा दिया करते था।
जब गुरु रविदास जी महाराज से, ब्राह्मण बुरी तरह से पराजित हो गए, तब वे खून खराबे पर उतर आए, मगर उन की लाठियां आसमान में ही रह गई और जब वे उन की ओर प्रहार करने के लिए बढ़ते तो अंधे हो जाते थे, जिस से भयभीत हो कर वे क्षमायाचना करके प्राण बचा कर घर को भाग गए थे। वे इतनी सजा भुगत कर भी नहीं सुधरे, ना ही समझे और राजा नागरमल के पास चले गए। राजा को झूठी दरखास्त दे कर उन्हें सूली पर चढ़ाने का, कल्पित महाअभियोग शुरू कर दिया, मगर राजा नागरमल बुद्धिमान था, उस ने दोनों ही पक्षों को नदी में अपने अपने देवताओं को तैराने के लिए कहा और ये भी शर्त रखी कि जो हारेगा, वह जीते हुए दूसरे पक्ष को पालकी में बैठा कर, सारे कांशी शहर में, सिर पर छत्र रख कर घुमाएगा। जब दोनों पक्षों की परीक्षा ली गई और उस में ब्राह्मण फिर बुरी तरह से पराजित हो गए, तब ब्राह्मणों को शर्तानुसार, गुरु रविदास जी महाराज को पालकी में बैठा कर, सिर पर छत्र ओढ़ा कर सारे कांशी शहर में शोभायात्रा निकालनी पड़ी थी। उसी समय गुरु रविदास महाराज ने, आदपुरुष का शुक्रिया अदा करते हुए, विशाल जनसभा के बीच तर्क संगत सत्संग किया, जिस में गुरु जी ने ये शब्द तत्काल घड़ कर गाया था कि:---
ऐसी लाल तुझ बिन कौन करै।
गरीब निवाजु गुसिंईंयां मेरा।।
माथे छत्र धरै।।।
मात्थे पर छत्र महाबली को चढ़ता:---वर्तमान में भी, जिस योद्धा ने, अपनी जॉन हथेली पर रख कर, जंगे ए मैदान जंग फतेह किया हुआ होता है, उसी वीर सपूत को परमवीर चक्र मिलता है, उसे ही सर्वश्रेष्ठ सम्मान मिलता है, उसे ही ये वीरता का छत्र धारण करवाया जाता है, ऐसा ही गुरु रविदास जी महाराज को सम्मानित करने के लिए, राजा नागरमल की अदालत में, गुरु जी को परमवीर चक्र देकर, छत्र धारण किया गया था, इसी से ही गुरु रविदास जी की अजेय शक्ति का अहसास सभी को हो सकता है, वे छत्रपति सम्राट हुए हैं, वैसे भी वे छत्रपति चँवर वंश के ही छत्रपति सम्राट थे, जिस तमगे को कोई भी ना तो उस समय छीन सका था, ना ही कोई अब भी छीन सकेगा, भले ही ब्राह्मणों ने ईर्षा वश, उन के अवसान के बाद, उन का फिर नामो निशान मिटाने का कुप्रयास किया गया है मगर, जल्दी ही ऐसा जघन्य दुष्कर्म करने वालों को, सजाए मौत मिलने वाली है।
आदपुरुष का शुक्रिया:---सिर पर छत्र झुलाने के लिए, गुरु रविदास जी महाराज ने, आदपुरुष का शुक्रिया अदा करते हुए, तत्काल ये शब्द ईजाद कर के गाया कि, हे आदपुरुष जी ! ऐसी लाल अर्थात इज्जत, मान सम्मान आप के बिना कौन बचा सकते हैं ? ऐसी जीत का सेहरा केवल आप ही बॉन्ध सकते हैं, आप ही छलियों को छल की सजा दे सकते हो। हे गरीवों को छत्र, सम्मान और प्रतिष्ठा प्रदान करने वाले मालिक ! आप से बड़ा कोई नहीं है, आप ने ही मुझ जैसे गरीब चँवरवंशी चमार का रुतबा बढ़ाया है, आप ने ही विश्व में मेरा नाम रोशन किया है, मैं आप का वहुत वहुत धन्यवादी हूँ।
वास्तव में ही छत्र विश्व विजेताओं के ही मात्थे पर झूलता है। ये शब्द मारू राग में लिखा गया है, जिसे उस समय गाया जाता है, जब कोई वीर योद्धा रणभूमि में युद्ध जीत कर, रणभेरियों की गर्जना के बीच वापस अपने किले में आता है। गुरु रविदास जी महाराज भी, वीर चक्रवर्ती सम्राट बन कर ही उभरे थे, जिन का कोई भी सानी अवतार आज तक धरती पर नहीं आ सका।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
जनवरी 27, 2021।
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