गुरु रविदास जी महाराज और सतिसँगत मिली रहियो माधो।।
।। गुरु रविदास जी महाराज और सतिसँगत मिली रहियो माधो।
गुरु रविदास जी महाराज ने, सँगत को आपस में अच्छी सँगत में रह कर, मिल जुल कर, एकता बना कर, रहने का निर्देश दिया है। वर्तमान में युग में भी यही कहा जाता है कि:---
"संघे शक्ति कलियुगे"!
वैसे मैं तो काल विभाजन को सही नहीं मानता हूँ, क्योंकि ये काल विभाजन केवल भारत के ब्राह्मणों ने किया हुआ है, अन्य किसी देश में ऐसा काल विभाजन नहीं है। ब्राह्मणों ने केवल कलियुग को अपनी रोजी रोटी का साधन बनाया हुआ है, जिस के आतंक से हिन्दू भयभीत रहते हैं मगर ये कथन सत्य ही है कि, आज संगठन में ही शक्ति है। आज के विद्वान भी यही कहते हैं कि, यदि सुख से जीना चाहते हो, दुष्टों से भी सुरक्षित रहना चाहते हो, दुष्ट अत्याचारियों के अत्याचारों से सुरक्षित रहना चाहते हो, हिंसक जीवों से प्राण रक्षा चाहते हो तो आपस में मिल जुल कर रहो और रास्ते पर भी चलो, मिल जुल कर जीवन बसर करो अन्यथा आप की आवाज तक बन्द कर दी जाएगी, आप को बोलने तक नहीं दिया जाएगा, आप का शोषक, शोषण कर के, आप को नङ्गे, भूखे, प्यासे और कैद में डाल कर रखेंगे, जिस का आज साक्षात उदाहरण मोदी शासन आप के सामने आ चुका है, आज अगर कोई माब्लिंचिंग के खिलाफ पुलिस में, रप्पट भी लिखवा रहा है, तो उसी के ऊपर झूठा केस दर्ज किया जा रहा है। ये काला इतिहास, दोहराया जाता रहेगा, जिस के खिलाफ, गुरु रविदास जी महाराज ने, आज से छः सौ साल पहले ही लिख दिया है कि, आप अच्छी और सच्ची सँगत बना कर, संगठन बना कर रहना अन्यथा, तुम्हारे ऊपर अमानवीय अत्याचार और जुलम ढाए जाएंगे, आप के ऊपर कहर बरसाने वाले माब्लिंचिंग जैसे अति घोर प्रहार होंगे, आप को निरपराध होने पर भी बुरी तरह मारा, पीटा जाएगा, आप को जमीन से बेदखल कर के, बेघर किया जाएगा, आपको नङ्गे, भूखे रख कर मारा जाएगा, आप को मौलिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया जाएगा, जो आज सत्य सिद्ध होता जा रहा है।
गुरु रविदास जी के कहा है,
"सतिसँगति मिली रहियो माधो"
इस पंक्ति का शाब्दिक अर्थ है, हे मूलनिसियो! आपस में अच्छी सँगत बना कर रहना। हमें इन शब्दों को बोर्ड के ऊपर, स्वर्ण अक्षरों में लिख कर, घर घर में, दीवार पर लटका कर, हररोज पढ़ते रहना चाहिए ताकि ये हमें याद आता रहे। हमारे मन्दिरों में बैठे हुए साध इस क्रांतिकारी पंक्ति की इसी तरह की व्याख्या तो खूब करते आए हैं, खूब प्रचार करते आए हैं, अपनी सँगत को बढ़ाने के लिए, सत्संग में प्रचारित करते हैं, ताकि लाखों करोड़ों की तादाद में लोग उन के पास आएं और लाखों करोड़ों रूपये गुरुदुआरों, मन्दिरों में चढ़ाएं और उन की तिजोरियों को भी भरते रहें, मगर जो गुरु रविदास जी ने, सँगत के लिए, आगे क्रांतिकारी फरमान जारी किया था, उस की कभी व्याख्या नहीं करते हैं, उन्होंने कहा था कि :----
"जैसे मधुप मखीरा"
"जैसे मधुप मखीरा" की कभी भी किसी साध ने तर्कसंगत व्याख्या नहीं की, कि जैसे मधुमखियों को कोई पत्थर मारता, उन के छत्ते को छेड़ता है, तो वे सारी की सारी, मिल जुल कर, प्राणों की बाजी लगा कर, आक्रमणकारियों पर टूट पड़तीं हैं, जबकि उन्हें ये भी ज्ञात होता कि, अब हम केवल शहीद हो कर अमर ही हो जाएंगी। पुनः वापस आ कर छत्ते में रह पाएंगी या नहीं, इस बात का उन्हें आक्रमण करते समय कोई ध्यान नहीं होता है, ना ही वे अपनी रानी मधुमखी से आक्रमण करने की अनुमति लेती हैं, वे तो बस बिना पूछे ही, दुश्मनों पर आक्रमण कर देती हैं और दुश्मनों को उस समय तक नोच नोच कर खाती हैं, उन का खून पीती रहती हैं, जब तक वह मर नहीं जाता है, गुरु जी के इस लक्ष्यार्थ को मन्दिरों में बैठे ये कायर साध कभी भी सँगत को नहीं बताते और ना ही ऐसी पूरी व्याख्या करते हैं, जिस से गुरु रविदास जी महाराज की क्रांति रुक गई है, इन साधों ने सँगत को कायर बना रखा है, केवल नाम जपो, नाम जपो ही पढ़ाते हैं और सँगत को अंधेरे में रहने वाली, धर्म कर्म की ही शिक्षा देते है और अपने वच्चों को विदेशों में विज्ञान पढ़ाते हैं। सँगत को नाम जपने का ही उपदेश देकर, गुरुओं की वाणी को भी तोड़मरोड़ कर सँगत को परोसते हैं ताकि, मूर्ख राजनीतिक आकाओं के मूक निर्देशों का पॉलन करते हुए वहुजन क्रान्ति रुकी रहे। ये लोग आत्म रक्षा के लिए भी, तनिक भी खून का बदला खून से लेने का ज्ञान नहीं देते, अपना निर्देश तो क्या ही देना, क्रांतिकारी गुरुओं के सन्देश को भी ये सन्त लोग प्रचारित नहीं करते है। आज तो जरूरत है, गुरु रविदास जी के क्रांतिकारी भावों को सँगत के मन मस्तिष्क में बैठाने की ताकि, धरती पर कोई दुखी ना रहे, किसी निर्दोष को कोई ना तो कोई मिले, ना ही किसी प्राणी का कोई भी मौलिक अधिकार छीना जाए, किसी की माता, वहन, बेटी से कोई बलात्कारी बलात्कार ना कर सके, तभी भारत में बेगमपुरा शहर बसाया जा सकता अन्यथा, साधों के सत्संग करना और सुनना ही बेकार ही होंगे, बेमानी ही होंगे।
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