गुरु रविदास जी महाराज और कहि रविदास खलास चमारा!!

।।गुरु रविदास जी महाराज और कहि रविदास खलास चमारा!!
गुरु रविदास जी महाराज ने, नेगेटिव भावों को पॉजिटिव कर के, अछूत समाज को सिर ऊंचा कर के स्वाभिमान से जीने की कला सिखाई है। वे जानते थे कि, ब्राह्मणवाद के कारण ही भारत के मूलनिवासी गुलाम है, मूलनिवासी नारकीय जिंदगी जी रहे हैं, शोषण की चक्की तले पिस रह हैं, पशुओं, जानवरों से भी बदतर समझे जा रहे हैं, जिन की दुर्दशा को देख कर वे स्वयं ही, अत्याचार सहन करने के लिए, मैदान में आ गए थे। उन्होंने सामाजिक विषमता के लिए ब्राह्मणों को ही, जिम्मेदार समझा और उन्हें सुधारने के लिए, धार्मिक विचारधारा को अपनाया मगर ये जाति सुधरने की अपेक्षा, और उग्र होती ही गई, जिस के कारण गुरु जी को ब्राह्मणों के कोप का स्वयं भाजन बनना पड़ा। ब्राह्मणों ने, अपनी पाखण्डवाद और आडंबरवाद की कागज की नैया को बचाने के लिए, तत्कालीन बादशाहों का अनुचित लाभ उठाया और उन को उकसा और भड़का कर, गुरु जी को मानसिक, शारीरिक यातनाएँ दिलाई। गुरु जी ने, डट कर ब्राह्मणवाद का सामना किया। जब सिकन्दर लोदी, गुरु जी से शास्त्रार्थ में बुरी तरह पराजित हो गया, उन के तलवे चाट कर हार गया, उन्हें राजपाठ, अथाह धन दौलत का लालच देकर हार गया, उन्हें हूँराँ, परियां देकर हार गया, आग से तपती हुई दिल्ली की, तुगलकाबाद की जेल में कठोर कैद में डाल कर के पराजित हो गया था, तब क्रोध में आ कर, उस ने कह दिया था कि, तूँ रहा चमार का चमार! गुरु रविदास महाराज ने, बड़े स्वाभिमान से, इस कलंक के दाग को सिर मात्थे पर ओढ़ लिया था और जगह जगह जब वे प्रवचन करते थे, तो बड़े ही स्वाभिमान से कहने लगे कि:---
कहि रविदास खलास चमारा।
जो हम शहरी सु मीत हमारा।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, सिकन्दर लोदी के इस अपमान जनक शब्द को ही पॉजिटिव कर के, उस के अहंकार की हवा निकाल कर, उस की औकात बता दी थी। मुस्लिम काल में चमड़े का काम, बड़े लार्ज स्तर पर किया जा रहा था, गुरु जी का परिवार भी चमड़े के उद्योगपति था। जिन के कारखानों में, चमड़े के महंगे से मंहगे उत्पाद बनते थे, जिन में घोड़ों की काठियाँ, जैकटें, युद्ध में प्रयोग की जाने वाली सुरक्षा सामग्री, दस्ताने, पशुओं, पक्षियों के नमूनों के खिलौने आदि बनते थे, जिस कारण उस समय में चमड़े के व्यवसाय को सम्मानजनक समझा जाता था मगर लोधी ने, इस सम्मानजनक व्यवसाय को अपमानित करने के लिए, गुरु जी को निशाना बनाया था, जिस का अनुचित लाभ ब्राह्मणों ने उठाया और गुरु के चँवरवंशी वंश को ही चमार जाति घोषित कर दिया। चँवर वंश के सम्राट सिद्धचानो जी महाराज को चमार देवता और उन की साम्राज्ञी लोना जी को भी लोना चमारी देवी घोषित कर दिया गया। ये सर्वस्व ब्राह्मणों ने, गुरु रविदास जी के समाज को भी अपमानित करने के लिए किया था मगर गुरु जी ने, इस अपमानजनक शब्द को ही सम्मानजनक जाति घोषित कर दिया था।
गुरु जी ने खलास चमारा क्यों कहा:----गुरु जी ने, ये शब्द अपने नाम के साथ इसलिए जोड़ा ताकि चँवरवंशी वंश इसे अपना सम्मान समझ कर, ब्राह्मणों और सिकन्दर लोदी की आत्मा को जला कर, झकझोड़ सके। उस समय गुरु जी से बड़ा कोई भी पीर, औलिया, मुल्ला, योगी, जोगी पंडा और पुजारी नहीं था। ये सभी लोग उन की दैवी, आध्यात्मिक शक्ति के सामने हार चुके थे, सिकन्दर लोदी की हवा निकल चुकी थी। गुरु जी की शक्ति का डंका सारे विश्व में फैल चुका था। अरब में बैठा बाबर मन मे सोच रहा था कि, कब मैं भारत में जाऊं और गुरु रविदास महाराज के दर्शन करूं। जब बाबर ने, पानीपत का युद्ध तोप के बल पर जीता, तब वह सीधा गुरु जी के ही पास आशीर्बाद लेना पहुँचा था, मगर गुरु जी ने आशीर्बाद तो क्या ही देना था, उसे बुरी तरह फटकारा था और कहा था, बाबर तुझे निहत्थों के ऊपर तोप से गोले चला कर, खून बहा कर क्या मिला ? क्या तुझे इस जघन्य अपराध के लिए अल्ला माफ करेगा ? क्या तू इस के लिए नरक का भागीदार नहीं बन गया ? गुरु जी के चरणकमलों पर गिर कर बाबर ने तोबा करते हुए, कत्लेआम करना बंद कर दिया था और उनके दर्शाए, बेगमपुरा संविधान के अनुसार ही बाबर ने राज किया था, जिस के लिए वह आज भी विश्व में प्रसिद्ध है।
गुरु जी ने, खलास चमारा कह कर, हमारी भी मरी हुई आत्मा को जागृत कर दिया है, जब से हम ने, यह पढ़ा है, तब से हम भी हीनता की भावना त्याग कर, मन में  स्वाभिमान महसूस कर रहे हैं कि, हम सब भी चँवरवंशी चमार राजाओं के पूत हैं, जो इस विशाल भारत के शासक हुए हैं, भावी बच्चे भी, पुत चमाराँ दे, कह कर गुरु जी के बताए रास्ते पर चल पड़े है, लगता है जल्दी ही, भारत में पुनः चँवरवंशी राज स्थापित हो जाएगा।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल
जनवरी 25, 2021।

Comments

Popular posts from this blog

गुरु रविदास जी की क्रांतिकारी वाणी दोधारी है।

क्रांतिकारी शूरवीर गुरु रविदास जी महाराज।।

उत्तर प्रदेश में चल रहा बुलडोजर।