गुरु रविदास जी महाराज के अनुसार मानव जीवन बड़े सौभाग्य से मिलता।।

।।गुरु रविदास जी के अनुसार मानव जीवन बड़े सौभाग्य से मिलता।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, जीव के जन्म से पूर्व और जन्म के बाद की परिस्थितियों का बड़े ही सजीव ढंग से, साध-सँगत को अपने सत्संग में, फरमाया है कि, जब जीव गर्भावस्था में होता है, तब वह गर्भवास में उलटा लटका हुआ होता है, अर्थात शीश नीचे की ओर और पांव ऊपर की ओर होते हैं, जो माता पिता, ही नहीं सारे परिवार और शुभचिंतकों को, खुशी का आलम होता है, मगर जो जीव नौ मास, गर्भ में उलटा लटक कर  जी रहा होता है, तब उस की क्या मन:स्थिति होती होगी, चिंतनीय विषय है। जब मानव गर्भावस्था में होता है, तब उस के दोनों हाथ, जुड़े हुए होते हैं, उससे लगता है कि, वह उस समय आदिपुरुख से यही प्रार्थना करता है, कि जब मैं संसार के दर्शन करूंगा तब, दोनों ही हाथ जोड़ कर, आप का ही नाम जपूंगा, मगर जब आदमी को संसारिक हवा लगती है, आदमी सांसारिक हवा में जीने लगता है, तब क्या क्या करता है? स्वामी ईशरदास जी महाराज, गुरु रविदास जी के भावों को, गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 961-962 पर बड़े तर्कपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करते हैं:--          
                   ।। शलोक।।
बड़े भाग वास लै, तूँ मानस जनम माहे आया। गर्भ वास करत फिरत अरजोइआँ, नाम भजूँ हरि राइआ। जनमियो दूध हेत तुम लागा मात गोद बठलाया। प्रभात बकत उठ रोवन लागो तेरी जननी शीर चुंघाया। सूतक माहे रिहा मलूह दा पल पल विवल कराया। वर्ष बीत गई तेह इह हाली वर्ष दूसरा चढ़िया। रोवन रूसना वर्ष दूसरे खेलणें संग पतिआया। मात तात भरात पछानै माँ पे कह कह बुलाया। वर्ष तीसरे बालकां साथ खेलन खेल खलाया। बाल रेत धाम बनावत बना बना कर ढाया। बाल उमर यों बीत गई चेतस ना रघुराया। चौथी वर्ष खत्म हो गई गर्भ अकरार भुलाया। पंजमें वर्ष मां वाप कह कह शब्द जाप जपाया। खसटमें साल पढ़ने बैठलायो भले तात कोई जाया। कोई पढ़त कोई मुग्ध खेल गुआवे दवाई दस कहाया। तन शतान पिआ बीच वर्ष बाहरवीं खोड़स गबरू बनाया। पंज ठगां ने डेरा कीता मोह भियो जग माया। साकत संग साकत बनियो भली सँगत प्रेम ना चाहया। मूर्ख मनमुख मुगध इह मन होया गिआन ना घट बसाया। साध सँगत ना सरवन वाणी प्रभात नाम ना जपाया। गभरू हो गमरूर गियो पसिंद ना काहू रखाया। मात तात सभ नाते भूले लाड़ी संग प्रणाया। झूठे मोह मध निस दिन सुत्ता नींद घणी ने सुलाया।रविदास भाग जे चंगे तेरे बन्दे, तूँ शरण गुर की तकाया।
स्वामी ईशरदास जी महाराज, के शब्दों में गुरु रविदास जी महाराज, फरमाते हैं कि, हे मानव! तेरे बड़े सौभाग्य थे कि, तुझे माँ के पवित्र गर्भ में निवास करने का सुअवसर मिला और मानव के रूप में, जन्म ले कर दुनियाँ में आया। तूँ तो नौ महीने माता के गर्भ में भगवान के पास प्रार्थना करता रहा कि, जब मैं गर्भ की सजा से मुक्त हो कर, संसार में आऊंगा, तब केवल आप का ही नाम जपूंगा। जन्म लेने के बाद, तुझे दूध पीने के लिए, माता की गोदी में बैठाया गया। सुवह के समय, जब जाग कर रोने लगा था तब माता ने, तुझे अपना दूध चुंघाया था अर्थात दूध पिलाया था। जब तेरा जन्म हुआ था, तब तेरे सारे घर में सूतक छा गया था, तूँ पल पल, बार बार (मलूह) मल मूत्र करता रहता था, माता  तुझे बुरी नजर से बचाने के लिए, बार बार (विवल) पर्दा करती ही रहती थी। पहले वर्ष तो तेरी यही दशा रही, जब दूसरा वर्ष बीतने लगा, तब रोने और रूठने लग पड़ा, दूसरों के साथ खेलने लग पड़ा, जब रूठ जाता था, तब तुझे प्यार से मनाया जाने लगा। तूँ अपने माता पिता को पहचाने लगा, माँ माँ और पापा पापा कह कर पुकारने लगा था। तीसरे वर्ष तूँ, बालकों के साथ खेलने लग पड़ा। तूँ वच्चों के साथ, रेत के घर बनाता और गिराता था। इसी प्रकार तूँ ने वचपन बिता दिया मगर रघुराय अर्थात भगवान को कभी भी याद नहीं किया।  चार पांच साल की आयु होने पर, माता के गर्भ में किये गए इकरारों को, तूँ बिलकुल ही भूल गया। पांचवें वर्ष में परिवार के लोगों को पहचान कर उन्हें बुलाने लगा। अगर अच्छे माता पिता ने, जन्म दिया हो तो उसे पढ़ने के लिए बैठाया जाता है और वह पढ़ने लगता है। कोई तो दस बारह वर्ष की आयु तक अच्छी तरह पढ़ता रहता है तो कोई खेलने में ही समय गंवा देता है। इसी बीच शैतान कामदेव शरीर में पैदा हो गया था और सोलह वर्ष की आयु में जवान हो गया। अब काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार आदि पांच ठगों ने आ कर शरीर में डेरा डाल दिया था। सांसारिक माया मोह पड़ गया। शक्ति के पुजारियों के साथ मिल कर कुसंगी हो गया, मास मदिरा में संलिप्त हो कर, किसी से भी प्रेम नहीं किया और कोई भी अच्छी सँगत नहीं की। मन का गुलाम हो कर, संसारिक विषय विकारों में डूब कर, मन में ज्ञान धारण नहीं किया। कभी साधु संतों की सँगत नहीं की और ना ही धार्मिक वाणी का सत्संग सुना। ना कभी सुवह उठ कर प्रभात जाप किया। जवान हो कर भी, जवानी के नशे में मगरूर हो कर, किस को ना तो पसन्द किया और ना ही अच्छा समझा। जब दुल्हन के साथ विवाह कर दिया गया तब माता पिता और सभी सगे संबधियों को भी भूल गया। दिन रात झूठे माया मोह में डूब कर गहरी नींद में सोया रहा। गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, हे मानव! यदि तूँ अपनी किस्मत को अच्छा बनाना चाहता है तो, अच्छे गुरु की शरण में चले जा, तभी तेरा कल्याण संभव है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
19 जनवरी, 2020।

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