गुरु रविदास जी फरमाते मैंने राम नाम धन लादिया विख लाड़ी संसारी।।

।।गुरु रविदास जी फरमाते "मैं राम नाम धन लादिया विख लादी संसारी"।।
गुरु रविदास जी महाराज की वाणी क्रान्ति का उदघोष है, जिसे समझने, परखने और उस की व्याख्या करना साधारण आदमी के वश की बात नहीं है। उन्होंने जिस चँवर उर्फ चमार वंश में जन्म लिया था, उसे विदेशी यूरेशियन घुसपैठियों ने, पांच हजार सालों से शिक्षा से वंचित कर के रखा हुआ था। गुरु रविदास जी महाराज से पूर्व का इतिहास खोल कर देखा जाए तो, कोई भी मूलनिवासी साहित्यकार दिखाई नहीं देता है। जब अक्षर ज्ञान पर ही प्रतिबंध था तो साहित्य लिखने का सवाल ही पैदा नहीं होता है। जब दिव्य शक्ति के मालिक गुरु रविदास जी महाराज ने, लिखना चाहा था, तो उन्हें देंवनागरी लिपि का भी प्रयोग करने नहीं दिया था, मगर दिव्य ज्योति को तो कोई रोक नहीं सकता, उस की किरणों का प्रकाश स्वत ही ज्योतिर्मंडल में विकीर्ण हो ही जाता है। ये तो उस समय की बात है, जब मूलनिवासियों को पढ़ने, लिखने और सत्संग में प्रवचन करने का अधिकार नहीं था, स्वतंत्रता के बाद से यही गुलामी चलती आ रही है। ऊनी सौ बहत्तर में, जब मैंने आर्टिकल लिख कर, मनुवादी अखबारों को भेजना शुरू किए तो उन के सम्पादकों ने, लेख कविताओं को अपने पेपरों में नहीं छापा। अब जब सोसल मीडिया चला, तब लिखने को मन किया। जब गुरु जी का समय था, तब तो साहित्य लिखने की बात करना भी व्यर्थ है। गुरु रविदास जी ने, तत्कालीन चुनौतियों को स्वीकार कर लिया और गुरमुखि लिपि ही खोज डाली, जिसे भी मनुवाद के समर्थकों ने हाईजैक कर लिया था, जिस के न्याय के लिए, हमें लाहौर हाईकोर्ट में जाना पड़ा था, जहां सन1932 में, गुरमुखी को गुरु रविदास जी की लिपि घोषित किया गया है। इसी लिपि के माध्यम से, उन्होंने अपना आग उगलने वाला क्रांतिकारी साहित्य लिख तो दिया था, मगर उसे समझने, परखने और व्याख्या करने वाले, पैदा नहीं हो सके। हमारे मूलनिवासी सरदार प्रोफेसर दितसिंह जी ने, गुरु ग्रँथ साहिब की व्याख्या कर के, सिख धर्म को वहुत बड़ी देंन दे दी थी, जब कि कोई भी सिख साहित्यकार ये पवित्र काम नहीं कर सका था मगर वे भी विशेष कर अछूतों के लिए कोई वहुत बड़ा क्रांतिकारी आंदोलन नहीं चला सके। प्रोफेसर लालसिंह जी ने, पहली बार गुरु रविदास जी की क्रांतिकारी वाणी की व्याख्या क्रांतिकारी भाषा और तर्क के आधार पर, लिख कर भावी अछूत स्कॉलरों का मार्ग प्रशस्त किया है। गुरु रविदास जी की वाणी को उन्होंने समझा और परखा है।
मैं राम नाम धन लादिया:----गुरु रविदास जी महाराज के, ये पांच शब्द, ब्राह्मणों के ज्ञान की पोल खोल देते हैं, किसी भी मनुवादी लेखक ने, इस तरह का सत्य लिखने का साहस नहीं किया है। गुरु जी स्पष्ट और पूरे आत्मबल से लिखते हैं कि, हम ने अपने ट्रक में, अमूल्य राम नाम रूपी धन दौलत भरा हुआ है, जिसे हम मूलनिवासी अछूत व्यापारियों को, मुफ्त में बांट रहे हैं, जिन के पास ये धन नहीं है और जिन्हें इस धन को रखने का ही कोई अधिकार नहीं है, हम उन्हीं के लिए आंदोलन कर रहे हैं, क्योंकि मनुस्मृति शूद्रों को धन, धरती और शिक्षा रखने की अनुमति ही नहीं देती थी, जिस के कारण भोलेभाले शूद्र गुलामी की जिंदगी जीते आ रहे हैं,  मैं इन्हीं गुलामों को, राम नाम धन अपनी ट्रेन में लाद कर गाँव गाँव जा कर बांट रहा हूँ। ऐसा धन किसी भी मनुवादी व्यापारी के पास नहीं है और ये बात सत्य ही है, क्योंकि जो भी साहित्य लिखा गया है, वह सारे का सारा ही शूद्र ऋषियों वेद व्यास, महाऋषि वाल्मीकि जी महाराज ने ही लिखा हुआ है, नीति शास्त्र शुक्राचार्य जी लिख गए हैं, जिसे ब्राह्मणों ने छीन कर, मनुवादी पुट देकर अपना बना लिया है। इसी कारण गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि:--- 
"विख लादी संसारी"।
गुरु रविदास जी महाराज ने, इन तीन शब्दों में बड़े बड़े ज्ञानियों की पोल भी खोल कर रखी हुई है। वे फरमाते हैं कि, संसार के लोगों ने अपने मॉलवाहक पोतों में विष भरा हुआ है, जिस से मानव जहरीला हो चुका है, विष मनुवादियों के दिलों में इतना फैल चुका है कि, ये विषैले नाग बन चुके हैं, इन के ज्ञान के कारण, लोग पालकी में बैठ कर, घोड़ी पर चढ़ कर बारात तक नहीं निकाल सकते, अच्छी शिक्षा भी ग्रहण नहीं कर सकते, धन दौलत नहीं रख सकते। ये सर्वस्व ही विष है मगर गुरु रविदास जी कहते हैं कि, हमने सभी जातियों के लिए, राम नाम का धन बांटने का क्रांतिकारी आंदोलन शुरू कर रखा है, हमारे लिए कोई छूत अछूत, ब्राह्मण अब्राह्मण, कोई ऊँच नीच, कोई काला गोरा नहीं है, वस हमारे लिये वही इंसान है, जो इंसान बन कर इंसानों की कद्र करता है।
गुरु जी के इन शब्दों का वास्तविक उद्देश्य ये है कि, ज्ञान रूपी धन, मेरे सिवाए किसी के पास नहीं है, अगर होता तो आज तक ना कोई छूत होता और ना कोई अछूत होता। ना जातिपाति रहती, ना कोई ऊँच नीच होता। आज जरूरत है, गुरु जी की विचारधारा को समझने की, परखने की, विचारधारा को आत्मसात कर के, उन के समाजवाद के सिद्धांत को निडर, निर्भय हो कर लागू करने की, अगर कोई बीच में रोड़ा बनने का प्रयास करे तो उसे अकल देने की।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
जनवरी 26, 2021।

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