गुरु रविदास जी कहते जैसे रंग कुसुंभ का तैसा इह संसार।
।।गुरु रविदास जी कहते जैसा रंग कुसुंभ का तैसा इह संसार।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, अपनी वाणी की रचना करते समय, एक एक वर्ण, एक एक शब्द वैसे ही चुन कर काव्य रचना में जड़े हुए हैं, जिस प्रकार जयमाला में फूल पिरोए जाते हैं। उन की रचना के शब्द पढ़ने, देखने और सुनने में वहुत ही सरल होते हैं मगर उन के अर्थ अत्यंत गंभीर होते हैं, जिन के अर्थों को समझना किसी भी अनाड़ी व्यक्ति का काम नहीं है। बिहारी कवि की कविताओं की बारीकी को ध्यान में रख कर, कुछ आलोचकों ने लिखा हुआ है कि:------
सत सैया के दोहरे, ज्यों नाविक के तीर, देखन में छोटे लगें घाव करें गंभीर।।
बिहारी कवि गागर में सागर भरने, अपने भावों को अपने शब्दजाल में पिरोने में तो प्रशंसनीय और सिद्धहस्त थे, जिस के कारण ही उन्हें इन शब्दों से नवाजा गया है, मगर उन के भाव और शब्द सुंदरियों के हाव भावों, कटाक्षों, निर्लज कारनामों को ही दर्शाते हैं, उन के श्रृंगार, लचक, कृत्रिम दिखाबे को ही व्यान करते हैं, मगर गुरु रविदास जी महाराज ने कहीं भी, नारी को भोग विलास की वस्तु समझ कर, उस के अंगों प्रत्यंगों का चित्रण नहीं किया है, अपितु उन्होंने, समाज की दुखती हुई नशों को पकड़ कर, उन के दुख, दर्द और पीड़ा को समझा, परखा और उन की बिमारियों का इलाज तलास किया है। इन की वाणी के एक एक, छोटे छोटे शब्द में असँख्य लक्ष्यार्थ छुपे हुए होते हैं। अगर कोई विद्वान गहराई से उन की वाणी का अनुशीलन करे, तो उसे ढूंढने पर सभी शब्दों में अनेकों लक्ष्यार्थ मिलते हैं। वाक्य के प्रत्येक शब्द के अर्थ गूढ़ अर्थ रखते हैं, वे लिखते हैं कि, जैसा रंग कुसुंभ का तैसा इह संसार।।
एक बार गुरु रविदास जी महाराज, अपने सन्त वृन्द के साथ, मुंबई से अहमदाबाद जा रहे थे, जिस के मध्य साठ मील की दूरी पर बहने वाली सूरज नदी के किनारे पर वे अपने साथी सन्तों, महात्माओं के साथ विश्राम कर रहे थे, उन के साथ सतगुरू कबीर साहिब, सतगुरू नामदेव जी, सतगुरू सेन जी महात्मा रैदास जी, महात्मा जीवनदास जी भी थे। सूरज नदी के किनारे पर ही एक श्मशानघाट भी है, ठीक उस के सामने, नदी के पार एक कुसुंभ पेड़ों का जंगल भी है, जो आज भी वहां मौजूद है, अब भी वहाँ, विरले विरले कुसुंभ के पेड़ देखे जा सकते हैं। सभी गुरु, पीर और सन्त वहां मौज मस्ती में थे, कबीर साहिब ने गुरु रविदास जी महाराज को अर्ज करते हुए कहा, महाराज कोई शब्द तो गाओ, गुरु जी तो प्रकृति के प्रत्येक स्वाभाव को बड़ी ही गहराई से समझते थे, उन्होंने, वहां की ही पवित्र धरती के उपमानों, प्रतीकों को अपने शब्दों में गूँथा और गाने लगे कि, "जैसा रंग कुसुंभ का तैसा इह संसार"।
गुरु रविदास जी महाराज ने, बहती हुई सूरज नदी, उस के साथ ही बने श्मशानघाट, उस के सामने सुरम्य घने कुसुंभ के पेड़ जो लाल लाल रंग के मनमोहक कुसुमों से लदे हुए थे, उन्हीं को देख कर फरमाते हैं कि, कबीर साहिब ये सामने कुसुंभ के लाल लाल फूल हैं, कितने मनमोहक, मुलायम और कितने सुंदर हैं ? ये फूल प्रत्येक प्राणी को अपनी ओर बरबस ही आकर्षित कर लेते हैं, प्रत्येक कवि की कल्पना के भाव बन कर, मानव को कई प्रकार के सन्देश देते हैं। कोई श्रृंगार का कवि इन्हें अपनी कामवासना के पुट देकर अपनी काव्य रचना में समाहित कर देता हैं, कोई इस के सारगर्भित सौंदर्य, क्षणिक जीवन को अपनी दार्शनिकता का रंग दे कर के अपने भावों को व्यक्त करता है।
ये फूल अपने तन को त्याग कर, जब पेड़ से गिर जाते हैं, तब शाम भी होने नहीं देता और मुरझा कर, क्षणों में ही मर जाता है। जिस प्रकार ये फूल सुंदर होते हैं, वैसे ही इस संसार के प्राणी हैं। जिस प्रकार ये कुसुंभ के फूल क्षणों में ही अपनी सुंदरता को त्याग कर, संसार को भी त्याग देते हैं, ठीक वैसे ही इस संसार के जीव भी कुछ समय इस उपवन में, विश्राम कर के, हंसते हुए जीवन व्यतीत करते हैं और इन्हीं फूलों की तरह, अपने नश्वर शरीर का त्याग कर के, सदा सदा के लिए, ज्योतिर्मंडल में समा जाते हैं, फिर पुनः आत्मा इस धरती पर नहीं आ पाती है। इस लिए प्राणी को, धरती पर आ कर, आपस में प्यार और सदभावना से रहना चाहिए।
इस पंक्ति से स्पष्ट होता है कि, गुरु रविदास जी महाराज से बड़ा कोई भी कवि और आलोचक नहीं हुआ है, जिस ने सत्य को समझा हो, प्रकृति को परखा हो, भले ही कुछ लोगों को प्रकृति के कवि कहा गया है मगर वे सभी गुरु रविदास जी महाराज का कोई साम्य नहीं रखते हैं, कोई भी उन के सामने टिक नहीं पाता है, कोई भी उन की वाणी के समान ना तो लिख सका है और ना ही लिख सकेगा। गुरु जी के शब्द वाणों का कोई भी प्रयोग नहीं कर सका है, जिन के बारे में वर्ण और जातीयता के पुजारियों ने, कभी सत्य को सत्य समझ कर नहीं लिखा है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
जनवरी 23, 2021।
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