गुरु रविदास जी महाराज के अनुसार मानव शरीर चन्दन है।।
।।गुरु रविदास जी महाराज के अनुसार मानव शरीर चन्दन है।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, असँख्य जीवों में केवल और केवल मानव को सर्वश्रेष्ठ, सर्वोच्च स्थान दिया है। वास्तव में ही, मानव की रचना आदपुरुष ने, बड़े ही सोच विचार के साथ की हुई है, क्योंकि नौ दरबाजे तो केवल मानव को ही लगाए हुए हैं, सब से अनुपम, अद्वितीय और सुंदर संरचना मानव की ही हुई है। कुछ प्राणियों को तो कीड़े मकोड़े ही खाने के लिए दिए हुए हैं, कुछ के लिए घास फूस ही खाने के लिए दी हुई है, कुछ को केवल मांस और खून ही भोजन के रूप में स्वीकृत किया हुआ है, कुछ को मांस और अनाज दोनों ही खाने के लिए दिया हुआ है, मगर मानव जाति को, इन सब जीवों से हट कर, केवल सर्वश्रेष्ठ भोजन दूध, दही, घी, फल, मेवे, अनाज, सब्जियाँ और जड़ी बूटियां प्रदान की हुई हैं। सभी जीवों की अपेक्षा सोचने की शक्ति भी मानव को अनूठी ही दी हुई है। इतना ही नहीं सभी जीवों का भी मानव को सिरमौर ही बनाया हुआ है, सभी प्राणी केवल मानव के सामने ही हथियार डालते हैं, चाहे वह शेर, चीता, टाइगर, हाथी, मगरमच्छ और अजगर ही क्यों ना हो। आदपुरुष ने मानव को, चन्दन जैसा सुगन्धित शरीर और जीवनोपयोगी वस्तुऍं सर्वस्व देकर, उस से एक उम्मीद जताई हुई है कि, मानव हर पल पल, हर क्षण मेरा ही सिमरन करे, जिस का वर्णन गुरु रविदास जी महाराज ने, स्वामी ईशर दास जी महाराज के शब्दों में, गुरु आदि परगास ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 967 पर किया हुआ हैं:--
।। छंद आसा।।
ऐह तन मिलियो चानन वत। छार करीं ना पावक कत। अनल अबगुण लेत पछान। तन मन बुध जरे अनजान। चंबा फूल सोहणा पाण आया। जुआला माहे ना देईं जलाआ। सुरख अबला लाल बनायो। समझ सोच मन पग रखायो। तन मन धन अमोल जो मिलत। सतिगुर बिन गुआत जिलत। मानस जनम जे लाऊना लेखे। सभै वाक गुर के पेखे। सतिगुर सम दाता ना कोई। हलत पलत गुर बिन ना ढोई। रविदास पट चोला बनाना। करीं गुर दरजी सलाना।
गुरु रविदास जी महाराज, मानव को सचेत करते हुए फरमाते हैं कि, हे इंसान! केवल आप को ही चन्दन जैसा सुगन्धित शरीर आदपुरुष ने दिया हुआ है अर्थात ऐसा सुंदर सलोना, आकर्षक शरीर किसी भी प्राणी को नहीं मिला हुआ है। इसे काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार की अग्नि में राख मत कर देना, इन सभी अबगुणों को आग समझ कर पहचान लेना, ये तुझ को अनजान, अनभिज्ञ समझ कर, तेरे शरीर, मन और तेरी बुद्धि को जला देंगे। तूँ इस जीवन में चँबे के फूल जैसा सुंदर शरीर प्राप्त कर के आया हुआ है, कहीं इसे अबगुणों की आग में जला कर राख की ढेरी मत कर देना। हीरे, मोतियों, लालों की तरह, सुंदर, सलोनी, और कमनीय स्त्री को भी बनाया हुआ है, मन से सोच समझ कर, उस के दरबाजे पर कदम रखना, तुझे जो अमूल्य तन, मन और धन मिला हुआ है, उसे कहीं बिंना सोचे विचारे, जलालत में फंस कर बर्बाद मत लेना, अर्थात संसारिक मायाजाल में उलझ कर, अपने आप को अपमानित मत कर लेना। अगर मनुष्य जन्म सफलतापूर्वक जीना है तो, सारे काम गुरु के हुकम से ही करना। गुरु रविदास जी मानव को समझाते हुए फरमाते हैं कि, हे मानव! आद पुरूष के समान कोई दाता और दानी नहीं है। चारों पदार्थ केवल वही देता है, उस के बिना कहीं भी किसी के पास शरण भी नहीं मिलती है गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि हे मनुष्य! अगर तूँ कपड़े का सुंदर चोला बनवाना चाहता है, तो कोई श्रेष्ठ, सर्वगुण संपन्न दर्जी तलास करना, वही तेरे चोले को अच्छी तरह से सिलाई कर के तैयार कर सकता है अर्थात गुणवान, श्रेष्ठ गुरु ही आप को सन्मार्ग दिखा कर सुखी जीवन जीवन जीने का मंत्र बता सकता है, अच्छे गुरु के बिंना कहीं भी शरण नहीं मिलती है। सतगुरु के बिंना तूँ कुमार्ग में ही उलझा रहेगा और आठों अबगुणों में ही फंस कर रह जाएगा। गुरु रविदास जी महाराज, स्वामी ईशरदास जी के शब्दों में फरमाते हैं कि, हे मानव, इस शरीर रूपी चोले को सोहम रूपी रंग से रंग कर, किसी अच्छे सुघड़ सुजान दर्जी से सिलाना अन्यथा ये चन्दन जैसा कीमती और सुगन्धित चोला बर्बाद हो जाएगा।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
17 जनवरी,2021।
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