गुरु रविदास जी महाराज और सच के व्यापारी।

।।गुरु रविदास जी महाराज और सच के व्यापारी।।
गुरु रविदास जी महाराज, केवल सच के पुजारी हुए हैं, उन्होंने सँगत को सत्य के महत्व और उपयोगिता को समझा कर, खुद सच के मार्ग पर चलते हुए कर्म कर के, फल प्राप्त कर के आनंद सहित जीवन बिताने का उपदेश दिया है। गुरु जी ने स्वयं भी सत्य के मार्ग पर चल कर, कदम कदम पर सफलताएँ हासिल कीं थी, जिन के सामने सभी छली कपटी विद्रोही षडयंत्रकारी धराशायी हो गए थे, बड़े बड़े खूनी बादाशाहों की तलबारें बार करने में असमर्थ हो गईं थीं, बड़े बड़े षडयंत्रकारी ब्राह्मणों को मुंह की खानी पड़ी थी, मगर गुरु जी उन का सामना करते करते अवतार बनते गए। गुरु जी ने सच का ही सँगत को सन्देश दिया है, जिस के कारण आज भी मूलनिवासी सच से डर कर ही जीवन व्यतीत करते आए हैं। जितने भी महापुरुषों ने अवतार लिये हैं, इन्हीं सत्य के पुजारियों के घरों में लिए हैं, चाहे चँवरवंशी गुरु रविदास जी हों, कबीर कोली जी हों, गुरु आदिपरगास ग्रँथ के रचयिता स्वामी ईशर दास जी हों,साहिबे कलाम मंगू राम मुगोबाल जी हों, स्वामी अच्छूतानंद ही महाराज जी हों, डाक्टर भीम राव अंवेदकर हों, बाबू जगजीवन राम हों, चाहे वर्तमान वहुजन समाज के मसीहा साहिब कांशी राम जी हों, चाहे वर्तमान क्रान्तिनायक मेश्राम जी हों, गुजराती टायगर वी एल मातंग जी, जिन्होंने पांच हजार वर्षों के, लताड़े हुए, कंगाल किये हुए, भूमिहीन बंधुआ मजदूर बनाए हुए, मूल आदिवासियों के दिलों को झकझोड़ कर, खूनी क्रान्ति के लिए, अपना बलिदान देने के लिए, साहसी, निडर, क्रांतिकारी बना दिया है। गुरु जी ने सच का मार्ग बताते हुए ही, मजलूमों को क्रांतिपथ पर अग्रसर किया है, सत्य ही ऐसी ढाल है जिस पर किसी का कोई भी बार असर नहीं करता, किसी को कोई आंच नहीं आती है, इसीलिये गुरु रविदास जी महाराज, फरमाते हैं कि जिस ने सच को अपना, उस के लाभ उठा लिया, जिस ने सच को ठुकरा दिया, वह घाटे में ही रहा, वह धरती पे नारकीय जिंदगी जी कर ही मृत्य के घाट उतरा है। गुरु जी के इन्हीं भावों को, स्वामी ईशर दास जी महाराज, अलौकिक ही नहीं दिव्य, गुरु आदि परगास ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 969-970 पर, अपनी कलम से लिखते हैं कि:----
                ।।शब्द आसा।।
गोविंद वणज खरीद कर नुकसान किन्हें पा लिया। जिन्हें इह वणज कीता तिन्हें नफा उठा लिया। हीरे पन्ने मोती रतन लाल ते जवाहर जो। छिताली रतन ते इह अधक नाम वणज करा लिआ। कंचन हिरन कस्तूरी मुस्कन्झ जोहर करा लिआ। त्रिलोकी राज चक्रवर्ती नाम तुलना तुला लिआ। इंद्र विशन ब्रह्मा किशन चौदह लोक के शहशनशाह सोहम नाम के सम को लखा जाप जपा लिआ। वेद ते कतेब गन पगंबर अवतार जो। रविदास करन पुकार नाम जोई जहां जो आ लिआ।
गुरु रविदास जी महाराज, आदपुरुष के नाम की महत्ता को समझाते हुए फरमाते हैं कि, गोविंद नामक सामान खरीद कर, ऐसा कौन सा मूर्ख व्यापारी जिस ने हानि उठाई है ? गुरु जी बताते हैं कि, जिन्होंने ये व्यापार किया है, उन्होंने ही लाभ उठाया है। जितने भी हीरे, रत्न, मोती, पन्ने, जवाहरात, छयालीस रत्न हैं, उन से भी अधिक बहुमूल्य, वेशकीमती प्रभु के नाम का व्यापार हैं, जिस ने ये व्यापार कर लिया उस का बेड़ा पार हो जाता है अर्थात उस का कल्याण हो जाता है। जिन्होंने कंचन के समान सुगन्धित हिरन की कस्तूरी का दर्शन कर लिया हो, अपने प्राणों को खुद ही त्याग कर जौहर कर लिया हो, उन्होंनें ही तीनों लोकों का चक्रवर्ती राजा बन कर, चक्रवर्ती राजा की तुलना करवा कर, खुद को तुलबा लिया है। इंद्र, ब्रह्मा, विष्णु, शिव और कृष्ण जैसे चौदह तबकों के शहंशाह भी सोहम शब्द के समान दिखाई नहीं दिए, जिस ने अपना नाम जपा लिया हो। अंततः इन लोगों ने आदि पुरुख का नाम ही जपा और जपाया। जितने भी पीर, पैगंबर और अवतारों का वेदों और पुराणों में वर्णन किया गया है, जो जो धरती पर जन्म लेकर आ गया है, वे सभी केवल आदपुरुष को ही पुकारते है।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, चाहे कोई भी, देवी, देवता बन कर, धरती पर आया है, उसे आदपुरुष को ही अपनाना पड़ा है, आदपुरुष के नाम का चिंतन करना पड़ा है, उन सब को परम पिता परमेश्वर के समक्ष नतमस्तक होना ही पड़ा। 
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आददधर्म मंडल।
21 जनवरी, 2021।

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