Posts

Showing posts from May, 2023

सतगुरु कबीर साहिब की समाधि मनुवाद की शिकार।।

सतगुरु कबीर साहिब की समाधि मनुवाद की शिकार।। यदि कांशी में निर्गुण भक्ति की धारा प्रवाहित हुई है और यहीं इस के स्रोत का जन्म हुआ है, तो इस कथन में कोई भी अतिशयोक्ति नहीं हैं क्योंकि इसी पवित्र धरती पर ही गुरुओं के गुरु रविदास जी महाराज ने जन्म ले कर सगुण भक्ति के उपासकों की नींद हराम की थी, उन के साथ ही सतगुरु कबीर साहिब ने भी उन्हीं के पदचिंहों पर चल कर, उन की विचारधारा का अनुसरण करते हुए सगुण धारा के अडंबरों, पाखण्डों, ढोंगों और अत्याचारों का भांडाफोड़ किया था जिस की कीमत कबीर जी को शारीरिक और मानसिक अत्याचार सहन कर के चुकानी पड़ी थी। फक्कड़ कबीर साहिब:--- सतगुरु कबीर साहिब ने कभी भी अपने शरीर की चिंता नहीं, कभी भी शासक वर्ग की तलवारों का खौफ नहीं खाया और अपनी पैनी कलम की धार से मनुवादी और इस्लामिक ढोंगों का कतल करते ही गए। कबीर जी अपनी निर्भीकता और अखड़ता को उजागर करते हुए फरमाते हैं ----- कबीरा खड़ा बाजार में लिए मुराड़ा हाथ। जो घर जारै आपना चलै हमारे साथ। कबीर जी अपनी क्रांतिकारी और अग्नि पथ पर चलने वाली तीखी धार का वर्णन करते कि कबीर कातिलों से भरे हुए बाजार में खड़ा हो कर ...

महामना सतगुरु कबीर जी का कांशी मठ।।

महामना कबीर जी महाराज का उपेक्षित मठ।। मनुवादी तिलकधारी खुद तो अंधेरे में ही जीवन जीते हैं मगर अगर कोई प्रकाश करे भी तो इन को वह प्रकाश और प्रकाश करने वाला मूलनिवासी सूर्य भी पसंद नहीं आता है। सतगुरु कबीर ने मनुवादी धृतराज व्यवस्था को मानवीय आधार पर चलाने के लिए तर्कहीन सिद्धांतों का खंडन किया था, जिसके कारण वे हिंदुओं की आँख का तिनका बने हुए हैं, इसी कारण उन का अपमान किया जा रहा है, जिस का सबूत कांशी कबीर मठ है। दर्शनशास्त्र के अध्येता कबीर साहिब:-- - अगर समूचे विश्व में बिहंगम दृष्टि डाली जाए तो कहीं भी कोई भी ऐसा मनुवादी विद्वान, दर्शन शास्त्र का अध्येता नहीं हुआ है, जो क्रांतिकारी कबीर साहब के तुल्य चिंतक, विचारशील, विवेकशील साधक और विचारक हुआ हो। कबीर साहिब का साहित्य उन के दर्शन को प्रदर्शित करता है। उन के लिखे दोहे और शब्दों को गा गा कर के खानाबदोश भी अमीर हो गए हैं। उन के दोहों और शब्दों के एक-एक शब्द में जो सार छुपा हुआ है, उस का वर्णन करना किसी भी दर्शनाचार्य के वश का नहीं है। कबीर साहब फरमाते हैं, कि----- जल में कुंभ है कुंभ में जल बाहर भीतर पानी। फूटा कुंभ जल जलहिं समान...

क्रांतिकारी शूरवीर गुरु रविदास जी महाराज।।

क्रांतिकारी शूरवीर गुरु रविदास जी महाराज!! चौहदबीं, पंद्रहबीं शताब्दी में भारत के जनता राजाओं, बादशाहों की तलवारों की खनखनाहटों, तोपों के बिस्फोटों के साए में जी रही थी। विदेशी मुस्लिम बादशाहों के दिलों में लोगों के प्रति कोई दया, दर्द नहीं होता था। भारत के राजपूत राजा भी विलासिता के समंदर में डूब कर आनंदपरस्ती करते हुए जिंदा रहने का यत्न कर रहे थे, जनता जाए भाड़ में। ऐसी परिस्थितियों में जब भारत की जनता की शुद्ध लेना वाला कोई भी मनुवादी नहीं बचा, तब जनता की सुरक्षा का दायित्व केवल गुरु रविदास जी महाराज ने निभाया था। तभी तो स्वामी ईशर दास जी महाराज ने गुरु आदि प्रगास ग्रंथ में फरमाया है कि--- रविदास सोई शूर भला जउ लरै धरम कै हेत। अंग अंग काटि भूइं गिरै तउ वी ना छांडे खेत। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि वही शूरवीर अच्छा होता है, जो धर्म की रक्षा के लिए लड़ता है। चाहे उस के शरीर के अंग अंग कट कट कर धरती पर गिर जाएं, वह शूरवीर तब भी रणक्षेत्र को नहीं छोड़ता है,  जो व्यक्ति मानवता की रक्षा के लिए, अपने धर्म का निर्वहन करता है, जो अपने प्राणों की बाजी लगा कर के रणभूमि के यज्ञ ...

मैं+दागिन=मैदागिन चौक कांशी।।

मैं+दागिन=मैंदागिन मुझ को दाग (कलंक) लग गया। मैदागिन चौक कांशी शहर !! गुरु की नगरी कांशी:--- गुरु रविदास जी महाराज के प्रकाश की पवित्र भूमि कांशी नगरी है, जिसे गुरु की नगरी कहा जाए तो बिल्कुल तर्क संगत और सत्य होगा। सारे कांशी शहर का कोना कोना गुरु जी के इतिहास का हिस्सा है, जिसे मिटाने के लिए मनुवादी चापलूसों, चारणों, भाटों, साहित्यकारों, कवियों और लेखकों ने कई कुतर्कपूर्ण किस्से, कथाएँ, कहानियाँ घड़ी हुई हैं, जिन का वास्तविकता से दूर तक कोई सम्बन्ध और रिश्ता नहीं है। गुरु रविदास जी महाराज के दर्शन करने के लिए सारे संसार के शासक, बादशाह और सतपुरुष कांशी नगरी में आते थे, जिस के बारे में कांशी की धरती खुद बोलती है। गुरु रविदास से मीराबाई का साक्षात्कार:--- चितौड़गढ़ की रानी मीराबाई पति विहीन होने पर मानसिक रूप से विक्षिप्त हो कर दुखी रह रही थी, जब उस को गुरु रविदास जी के बारे में ज्ञात हुआ था, तब वह उन के दर्शन करने के लिए पवित्र नगरी कांशी आई थी और जिस पवित्र स्थान पर उस ने गुरु रविदास जी महाराज के दर्शन किये थे, उस स्थान के भाग्य खुल गए थे, इसी कारण ये जगह भी ऐतिहासिक बन कर इतिहा...

गुरु रविदास जी का लोप स्थान गढ़ाघाट उर्फ गढवा घाट।।

गुरु रविदास जी का लोप स्थान गढ़ाघाट उर्फ गढ़बाघाट !!! १६ फरवरी २०२३ को कांशी स्थित गढ़वाघाट के दर्शन करने का सुअवसर प्राप्त हुआ, जिस की चकाचौंध को देख कर के आंखें भी चुंधिया हो गई, मन में हैरानी हो रही थी कि इतना अपार धन-दौलत संचित करके गढ़वाघाट में भवनों का निर्माण किया गया है। अति सुंदर मोरियां, मेहराबें, अट्टालिकाएँ, चित्रकारी, नक्काशी कार्य और अत्यंत मनमोहक ढंग से उत्कीर्ण किए गए दरवाजे भवन को चार चाँद लगा रहे हैं, जिस के पीछे एक बहुत बड़ा राज छुपाया गया है। परिसर:--- कम से कम दो हजार वर्ग मीटर में गढ़वाघाट भवन का निर्माण किया गया है, जिस की दीर्घ मीनार, गगनचुंबी गुंबद, असंख्य कमरे और सुसज्जित प्रांगण देखते ही बनते हैं। सारा प्रांगण मैटलड किया हुआ है, ऐसा लगता है कि धरती के ऊपर स्वर्ग का उतारा गया है। अरबों रुपए पानी की तरह बहा कर के इस अति अद्वितीय और आलीशान भवन का निर्माण किया गया है। ऐतिहासिक वृद्ध वृक्ष:--- लगता है कि जिस समय इस परिसर का नाम गढ़ाघाट से गढ़वाघाट किया गया है, तभी वहाँ वृक्षारोपण किया गया था, जिस के प्रमाण वहाँ पर उपस्थित वृद्ध वृक्ष गुरु रविदास जी महाराज के इ...

गुरु रविदास आदद्दुआरा **सीर गोवर्धन** कांशी!

गुरु रविदास आददुआरा **श्री सीरगोवर्धन** कांशी।। गाँव नैपुरा से दो किलोमीटर की दूरी पर गाँव सीरगोवर्धन हैं, जो गुरु जी के इतिहास का प्रमाण प्रतीत होता है, क्योंकि इसी स्थान पर चँवरवंश के वंशज आज भी निवास करते हैं, जो आज भी वहीं नारकीय जीवन जी रहे हैं। गुरु रविदास चौक से जाने वाली सड़क से गुजरते समय सब से पहले सीर गोवर्धन स्थल आता है, उस के पांच सौ मीटर की दूरी पर लौटूं वीर मंदिर से हो कर गढ़वाघाट उर्फ गढ़ाघाट आते हैं, इन तीनों ही स्थानों का गुरु रविदास जी महाराज के जीवन और इतिहास से आत्मिक संबंध ज्ञात हो रहा है। सीर गोवर्धनपुर का अवलोकन:--- सीर गोवर्धन की स्थिति ठीक वैसी ही है, जैसी आर्यों ने भारत के मूलनिवासियों की उस समय बनाई थी, जब उन्होंने भारत को अपना गुलाम बनाया था। आर्यों ने चँवरवंश के लड़ाकों को दण्ड स्वरूप ऐसे निर्जन स्थलों पर वसाया था जहाँ नर्क ही नर्क, नदी-नाले, गन्दगी के ढेर और मुशीबतों के फंदे लगे हुए होते थे, जिन को आज भी गाँव सीर गोवर्धन में देखा जा सकता है। सीरगोवर्धन नामकरण :--- चँवर राज वंश उर्फ चमार वंश की नगरी सीर गोवर्धन का नामकरण शंकाओं के घेरे में घिरा हुआ लगत...

गुरु की नगरी कांशी में *गुरु रविदास सदना* इतिहास।।

गुरु की नगरी कांशी में * गुरु रविदास-सदना* इतिहास!! जब से युरेशयन आर्यों ने भारत की देवभूमि पर अपना अधिप्तय जमाया हुआ है, तभी से इस पवित्र भूमि को ग्रहण लगा हुआ है। आदि पुरुष से चली आ रही मूलभारत की सभ्यता, संस्कृति और इतिहास का नामोनिशान मिटाया जा रहा है, जिस की घृणित कड़ी में गुरु की नगरी कांशी और गुरु रविदास जी महाराज के इतिहास को नेश्तनाबूद किया जा रहा है। जो कुछ बाकी बचा हुआ है उस को भी नये नामकरण कर के बदला जा रहा है। सिंकदर लोधी को जब पता चला था कि कांशी में कोई साधु, संत, फकीर, तिलकधारी ब्राह्मणों के ज्ञान की हवा निकाल कर, उनके झूठे अडंबरों, पाखण्डों का पर्दाफ़ास कर रहे हैं, जिस से आकर्षित हो कर उसने गुरु रविदास जी महाराज की दिव्य शक्ति का लाभ उठाने के लिए योजना बनाई थी, जिस का सूत्रधार सदना कसाई को बनाया गया और उसे अपना राजदूत बना कर, गुरु रविदास महाराज के पास भेज कर इस्लाम धर्म में शामिल करने के लिए रजामंद करने का प्रयास किया था। कांशी में सदना कसाई:--- बादशाह सिकंदर लोधी ने, सदना कसाई को बड़े विशाल लाव-लश्कर के साथ, रथ पर सवार कर के कांशी भेजा था। उन दिनों गुरु रविदास जी म...

गुरु रविदास गोष्ठी स्थल उर्फ विश्व काशीनाथ धाम।।

गुरु रविदास गोष्ठी स्थल उर्फ विश्व काशीनाथ (विश्वधाम) ।। सोलह फरवरी को गुरु रविदास नगरी कांशी में कांशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मेरे साथ सीर गोवर्धन के निवासी संत राजेश कुमार जी विश्व काशीनाथ धाम के दर्शन करने में सहयोग कर रहे थे। हम ने बीएचयू तोरण द्वार से टेंपो लिया और विश्वनाथ मंदिर के लिए रवाना हुए, इसी बीच पीछे से आ रहे एक टेंपों से एक सवारी जोर से बोली और हमारी ओर संकेत कर के कहनी लगी, कि आप का मोबाईल फोन गिर गया है। राजेश ने जेब टटोलते हुए कहा हैं, मेरा फोन गिर गया है। वे तुरंत टैन्पू से उतरे और दौड़ कर पीछे गए तो सड़क पर गिरा हुआ फोन उठा लाये। मैं इस घटना से प्रभावित हुआ कि कांशी नगरी में गुरु रविदास जी महाराज की दैवी शक्ति का प्रभाव अभी मौजूद है अगर ना होता तो कोई इतनी भीड़ मैं क्यों हमें बताता, वह स्वयं ही उठा कर ले जाता। हमारा टैंपो तीव्र गति से दौड़ता हुआ अपने गन्तव्य के लिए जा रहा था। घनी भीड़ को चीरता हुआ, कच्ची सड़क की ऊबड़-खाबड़ मिट्टी के ढेलों से हिचकोले खाते हुए हम मुख्य सड़क से मिलकर कांशी विश्वनाथ मंदिर पहुंचे। कांशी विश्वनाथ मंदिर:--- ...

कांशी लौटूवीर mndir गुरु रविदास जी।।

कांशी लौटूवीर मंदिर गुरु रविदास जी।। गुरु रविदास जी महाराज जन्म से ही मनुवादी व्यवस्था को ध्वस्त करने लग पड़े थे। आठ साल की आयु में धोती, तिलक लगा कर जब अद्वितीय ध्वनि निकाल कर शंख बजाया था, तब उस ध्वनि को सुन कर पोंगा पण्डितों, तिलकधारियों और ढोंगी पुजारियों की नींद हराम हो गई थी, चारों और सुगबुगाहट शुरू हो गई थी, कि अब ब्राह्मणों का ठग मंत्र मौत की ओर जाने वाला है। जो तीनों वर्णों को मूर्ख बना कर खुद देवता, और भगवान बन कर मौज मस्ती करते हुए निठठले बैठ कर पेट भर कर ऐश्वर्याशाली जीवन जीते थे। गुरु रविदास जी की धार्मिक क्रांति के कारण मनुवादी छल कपट समाप्त होने जाने रहा है। ब्राह्मण कुछ दिन सबर का घूँट पीते रहे:--- - गुरु रविदास जी महाराज प्रतिदिन सुवह उठ कर मंजन और स्नान करते, धोती, तिलक लगा कर आदि पुरुष का ध्यान लगा कर * सोहम * शब्द का जाप करते और अंत में शंख बजाने का ढोंग करते ताकि ब्राह्मणों के किलों में आग लगा कर पाखंडों, आडंबरों को भष्म किया जा सके, गुरु जी की कयामत से भयभीत ब्राह्मण आग बबूले हो रहे थे मगर कर कुछ नहीं पा रहे थे, फिर भी वे कुछ दिनो तक सबर के घूँट पीते रहे ताकि बा...

गुरु रविदास जी का इतिहास और मनुवादी षड्यंत्र।।

गुरु रविदास जी महाराज का इतिहास और मनुवादी षड्यंत्र।। गुरु रविदास जी महाराज और सदना कसाई की गोष्ठी स्थल के दर्शन करने के लिए एक तंग गली से गुजरना पड़ता है मगर हम जैसे तैसे वहाँ पहुँचे तो कुछ स्मृतियों के सिवाए वहाँ कुछ नहीं मिला। हम ने सोचा था कि वहां गुरु रविदास जी महाराज और, सदना जी की स्मृति में मूर्तियां स्थापित की गई होंगी, गोष्टी स्थल पर गुरु रविदास जी महाराज और सदना जी के आसन सुशोभित हो रहे होंगे मगर वहां तो केवल कुछ मीटर खाली जगह ही यह बता रही थी, कि कभी यहां गुरु रविदास जी महाराज और भगत सदना कसाई ने शास्त्रार्थ करने के लिए गोष्टी की थी। ठीक इस से संलग्न विशाल विश्व काशी नाथ मन्दिर का निर्माण कर के तेती करोड़ देवी देवताओं की विचित्र मूर्तियों को स्थापित कर के मनुवादी शासन प्रशासन ने दोनों क्रांतिकारियों का इतिहास गंगा नदी में डुबो रखा है। मनुवादी षडयंत्र:- --- दन्त कथाओं, जन श्रुतियों, ऐतिहासिक प्रमाणों और क्यासों से ज्ञात होता है, कि गुरु रविदास जी महाराज के पंच तत्वों में विलीन होते ही मनुवादियों ने गुरु जी के इतिहास को नेस्तनाबूद कर दिया था, उन के साहित्य को ढूंढ ढूंढ कर ज...

गुरु रविदास जी की जन्म स्थली मांडबडिह।।

    गुरु रविदास जी की जन्म स्थली मांडव डिह ।। गुरु रविदास जी महाराज का जन्म एक सुसंपन्न परिवार में हुआ था। आदिकाल से चली आ रही वंश रंपरा नके अंत में गुरु रविदास जी महाराज ने चँवरवंश के राजपरिवार के तत्कालीन सुप्रसिद्ध व्यापारी कालूदास के पुत्र संतोषदास के घर मे अवतार लिया था। स्वामी ईशरदास महाराज गुरु आदि प्रकाश ग्रंथ में फरमाते हैं, कि कालूदास जी कपड़े और चमड़े के उरद्योग के वहुत बड़े उच्च कोटी के व्यापारी थे, उन के प्रोडक्ट विश्व के देशों में निर्यात किये जाते थे, चमड़े के ओवर कोट, जैक्ट, बैलट, मस्कें, वच्चों के खिलौने, हाथी, शेर, नेवले आदि उन के कारखानों में बनते थे, ऐसे संपन्न जस्सल गोत्र में गुरु रविदास जी महाराज ने जन्म ले कर जीवनयापन किया था। सम्मत 1433 तक तीनों वर्णो की दशा:--- गुरु रविदास जी के अवतार तक, वर्ण व्यवस्था ने तीनों वर्णों को ब्राह्मणों को गुलाम बना कर रखा हुआ था। मनुस्मृति नामक काला संविधान पूरी तरह कढ़ाई के साथ लागू था, राजपूत केवल दुश्मन के साथ लड़ते-लड़ते मर सकता था, परंतु पढ़-लिख नहीं सकता था ताकि कहीं पढ़-लिख कर के राजपूत लोग समझदार ना हो सकें, इसल...

क्रांतिकारी शूरवीर गुरु रविदास जी महाराज।

क्रांतिकारी शूरवीर गुरु रविदास जी महाराज!! वह भी समय था, जब भारत के मूलनिवासियों को, पढ़ने लिखने बोलने और सत्संग सुनने का अधिकार नहीं था। केवल वासी रूखा सूखा खा कर मनुवादियों की चाकरी करना ही अधिकार था, जिस के सिवाए यदि कुछ मांग की गई तो केवल सजाए ए मौत ही थी! यहाँ तक कि मनुवादी अमीरों ने अपनी ही जेलें बना रखी थी ताकि राजाओं की जेलों की जरूरत ही ना पड़े। मरे हुए मनुवादियों को कई कई कोस कन्धे पर उठा कर मूलनिवासी गुलामों को मनुवादियों के मुर्दे के उन के घर पहुँचाना पड़ते थे, यदि गुलाम नर मूलनिवासी घर पर ना हों तो उसी के परिवार की मासूम कन्याओं, वच्चियों, वहुओं, स्त्रियों को मुर्दा कन्धों पर ढोना पड़ता था। ऐसे गुलामों के गुलामों को स्वतंत्र करवाने के लिए सब से पहले केवल गुरु रविदास जी महाराज ने कांशी से मानवताबादी आंदोलन शुरू किया था। जहाँ नृशंश मनुवादियों ने मूलनिवासी राजा हरिश्चंद्र को अनेकों यातनाएं दे कर दुखों में डाल रखा था मगर वह तिलकधारियों से मुकाबला नहीं कर सका था। ब्राह्मणों के शाप और षड्यंत्रों का शिकार बन कर अपना राजपाठ, परिवार तक खो बैठा था। गुरु रविदास जी महाराज ने इन्हीं र...

क्रांतिकारी गुरु रविदास जी महाराज और शूरवीर का दायित्व।।

क्रांतिकारी गुरु रविदास जी और शूरवीर का दायित्व!! !! विक्रमी संवत 1433 तक भारत के सारे इतिहास की पड़ताल की जाए तो भारत के पचासी प्रतिशत मूलनिवासियों का कोई भी ऐसा क्रांतिकारी समाज सुधारक, राजनेता, धार्मिक नेता दिखाई नहीं देता है, जिस ने यूरेशियन लोगों द्वारा गुलाम बनाए गए, भारत के मूलनिवासियों की दुर्दशा को ध्यान में रखते हुए उन के कल्याण के लिए, उन की आजादी और मान-सम्मान के लिए कोई शांतिपूर्ण या क्रांतिकारी आंदोलन शुरू किया हो, ऐसे वीर योद्धाओं की कमी के कारण इस समय तक यूरेशियन आर्य भारत के मूलनिवासियों के साथ अति क्रूरता और हैवानियत की सारी सीमाओं को तोड़ते आ रहे थे। शोषण का दस्तावेज मनुस्मृति:---- जब से युरेशियन आर्यों ने भारत के मूलनिवासियों को छल बल से गुलाम बनाया था, उसी समय से मनुस्मृति जैसा काला संविधान बना कर लागू किया गया था, जिस के अनुसार  मूलनिवासी लोगों का शोषण करने के लिए व्यवसायों का वितरण किया गया था, जिस काम को ये लोग करते थे, उसी को ध्यान में रख कर उस की जाति का नाम भी रखा गया था, जैसे लोहे का व्यवसाय करने वाले को लुहार, लकड़ी का का करने वाले को बढ़ई, कपड़े धोन...

17मई।। गुरु रविदास जी महाराज का क्रांतिकारी आंदोलन।।

यूरेशिया से आए काफिर घुसपैठियों ने छलबल से आदिकाल से चले आ रहे आदिवंश के सम्राट शिव और गौरां का कतल कर के मूलनिवासियों को अपना गुलाम बना लिया था, जिनको स्वतंत्र करवाने के लिए गुरु रविदास जी महाराज ने शांति और खूनी महाक्रांति का सहारा ले कर ऐतिहासिक सामाजिक आंदोलन शुरू किया था, जिस का नेतृत्व गुरु जी के वीर चँवरवंशज उर्फ चमार वंशज आज भी कर रहे हैं। गुरु रविदास जी ने राजपूतों को मनुस्मृति से आजाद करवाया। । विश्व के इतिहास को अगर टोटला जाए तो कहीं पर भी मनुस्मृति के खिलाफ कोई आंदोलन नहीं हुआ था, किसी भी देश में मनुस्मृति के विरोध में कोई संगठन तैयार नहीं हुआ था, कोई भी ऐसा महापुरुष दिखाई नहीं देता है, जिसने मनुस्मृति के काले कानूनों को निरस्त करने के लिए विद्रोह् किया हो। मुहम्मद बिन कासिम ने भी भारत में घुस कर मनुस्मृति के अनुसार ही शासन चलाया था मगर मनुस्मृति के खिलाफ तनिक भी कोई काम नहीं किया, उस के बाद केवल गुरु रविदास जी महाराज ने राक्षसी संविधान के खिलाफ जन आंदोलन शुरू किया था, जिस के अनुसार ही डचों, हूणों, फ्रैंचों और अंग्रेजों ने भी शासन करना शुरू किया मगर वे भी केवल अपने स्वार...

गुरु रविदास जी क्रांतिकारी हुए, ना कि साधु, संत, फकीर!

गुरु रविदास जी क्रांतिकारी हुए ना कि साधु, संत, फकीर! मात्थे तिलक हथ जपमाला जग ठगने कु सुआङ बनाया। मारग छाडि कुमारग गहि कै साँची प्रीत बिनु राम ना पाया। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि जो लोग दिखावे की भक्ति कर के भगवान के दर्शन करने के नाम पर भोलीभाली संगत को ठगने के लिए धोती, तिलक, शँख, माला हाथ में ले कर कई प्रकार के ड्रामें करते हैं, सन्मार्ग को छोड़ कर कुमार्ग पर चल कर कभी भी राम से सच्चा प्यार नहीं करते हैं, जिस से उन ढोंगी, पाखण्डी लोगों को निरंकार, निराकार, अदृश्य राम कभी नहीं मिलता है। जो लोग जनता के ऊपर बोझ बन कर अर्थात परजीवी बन कर जीवन जीते आ रहे हैं, उन्हीं लोगोँ ने मूलनिवासी गुरुओं को भी अपनी तरह के साधु-संत, फकीर सिद्ध कर रखा है। खुद तो ये लोग हाथ में खप्पर ले कर भिखारी बन कर भिक्षाटन कर के गुजारा करते आ रहे हैं। ये ढोंगी लोग, स्वाभिमानी मूलनिवासी गुरुओं को इस जन्म के भिखारी तो सिद्ध नहीं कर सके मगर पिछले जन्म के भिखारी लिख डाला है। खुद तो नीच बन कर इतिहास के पन्नों में अपमानित हुए ही हैं मगर मूलनिवासी महापुरुषों को भी भीख मांगते हुए दर्शा कर उन के मात्थे पर कालि...