क्रांतिकारी शूरवीर गुरु रविदास जी महाराज।
क्रांतिकारी शूरवीर गुरु रविदास जी महाराज!!
वह भी समय था, जब भारत के मूलनिवासियों को, पढ़ने लिखने बोलने और सत्संग सुनने का अधिकार नहीं था। केवल वासी रूखा सूखा खा कर मनुवादियों की चाकरी करना ही अधिकार था, जिस के सिवाए यदि कुछ मांग की गई तो केवल सजाए ए मौत ही थी! यहाँ तक कि मनुवादी अमीरों ने अपनी ही जेलें बना रखी थी ताकि राजाओं की जेलों की जरूरत ही ना पड़े। मरे हुए मनुवादियों को कई कई कोस कन्धे पर उठा कर मूलनिवासी गुलामों को मनुवादियों के मुर्दे के उन के घर पहुँचाना पड़ते थे, यदि गुलाम नर मूलनिवासी घर पर ना हों तो उसी के परिवार की मासूम कन्याओं, वच्चियों, वहुओं, स्त्रियों को मुर्दा कन्धों पर ढोना पड़ता था। ऐसे गुलामों के गुलामों को स्वतंत्र करवाने के लिए सब से पहले केवल गुरु रविदास जी महाराज ने कांशी से मानवताबादी आंदोलन शुरू किया था। जहाँ नृशंश मनुवादियों ने मूलनिवासी राजा हरिश्चंद्र को अनेकों यातनाएं दे कर दुखों में डाल रखा था मगर वह तिलकधारियों से मुकाबला नहीं कर सका था। ब्राह्मणों के शाप और षड्यंत्रों का शिकार बन कर अपना राजपाठ, परिवार तक खो बैठा था। गुरु रविदास जी महाराज ने इन्हीं राक्षसी वृत्ति वाले लोगों को लाईन पर लाने के लिए, इसी धरती पर अवतरित हो कर अपनी क्रांतिकारी योजनाएं बनाना शुरू की थी, जिस के अनुसार वे आजीवन क्रांति पथ पर चलते रहे। गुरु आदि प्रगास ग्रंथ में स्वामी ईशर दास जी महाराज ने गुरु रविदास जी महाराज की वीरता का वर्णन अपने शब्दों में करते हुए फरमाया है कि-----
निज मुए तउ मुकत है दल काटे तां वी मोख।
सुन रविदास सो सूरमा लागे काहू ना दोख।।१।।
गुरु रविदास जी का मूर्खों को संदेश:--- जो लोग आदि पुरुष के बनाए प्राणियों के साथ अमानुषिक व्यवहार किया करते थे, निरीह मूलनिवासी लोगों की बलि अपने खून के प्यासे देवी और देवताओं को देते थे, पुलों आदि के नीचे जिंदा दबा दिया करते अपनी ही जिंदा विधवा वहु-बेटियों को जला दिया करते थे। कुत्ते को अपने साथ सुलाते थे मगर मूलनिवासी लोगों के छूने से करंट खाते थे, उन की सुरक्षा और सहात्यार्थ गुरु रविदास जी महाराज ने देखने के लिए तो शांति पूर्वक आंदोलन शुरू किया था मगर था खूनी क्रांतिकारी आंदोलन। अपने इस अद्वतीय आंदोलन से गुमराह और पथभ्रष्ट मनुवादी लोग लाईन पर ला कर, इन को अच्छे इंसान बना कर इंसानोँ के साथ इंसानोँ का बर्ताव करने का प्रयास किया मगर ये खूंखार लोग नहीं समझे, फिर गुरु रविदास जी को थोड़ा और उग्र रूप धारण करना पड़ा और कायर बन चुके मूलनिवासी लोगों को समझाया कि, कायरो क्रांति करो, यदि आप अत्याचारी को मारोगे तो स्वतन्त्र हो जाओगे, अत्याचारियों का कतल करोगे तो भी मुक्ति मिलेगी और कोई भी दोष नहीं लगेगा। खुद मारे जाओगे तो भी शहीद कहलाओगे। जब इस आदेश से भी कायर और अत्याचारी नहीं समझे तो फिर अप्रत्यक्ष तौर पर मूलनिवासी गुलामों को कुछ और उग्र रूप धारण करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि----
सतिसंगत मिलि रहियों माधो, जस मधुप मखीरा।
गुरु जी फरमाते हैं कि, हे शोषितो! जिस तरह मधुमक्खियां आपस में एकता बना कर, मिलजुल कर रहती हैं, वैसे ही आप भी मधु मक्खियों की तरह रहो, यदि कोई मधुमक्खियों से उन की हक हलाल की गाढ़ी कमाई शहद को मांग ले, तो वे खुशी खुशी अपने पेट पर पत्थर रख कर भिखारी को अपना इकठ्ठा किया हुआ शहद दे देती हैं, जिस का वे तनिक भी बुरा नहीं मनाती मगर यदि कोई दुष्ट उन के छ्ते को बर्बाद मारने की कुचेष्टा करे, पत्थर मारने की हिमाक्त करता है, तो फिर वे निर्दयी हो जाती हैं और दुश्मन का खून पी जाती है, इस प्रकार वे खुद भी शहीद हो जाती हैं और दुश्मन को भी सजाए ए मौत देदेती हैं।
मधुमक्खियों से क्रांतिकारी बनना सीखो:--- गुरु रविदास जी महाराज मधुमक्खियों के शास्वत सत्य का दृष्टांत देते हुए कठोर हिरदे से फरमाते हैं कि हे शोषितो! तुम भी मधुमक्खियों की तरह ही क्रांतिकारी बन कर जीना सीखो और उन की तरह ही दुश्मन का खून पीना सीखो, तभी अत्याचारी, अत्याचार और बलात्कार करना बन्द करेगा।
जब गुरु जी की बात गुलामों ने नहीं समझी तो फिर उन्होंने सीधे शब्दों में गुलाम मूलनिवासी लोगों को समझाया और कहा कि हे गुलामों! यदि दुश्मन बाज नहीं आता है, तो उस को सबक सिखाने के लिए डट कर युद्ध करो।
युद्ध करने पर मोक्ष मिलता है:--- गुरु रविदास जी महाराज ईमान और धर्म से युद्ध लड़ने के लाभों पर विचार व्यक्त करते हुए फरमाते हैं कि सत्य के लिए युद्ध करते समय यदि शहीद भी हो जाएं तो वे शूरवीर अमर हो जाते है और शारीरिक बंधन से मुक्त हो जाते हैं, यदि लड़ते-लड़ते अधर्मी शत्रु की सेना के समूह का कत्लेआम कर देते हो, तब भी कोई पाप नहीं लगता है, अपितु मोक्ष ही प्राप्त होता है अर्थात दोनों तरफ से भी कोई किसी किस्म की हानि नहीं होती है। जो योद्धा निधड़क हो कर अपना कर्तव्य ईमानदारी, लगन, निष्ठा से करता है, दुश्मन की सेनाओं को मार कर ढेर कर देता है, वे इतिहास में जिंदा रहते हैं, उन के क्रांति पथ पर चल कर ही चमार रेजिमेंट ने विश्व समर में दुश्मन का अंधाधुंध कत्लेआम कर के परमवीर चक्र प्राप्त कर और बिक्टोरिया क्ररास जीत कर इतिहास रचा था। मूलनिवासी महाड़ रेजिमेंट के तेईस शूरवीरों ने पेशबा की सेना के अठाईस हजार सैनिकों को समरभूमि में कतल कर दिया था। जो कर्तव्य का पालन कर के समर जीतते हैं, उन्हीं को शूरमा कहते हैं, ऐसे कर्मवीर को किसी भी प्रकार का कोई दोष, पाप नहीं लगता है।
आज फिर मनुवादी सरकारें पुराने इतिहास को दोहराती जा रही हैं, मूलनिवासी समाज को स्कूलों में नाम मात्र के लिए पढ़ा रही हैं, फिर मजदूर बना कर मजदूरी करवाई जा रही है। अंग्रेजों ने जो मौलिक अधिकार दिये थे, वे भी सभी खत्म किये जा रहे है, इसीलिए आज गुरु जी के आह्वान पर क्रांतिकारी कदम उठाना ही होगा, अन्याय, अत्याचार के विरुद्ध धर्म युद्ध लड़ना ही होगा तभी सभी जातियों, धर्मों, वर्णों के गरीब लोग सुखी हो सकेंगे।
.रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदि धर्म मंडल।
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