महामना सतगुरु कबीर जी का कांशी मठ।।
महामना कबीर जी महाराज का उपेक्षित मठ।।
मनुवादी तिलकधारी खुद तो अंधेरे में ही जीवन जीते हैं मगर अगर कोई प्रकाश करे भी तो इन को वह प्रकाश और प्रकाश करने वाला मूलनिवासी सूर्य भी पसंद नहीं आता है। सतगुरु कबीर ने मनुवादी धृतराज व्यवस्था को मानवीय आधार पर चलाने के लिए तर्कहीन सिद्धांतों का खंडन किया था, जिसके कारण वे हिंदुओं की आँख का तिनका बने हुए हैं, इसी कारण उन का अपमान किया जा रहा है, जिस का सबूत कांशी कबीर मठ है।
दर्शनशास्त्र के अध्येता कबीर साहिब:--- अगर समूचे विश्व में बिहंगम दृष्टि डाली जाए तो कहीं भी कोई भी ऐसा मनुवादी विद्वान, दर्शन शास्त्र का अध्येता नहीं हुआ है, जो क्रांतिकारी कबीर साहब के तुल्य चिंतक, विचारशील, विवेकशील साधक और विचारक हुआ हो। कबीर साहिब का साहित्य उन के दर्शन को प्रदर्शित करता है। उन के लिखे दोहे और शब्दों को गा गा कर के खानाबदोश भी अमीर हो गए हैं। उन के दोहों और शब्दों के एक-एक शब्द में जो सार छुपा हुआ है, उस का वर्णन करना किसी भी दर्शनाचार्य के वश का नहीं है। कबीर साहब फरमाते हैं, कि-----
जल में कुंभ है कुंभ में जल बाहर भीतर पानी।
फूटा कुंभ जल जलहिं समाना।।
इन चंद शब्दों में कबीर साहब ने अपने सारे अध्यात्मिक दर्शन को भारत के लोगों के सामने उड़ेल कर रख दिया है, जिस को समझने के लिए मनुवादियों के पास कोई दिमाग नहीं है, फिर भी ऐसे दार्शनिक विद्वान को छ: सौ वर्षों से कांशी शहर के मूलगादी द्वार के समीप बनाए गए चबूतरे के ऊपर एक साधारण भजन गायक के रूप में स्थापित कर के अपमानित करते आ रहे है, जो मायावती और मनुवादी मानसिकता की नीच से नीच सोच का द्योतक और प्रमाण है।
कबीर मठ मूलगादी द्वार:--- कबीर साहब के नाम को अजर अमर करने के लिए मूलगादी कबीर मठ के सामने एक तोरण बनाया गया है, जिस की ऊंचाई लगभग 16 फुट के करीब है उस के ऊपर मेहराबधार पट्टिका के ऊपर छोटे-छोटे तीन मंदिर बनाए गए हैं, जिन के बीच एक गोल चक्कर भी नजर आता है। इस पट्टिका के ऊपर लिखा गया है* कबीर मठ मूलगादी द्वार*, इस द्वार के अति भद्दे और गन्देपन को देख कर भारत के नीच शासकों, प्रशासकों की नीच, हीन मनुवादी मानसिकता की बदबू स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। यहाँ भारत के मूलनिवासी अवतारों के प्रति मनुवादी घृणा स्पष्ट नजर आती है। तोरण के पीछे बिजली के तारों का इंद्रजाल फैला हुआ है, जो जनता के लिए खतरे का संकेत ही नहीं है अपितु मौत का भी सबब बन सकता है। दोनों ओर लगे बिजली के खम्भों से चिपके तारों के गुच्छों से बिजली लीक हो जाए तो ना जाने कितने लोगों की मृत्यु हो सकती है। गेट के सामने गंदी और मंदी दीवारें, गलियां जिन में खड़े स्कूटर कबीर साहब के अपमान को दर्शाते हैं। दाएँ ओर एक साइकिल स्टैंड है, जो वहाँ के फूहड़पन का जीता जागता सबूत है।
खस्ता हालत में कबीर चबूतरा:--- जब कभी काशी में सड़कों का निर्माण किया गया होगा, उस समय के योग्य शासक ने वहां एक सुंदर चबूतरा बनाया हुआ है। ये चबूतरा तो तत्कालीन कला का बेजोड़ सजीव नमूना और निर्माण था मगर उस के बाद इस के रखरखाब की जिम्मेदारी आगामी शासकों की थी और है मगर जातिवादी मनुवादी सरकारों की लापरवाही से कबीर मठ का ये भव्य चबूतरा उपेक्षा का शिकार बना हुआ है। वर्षा के थपेड़ों से चबूतरे के चारों ओर से रेत, सीमेंट आदि खर खर कर दयनीय हालत से गुजर रहे है, जिस प्रकार वर्षा की तीव्र बौछारों से चट्टानें भी खर खर कर परतें बन जाती हैं वैसे ही कबीर जी के चबूतरे की दुर्दशा बनती जा रही है, जो कबीर साहिब के प्रति सपा, बसपा सहित मनुवादी शासकों और प्रशासकों की मूर्खता, कृतघ्नता और उपेक्षा के परिचायक ही है।
चबूतरे पर मूर्तियाँ:---- चबूतरे के ऊपर एक हाथ में तूँबा और दूसरे में खड़ताल बजाते हुए कबीर साहिब की मूर्ति स्थापित की हुई है, जिन के मात्थे के उपर मुस्लिम सभ्यता की मेहराबदार टोपी के बीच सूर्य का चित्र अंकित है, जिस के मध्य में तिलक लगाया हुआ है। गले में एक गोल गोल मनकों की भद्दी माला अर्ध नग्न बदन के बीच पीली धोती सुशोभित हो रही है। कदम बढ़ाते हुए हाथ में एक तूंबा और दूसरे हाथ में खड़ताल है, जिन को बजाते हुए कबीर साहिब को एक गायक कलाकार के रूप में दर्शाया हुआ है। कबीर जी के पीछे उन का एक शिष्य भी कबीर जी के पहराबे में विद्यमान है, जिस ने हाथ में चिमटा लिया हुआ है और उस को बजाते हुए आगे कदम बढ़ा रहा है, उस की बगल में एक अन्य अनुचर है, जिस की घुटने से पैर तक टांग टूटी हुई नजर आती है, जो कबीर जी के अनुचर का अपमान करती हुई देखी जा सकती है। उसी तरह कबीर जी के पीछे दूसरा अनुचर भी हाथ में ढोलकी को बजाने के लिए हाथ उठाते हुए दर्शाया गया है, जिस के समक्ष भी एक अन्य अनुचर के टूटे पाँव का भाग नजर आता है जो कबीर जी के अपमान का सबूत विद्यमान है। दोनों ही शिष्यों को कबीर जी का अनुसरण और अनुगमन करते हुए कदम उठाते हुए दिखाए गए हैं, जिन को देख करके स्पष्ट होता है कि कबीर साहिब एक हाथ से तूँबा बजा रहे हैं और दूसरे हाथ से खड़ताल बजाते हुए भजन गाते हुए चल रहे हैं।
कबीर साहिब का अपमान:--- कबीर जी और उन के अनुचरों की मूर्तियाँ मानवता के माथे पर कलंक है परंतु बड़े दुख की बात यह है कि जिस कबीर और गुरुओं के गुरु रविदास जी महाराज ने मनुवादियों को सत्य के मार्ग पर चला कर, उन को सत्य के दर्शन करवाए हैं, वही लोग उन का छ: सौ वर्षों से अपमान करते आए हैं मगर उन से अधिक घोर अपराधी तो अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ी जाति और अल्पसंख्यक विधायक, सांसद और मंत्री मुख्यमन्त्री हुए हैं, जिन्होंने अपने क्रांतिकारी सतपुरुषों का अपमान करवाया है और खुद भी अपमान करते आए हैं।
मुझे लगता है कि जब तक भारत में असली मूलनिवासी चँवर वंश का शासन नहीं आता है, तब तक भारत के मूलनिवासी विद्वानों, वैज्ञानिकों, गुरुओं पीरों का कभी भी मान सम्मान नहीं हो सकता है और उन को कबीर जी की तरह ही अपमानित हो कर इतिहास को जिंदा रखना पड़ेगा।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदि धर्म मंडल।
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