कांशी लौटूवीर mndir गुरु रविदास जी।।

कांशी लौटूवीर मंदिर गुरु रविदास जी।।
गुरु रविदास जी महाराज जन्म से ही मनुवादी व्यवस्था को ध्वस्त करने लग पड़े थे। आठ साल की आयु में धोती, तिलक लगा कर जब अद्वितीय ध्वनि निकाल कर शंख बजाया था, तब उस ध्वनि को सुन कर पोंगा पण्डितों, तिलकधारियों और ढोंगी पुजारियों की नींद हराम हो गई थी, चारों और सुगबुगाहट शुरू हो गई थी, कि अब ब्राह्मणों का ठग मंत्र मौत की ओर जाने वाला है। जो तीनों वर्णों को मूर्ख बना कर खुद देवता, और भगवान बन कर मौज मस्ती करते हुए निठठले बैठ कर पेट भर कर ऐश्वर्याशाली जीवन जीते थे। गुरु रविदास जी की धार्मिक क्रांति के कारण मनुवादी छल कपट समाप्त होने जाने रहा है।
ब्राह्मण कुछ दिन सबर का घूँट पीते रहे:---- गुरु रविदास जी महाराज प्रतिदिन सुवह उठ कर मंजन और स्नान करते, धोती, तिलक लगा कर आदि पुरुष का ध्यान लगा कर *सोहम* शब्द का जाप करते और अंत में शंख बजाने का ढोंग करते ताकि ब्राह्मणों के किलों में आग लगा कर पाखंडों, आडंबरों को भष्म किया जा सके, गुरु जी की कयामत से भयभीत ब्राह्मण आग बबूले हो रहे थे मगर कर कुछ नहीं पा रहे थे, फिर भी वे कुछ दिनो तक सबर के घूँट पीते रहे ताकि बालक को डरा धमका कर, अपने धन्धों को बचा सकें।
प्रकांड पंडित परमानंद का घर पर आना:--- गुरु जी की तर्क पर आधारित क्रांति को रोकने के लिए ब्राह्मणों की गुप्त सभा हुई जिस में उन्हें ब्राह्मणों की रोजी-रोटी पर छाए संकट को रोकने पर चिंतन हुआ। सभी तिलकधारियों ने तत्कालीन प्रकांड पंडित परमानंद को मनोनीत किया कि वह बालक रविदास को समझा बुझा कर ब्राह्मणबाद को नग्न करने से बचाए। ब्राह्मणों का सरदार पंडित परमानंद अपने चमत्कार दिखाने के लिए बालक रविदास जी के घर पर चला आया और आते ही बालक रविदास को अपने चमत्कारों में उलझाने लगा मगर बालक के सामने वह भी शर्मिंदा हो कर लौट गया।
राजपूत राजा बालक रविदास से खुश थे:--- ब्राह्मण किसी भी राजपूत, वैश्य और शूद्र को पढ़ने, लिखने और पूजा पाठ कर के, धार्मिक प्रवचन करने और सुनने नहीं देते थे, बड़े जांवाज, वीर बहादुर बनने वाले राजाओं के पूत, राजपूत भी ब्राह्मणों के बनाए संविधान अर्थात मनुस्मृति के कानूनों का उलंघन नहीं कर सकते थे मगर चँवरवंशी वीर बालक रविदास जी ने ब्राह्मणों, राजपूतों और वैश्यों के थोथे जातीय अहं को मिट्टी में मिलाने का क्रांतिकारी अभियान जारी रखा हुआ था, जिस से राजपूत राजे, महाराजे तो बड़े खुश थे क्योंकि राजे समझ चुके थे, कि ब्राह्मण तीनों वर्णों को मूर्ख बना कर अपना उल्लू सीधा करते आ रहे हैं।
ब्राह्मणों के सबर का बांध टूट गया:--- आठ साल के बालक रविदास ने जब ब्राह्मणों के पाखण्डों का जनाजा निकाल कर सारे देश विदेश में नग्न कर दिया, तब वे बालक की इहलीला ही समाप्त करने देने पर तुल गए और निर्णय कर लिया कि उन को छल कपट से बुला कर उस का काम तमाम कर दिया जाए।
रविदास जी को सीर गोवर्धन बुलाया गया:-- गुरु रविदास जी महाराज को उन के घर मंडुआडीह से बुलाने के लिए एक मरासी को भेजा गया। मरासी ने बालक को कहा कि हे रविदास! सीर गोवर्धन में ब्राह्मणों की पंचायत हो रही है, ब्राह्मणों ने आप को बुलाया है। बालक रविदास जी ने मरासी को कहा, आप चलो! हम आ रहे हैं। मरासी, बालक को डरा धमका कर चला गया और कहा कि हुक्मदूली मत करना अन्यथा प्राणों से हाथ धो बैठोगे।
रविदास अकेले ही सीरगोवर्धन को चल पड़े:---गुरु रविदास मंदिर सीर गोवर्धन के पांच सौ गज की दूरी पर कांशी के ब्राह्मणों का झुंड बालक रविदास को कत्ल करने के लिए इकठ्ठा हो चुका था, उधर बालक रविदास अकेला ही आदपुरुष के ध्यान में खो कर खूनी पथ पर चला आ रहा था।
जा को राखे सांईंया मार सके ना कोय:--- जब वीर बालक रविदास जी खूनी स्थल से कुछ दूरी पर आ रहे थे, तो उन के आगे आगे उन्हीं के रंग, ढंग और स्वरूप वाला एक ब्राह्मण बालक धोती, तिलक लगा कर कातिलों की ओर चला जा रहा था, जिसे देखते ही पगलाए खूनी ब्राह्मणों ने उसी के ऊपर कातिलाना हमला कर दिया और देखते देखते अपने ही ब्राह्मण भाई को कतल कर दिया। जब बालक रविदास जी ने दूर से ही खून-खराबे को देखा तो वे वहीं से वापस मंडुआडीह को लौट गए।
लौटूवीर नामकरण:---जिस स्थान से बालक रविदास जी खूनी खेल देख कर वापस घर को लौटे थे, वह अपवित्र खूनी स्थान भी ऐतिहासिक स्थान बन गया, उसी स्थान का नाम लौटूवीर रख दिया गया था, स्थानीय संत राजेश कुमार और उस के साथियों ने मुझे बताया कि इस पवित्र स्थान को आज भी लौटूवीर के नाम से जाना जाता है। आज वहाँ पर एक छोटा सा मंदिर बना हुआ है, जिस के दरवाजे के सामने घण्टे, घड़ियाल लटके हुए हैं, जहाँ एक पुजारी बैठ कर आदपुरुष का नाम ले कर दुखियों की झाड़ फूंक कर के अपना और अपने वच्चों का पेट पालने का धन्धा चला आ रहा है।
गुरु रविदास जी महाराज भारत के चारों वर्णों का उद्धार करने के लिए कांशी शहर में अवतरित हुए थे मगर जात्याभिमानी मनुवादियों ने उन की शक्ति का सदुपयोग नहीं किया और अपनी थोथी मनुवादी मानसिकता के चलते, अपनी इज्जत आबरू को मिट्टी में मिलाते रहे। जिन मूलनिवासी अछूतों, शूद्रों के लिए गुरु जी ने अंधे युग में क्रांति का आह्वान किया, स्वयं दुखों, मुशीबतों को बर्दास्त किया, वे आज भी राम, रहीम, आशा राम बापू, राधा स्वामी, निरंकारी जैसे मनुवादी गुरुओं के दर पर भटक रहे हैं। सतगुरु कबीर जी, नामदेव जी, सेन जी, सदना जी ने शूद्रों और मुस्लिमों के लिए जीवन कुर्बान कर दिया मगर ये लोग मनुवादी मंदिरों, गुरुदुवारों में भटक कर धार्मिक गुलामी में ही जीवन जी रहे हैं। रिटायरमेंट के बाद मनुवादी आरएसएस की शाखाओं में हाजरी लगाते हैं मगर आरक्षण से बने अनुसूचित और पिछड़ी जातियों के कर्मचारी सेवानिवृत हो कर राधस्वामी और रामपाल के डेरों में धक्के खा रहे हैं। जब तक मूलनिवासी अपने गुरुओं के बताए रास्ते पर चल कर उन का आशीर्वाद प्राप्त नहीं करेंगे, तब तक सुख, शांति से जी नहीं सकेंगे।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदि धर्म मंडल। 

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