गुरु रविदास जी का लोप स्थान गढ़ाघाट उर्फ गढवा घाट।।
गुरु रविदास जी का लोप स्थान गढ़ाघाट उर्फ गढ़बाघाट!!!
१६ फरवरी २०२३ को कांशी स्थित गढ़वाघाट के दर्शन करने का सुअवसर प्राप्त हुआ, जिस की चकाचौंध को देख कर के आंखें भी चुंधिया हो गई, मन में हैरानी हो रही थी कि इतना अपार धन-दौलत संचित करके गढ़वाघाट में भवनों का निर्माण किया गया है। अति सुंदर मोरियां, मेहराबें, अट्टालिकाएँ, चित्रकारी, नक्काशी कार्य और अत्यंत मनमोहक ढंग से उत्कीर्ण किए गए दरवाजे भवन को चार चाँद लगा रहे हैं, जिस के पीछे एक बहुत बड़ा राज छुपाया गया है।
परिसर:--- कम से कम दो हजार वर्ग मीटर में गढ़वाघाट भवन का निर्माण किया गया है, जिस की दीर्घ मीनार, गगनचुंबी गुंबद, असंख्य कमरे और सुसज्जित प्रांगण देखते ही बनते हैं। सारा प्रांगण मैटलड किया हुआ है, ऐसा लगता है कि धरती के ऊपर स्वर्ग का उतारा गया है। अरबों रुपए पानी की तरह बहा कर के इस अति अद्वितीय और आलीशान भवन का निर्माण किया गया है।
ऐतिहासिक वृद्ध वृक्ष:--- लगता है कि जिस समय इस परिसर का नाम गढ़ाघाट से गढ़वाघाट किया गया है, तभी वहाँ वृक्षारोपण किया गया था, जिस के प्रमाण वहाँ पर उपस्थित वृद्ध वृक्ष गुरु रविदास जी महाराज के इतिहास को दर्शाते हैं। भव्य गोलाकार घुमावदार वृक्षों से सुसज्जित भवन का परिसर बताता है कि यहाँ पर किसी विशिष्ट सच्चाई को दफनाने के लिए कुटिल प्रयास किया गया है ताकि कोई उस अतीत को समझने की कल्पना भी ना कर सके।
विवेकानंद महाराज का स्मरणागार:--- गढ़वाघाट भवन के बीचोंबीच एक साधु, संत, परम हंस विवेकानंद जी का भी लघु मंदिर निर्मित किया गया है, जो उन के मन मस्तिष्क की सोच को उद्घाटित करता है कि उस ने कितनी विद्धवता से इस परिसर को संवार कर गुरु रविदास जी महाराज के इतिहास को मिटा कर लुप्त किया है।
पूजा स्थल:--- विशाल भवन के मध्य में अत्यंत सुंदर, भव्य और मनमोहक पूजा स्थल गढ़वाघाट भवन के भीतर निर्मित किया गया है, जिस में मखमली चटाईयां बिछी हुई है, मन करता है इन के ऊपर लेटे ही रहे। घंटे, घड़ियालों से सुसज्जित पूजा स्थल आकर्षण का केंद्र बनाया गया है। नारी निकेतन का भी निर्माण किया गया है, जिस के बाहर उत्कीर्ण है -----
श्री स्वामी जी सदा सहाय!
संत भवन
महिला आश्रम
पुरुषों का अंदर जाना मना है।
सदज्ञानी सुविचार मोटो:---- सुसज्जित दीवारों के दरवाजों की मेहराबों के उपर सदज्ञान से ओतप्रोत मोटो चित्रित किये गए हैं, जिन के भाव मनुवादी दृष्टिकोण को उजागर करते हैं।
छाया किए था आप के सर पर मणिधर नाग।
सेवा कर लिया जागी थी उस की भाग।।
ये विचार विष्णु नामक आर्य के रहन-सहन के भाव लिए हुए हैं, कि वह मणिधर की छत्रछाया में सेवा करने वाले के भाग्य को संवार कर जगा रहा था।
विद्या वही है जिससे जीवन मुक्ति प्राप्त हो जाए--विष्णु पुराण गर्जेउ मरत घोर भारी कहा नाम रन हतो पचारी।
डोली भूमि गिरत दसकंधर छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर।
फूले कमल सोह सर कैसे निर्गुण ब्रह्म शगुन भयो जैसे।
गुंजन मधुकर मुखर अनुपा सुंदर खग नाना रूपा।।
समाधि स्थल:--- पूज्य पाद श्री सदगुरु श्री श्री 1008 श्री स्वामी आत्मविवेकानंद जी महाराज परमहंस जी।
एक ईष्ट (सदगुरु) की भक्ति करने वाला सब से उतम है। श्री मदभगवत गीता ७/१६
स्वामी ईशरदास जी महाराज ने गढ़ाघाट को जिंदा किया है:--- गुरु रविदास जी महाराज के मिटाए गए, इतिहास को खोजने के लिए ही स्वामी ईशरदास जी महाराज ने अपनी दिव्य दृष्टि से सत्य को ढूँढने का प्रयास किया है, इसीलिए उन्होंने गुरु आदि प्रगास ग्रंथ की रचना की थी जिस में उन्होंने मूलनिवासी गुरुओं के इतिहास को जिंदा किया है। गुरु रविदास जी की क्रांतिकारी वाणी को फिर सृजित कर के हमें उपलब्ध कराया है। इसी ग्रंथ के पृष्ठ संख्या ११५८ पर उन्होंने गढ़ाघाट का तर्कसंगत जिक्र किया है, जिस में वे फरमाते हैं कि----
!!शब्द राग बिहागड़ा!!
सुरसागर तट आसन लाए श्री रविदास आए जी।। गढ़ाघाट भी तिस नूं कैहदे बैठे समाधि लगाए जी।। लख करोड़ी संगत आई सबनी दर्शन पाए जी।। तेती करोड़ देवते आवन बारिस पुहप कराए जी।। हिमालय पर्वत और उरध कैन्हदे सिरधर पर्वत चढ़ाए जी।। खष्ट चक्कर को लांघ कर जाँदे सुन सरोवर नहाए जी।। भंवर गुफा जप सोहम सोहम सचखंड सतनाम गाए जी।।अलख अगम अनामी बेगम अपने शहर समाए जी।। पंचभूत का पता न लगियो कहां गिउ छपवाए जी।। बेअंत संगतां राजे रइतां हैरान हो जाए जी।। जहां ते आवत वहाँ ही जावत संनदेही बैकुंठ पुजाए जी।। दास कहे धन धन है गुरु जी जोति जोत समाए जी।।
गुरु रविदास जी के लोप पर अपवाद:--- गुरु रविदास जी के समय तक राजपूतों, वानियों को भी लिखने का अधिकार नहीं था,अछूतों को तो केवल गन्दगी साफ करने के अतिरिक्त कुछ करने के अधिकार थे ही नहीं, फिर जो जो कथाएँ पुराणों, दर्शन शास्त्रों, ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषदों में लिखी हैं, वे सभी ब्राह्मणों द्वारा ही कपोल कल्पित लिखी गई हैं। गुरु रविदास जी से पूर्व किसी ने भी ब्राह्मणों के पाखण्डों, अडंबरों और झूठों का पर्दाफ़ास करने का साहस नहीं किया था इसिलिए ब्राह्मणों ने ही गुरु रविदास जी को अपमानित करने के लिए कल्पित कथाएँ लिखी हुई हैं, जिन के अनुसार उन के इतिहास को संदेहों से भर कर गुरु जी के अनुयायियों को भ्रमित किया है, इसीलिए उन को चितौड़गढ़ किले में कतल किया गया बताया है। ये कथा बिल्कुल इतिहास से मेल नहीं खाती है क्योंकि गुरु जी १५१ वर्ष की आयु में १५८४ में लुप्त हुए हैं, उस से एक साल पूर्व बाबर अपने सैनिकों के साथ गुरु जी के दर्शन करने के लिए कांशी गया था।
जब गुरु रविदास जी एक सौ इकावन वर्ष के हो गए और अस्थि पिंजर चलने लायक नही रहा था, तो उन्होंने इसी पवित्र स्थल पर स्वयं समाधी ली थी। लाखों श्रधालुओं की नम आँखों के देखते देखते संगत को अलविदा करते हुए, अपने श्वास रोक लिए थे और अपने अनाथ, गुलाम मूलनिवासी सेवकों को छोड़ कर इसी स्थान पर वे लुप्त हो गए थे।
रामसिंह आदवंशी।
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