गुरु रविदास गोष्ठी स्थल उर्फ विश्व काशीनाथ धाम।।
गुरु रविदास गोष्ठी स्थल उर्फ विश्व काशीनाथ (विश्वधाम)।। सोलह फरवरी को गुरु रविदास नगरी कांशी में कांशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मेरे साथ सीर गोवर्धन के निवासी संत राजेश कुमार जी विश्व काशीनाथ धाम के दर्शन करने में सहयोग कर रहे थे। हम ने बीएचयू तोरण द्वार से टेंपो लिया और विश्वनाथ मंदिर के लिए रवाना हुए, इसी बीच पीछे से आ रहे एक टेंपों से एक सवारी जोर से बोली और हमारी ओर संकेत कर के कहनी लगी, कि आप का मोबाईल फोन गिर गया है। राजेश ने जेब टटोलते हुए कहा हैं, मेरा फोन गिर गया है। वे तुरंत टैन्पू से उतरे और दौड़ कर पीछे गए तो सड़क पर गिरा हुआ फोन उठा लाये। मैं इस घटना से प्रभावित हुआ कि कांशी नगरी में गुरु रविदास जी महाराज की दैवी शक्ति का प्रभाव अभी मौजूद है अगर ना होता तो कोई इतनी भीड़ मैं क्यों हमें बताता, वह स्वयं ही उठा कर ले जाता। हमारा टैंपो तीव्र गति से दौड़ता हुआ अपने गन्तव्य के लिए जा रहा था। घनी भीड़ को चीरता हुआ, कच्ची सड़क की ऊबड़-खाबड़ मिट्टी के ढेलों से हिचकोले खाते हुए हम मुख्य सड़क से मिलकर कांशी विश्वनाथ मंदिर पहुंचे।
कांशी विश्वनाथ मंदिर:--- खचाखच भीड़ से भरी स्थली पर पदार्पण करके हम मंदिर की ओर चल पड़े जहां पुलिस की कड़ी निगरानी सुनिश्चित की गई थी, चारों तरफ से मंदिर को पुलिस द्वारा घेरा हुआ था। मैंने एक द्वार पर पुलिस कर्मी को पूछा कि भाई साहब मंदिर में किस तरफ से प्रवेश किया जा सकता है? पुलिसकर्मी ने बड़ी शालीनता के साथ व्यवहार करते हुए कहा, कि सर उस तरफ एक छोटा गेट है जिस से आप अंदर प्रवेश कर सकते हैं। मैंने संत राजेश के साथ प्रवेश द्वार से मंदिर के अंदर जाने के लिए प्रस्थान किया और जाते ही मैंने एक पुरानी ऊंची मीनार देखी और तुरंत अपना मोबाइल निकाल कर के उस का फोटो खींच लिया मगर उसी समय एक तिलकधारी पंडा आकर गुस्से से पागल हो करके कहने लगा, अरे भाई! यहां फोटो लेना मना है! आपको पता नहीं चलता, कि यहां फोटो लेना वर्जित है। मैंने बड़ी शालीनता के साथ तिलकधारी, धोतीधारी पंडे को कहा महाराज! हमें क्षमा करो! हमसे भूल हो गई है, हम पहली बार हिमाचल प्रदेश से चल कर गुरु रविदास महाराज की नगरी के दर्शन करने के लिए यहां आए हैं और हमें पता लगा है कि इस स्थान पर सदना कसाई और गुरु रविदास जी महाराज की पहली भेंट हुई थी और इसी स्थान पर दोनों महापुरुषों की गोष्टी भी हुई थी, इसलिए हम यहां पधारे हैं अन्यथा हम आप के लोगों के दर्शन के लिए थोड़े ही आते। तिलकधारी पंडा इस कथन को सुन कर और बौखला गया और बड़ी क्रूरता और प्रतिशोध की अग्नि में तपता हुआ कहने लगा, वहाँ जाने के लिए दूसरे रास्ते से जाना पड़ता! मैंने कहा महाराज हम ने विश्वनाथ के भी दर्शन करने हैं, इसलिए हमें उन के दर्शन करने के लिए भी मार्ग बताओ। तिलकधारी बड़े रोब से बोला! उधर जा कर के अपने जूते खोलो और उसके बाद आप सीधे आगे चले जाओ और वहां से अंदर प्रवेश कर के तेती करोड़ देवी-देवताओं के दर्शन कर लो। मेरी आदत है कि मैं जिस किसी भी धर्म स्थल पर जाता हूँ, वहाँ के नियमानुसार ही प्रवेश कर के आदि पुरुष को श्रद्धा से नमन करता हूँ ताकि कोई पाखण्डी, ढोंगी झगड़ा ही ना कर सके। मैंने संत राजेश के साथ जूता घर में जा कर के जूते खोले और दीवार के साथ रख दिए। चारों ओर दृष्टि दौड़ाई तो देखा वहाँ एक नल है। हम ने नल से पानी लिया और हाथ पैर धोते हुए बुजु कर के पत्थरों पर उकेरे और निर्मित तेती करोड़ देवीयों -देवताओं के दर्शन करने के लिए चल पड़े। ज्यों ही हम ने मंदिर के अंदर प्रवेश किया तो देखा तीनों दीवारों के साथ तेती करोड़ देवी-देवताओं में से मुख्य मुख्य दीवारों के साथ सट कर खड़े थे, हम एक कोने से सभी देवताओं को नतमस्तक होकर के प्रणाम करते हुए निकलते गए। कहीं कोई तीन सिरों वाला देवता खड़ा था, कोई हाथ में गुर्ज लेकर खड़ा था, कहीं कोई काले मुँह वाली देवी मुंह से जीवा बाहर करके विराट विकराल काले मुख को खोल करके खड़ी थी, कहीं कोई तीर कमान ले कर पाण्डों की रक्षा के लिए खड़ा था, कहीं सुदर्शन चक्र ले कर अर्थात सभी सहमे हुए देव कोई ना कोई अपने अपने हाथ में हथियार लेकर के खड़े थे, ऐसा प्रतीत होता था कि ये सभी देवता ना हो कर के सेनानायक हों, जो कांशी शहर की जनता की सुरक्षा के लिए तैनात हों। शर्द्धालुओं की इतनी भीड़ थी कि स्त्री और पुरुष एक दूसरे के साथ स्टे हुए हाथों में प्रसाद लेकर के मंदिर में प्रवेश करते जा रहे थे। हम जल्दी में थे इसीलिए हमें काशी विश्वनाथ जी के पास खड़ी भीड़ के पीछे से गर्दन ऊंची करके दर्शन किए और वहीं से वापस चल पड़े। अब हम गुरु रविदास जी महाराज और सदना कसाई के मिलन और गोष्ठस्थल की ओर चलने लगे तो वहां एक तंग गली थी जहां से गुजरना बड़ा कठिन था, फिर भी हम जैसे तैसे उस स्थान पर पहुंचे। हम ने सोचा था, कि वहां गुरु रविदास जी महाराज और सदना जी की स्मृति में मूर्तियां स्थापित की होंगी, उन के आसन गोष्टी स्थल पर सुशोभित हो रहे होंगे मगर वहां तो केवल कुछ मीटर खाली जगह यह बता रही थी, कि कभी यहां गुरु रविदास जी महाराज और सदन कसाई ने शास्त्रार्थ करने के लिए गोष्टी की थी। वीरान धर्मस्थली को देखने के बाद मनुवादी फितरत के भेदभाव की पोल खुलती हुई नजर आई, जो सत्य और प्रमाणित था, उस का कोई नामोनिशान नहीं था। गुरु रविदास जी महाराज और सदना कसाई के इतिहास को समाप्त किया जा चुका है, उन के इतिहास को सदा सदा के लिए मिटाने के लिए तेती करोड़ देवी-देवताओं के लिए विशाल भवन का निर्माण करके उनमें स्थापित किया जा चुका है। इस खंड को देखने से स्पष्ट होता है कि वहां गुरु रविदास जी महाराज और साधना नाम के कोई भी महापुरुष नहीं आए थे और ना ही वहां किसी किस्म का कोई सबूत था, जिस से साबित किया जा सके कि गुरु रविदास जी और सदन कसाई का यह तीर्थ रहा है। जिस स्थान पर हम खड़े थे, उस धरती का वजूद केवल और केवल गुरु रविदास जी महाराज और सदना के कारण ही है।
रामसिंह आदवंशी।
हिमाचल प्रदेश।
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