17मई।। गुरु रविदास जी महाराज का क्रांतिकारी आंदोलन।।
यूरेशिया से आए काफिर घुसपैठियों ने छलबल से आदिकाल से चले आ रहे आदिवंश के सम्राट शिव और गौरां का कतल कर के मूलनिवासियों को अपना गुलाम बना लिया था, जिनको स्वतंत्र करवाने के लिए गुरु रविदास जी महाराज ने शांति और खूनी महाक्रांति का सहारा ले कर ऐतिहासिक सामाजिक आंदोलन शुरू किया था, जिस का नेतृत्व गुरु जी के वीर चँवरवंशज उर्फ चमार वंशज आज भी कर रहे हैं।
गुरु रविदास जी ने राजपूतों को मनुस्मृति से आजाद करवाया।।
विश्व के इतिहास को अगर टोटला जाए तो कहीं पर भी मनुस्मृति के खिलाफ कोई आंदोलन नहीं हुआ था, किसी भी देश में मनुस्मृति के विरोध में कोई संगठन तैयार नहीं हुआ था, कोई भी ऐसा महापुरुष दिखाई नहीं देता है, जिसने मनुस्मृति के काले कानूनों को निरस्त करने के लिए विद्रोह् किया हो।
मुहम्मद बिन कासिम ने भी भारत में घुस कर मनुस्मृति के अनुसार ही शासन चलाया था मगर मनुस्मृति के खिलाफ तनिक भी कोई काम नहीं किया, उस के बाद केवल गुरु रविदास जी महाराज ने राक्षसी संविधान के खिलाफ जन आंदोलन शुरू किया था, जिस के अनुसार ही डचों, हूणों, फ्रैंचों और अंग्रेजों ने भी शासन करना शुरू किया मगर वे भी केवल अपने स्वार्थ सिद्ध करने और भारत की धन-दौलत को चुराने के लिए ही शासन करते थे।
मनुस्मृति का आधार वर्ण व्यवस्था:--- विदेशी युरेशियन आर्यों ने भारत के मूलनिवासियों को अपने गुलाम बनाए रखने के लिए दीर्घकालीन योजना बनाई थी, जिस के अनुसार इन लोगों ने भोले-भाले मूलनिवासियों की मानवताबादी विचारधारा और शराफत का नाजायज फायदा उठा कर, छलबल से सत्ता छीन ली थी। भारत के मूलनिवासियों पर शासन करने के लिए साम, दाम, दण्ड, भेद नीतियों की खोज की। साम (रिश्वत देना) नीति के अनुसार भारत के कुछ मूलनिवासी लोगों को लालच दे कर अपने पक्ष में किया गया, जो संपन्न मूलनिवासी, आर्यों की झोली में पड़ गए, वे तो अपनी संख्या बढ़ाने के लिए ब्राह्मण बना लिए, जो राजा और उन के वंशज धन-दोलत ले कर उन की गुलामी स्वीकार कर के उन के शुभ चिंतक बन गए उन्हें राजपूत घोषित कर दिए गए, जो मूलनिवासी धन संपन्न हो कर व्यापार करते थे, उन्हें वैश्य वर्ण के नाम से पुकारा गया मगर जिन स्वाभिमानी भारत के आदिवासियों ने आर्यों की दासता स्वीकार नहीं की, वे आर्यों के साथ लड़ते रहे मगर आर्यों ने उन के साथ दण्ड नीति का बड़ी क्रूरता और राक्षस प्रवृत्ति से प्रयोग कर के उन्हें मौत के घाट उतारना शुरू कर दिया था, जिस के कारण कुछ ने आत्मसमर्पण कर दिया गया, उन्हें माफ करते हुए अपनी घर की सेवा का दायित्व देते हुए शूद्र वर्ण से पुकारा था, जो वर्तमान ओबीसी अर्थात पिछड़ा वर्ग है मगर उन के बाद भी जिन वीर योद्धाओं ने आर्यों का प्रतिकार जारी रखा और आर्यों को मौत के घाट उतारते रहे और उन की गुलामी स्वीकार नहीं की मगर मरते मिटते रहे, इन लोगों को भी बड़ी ही कायरता, नृशंशता से मारा काटा गया, वे भी अंत में आत्म समर्पण कर बैठे, जिन को आर्यों ने अपनी गन्दगी साफ करने की शर्त पर अपना गुलाम बना कर शोषण शुरू किया था, जिन्हें अस्पृष्य, अछूत घोषित कर के जलालत की जिंदगी जीने की सजा दी गई। जिन्होंने मर मिटना स्वीकार कर रखा है मगर आर्यों की दासता स्वीकार नहीं की, वे वीर आज भी विद्रोही ही है और आर्यों से लड़ रहे हैं, इन को ही नागा विद्रोही कहा जाता है। मनु द्वारा रचित मनुस्मृति नामक दानवीय संविधान थोंप कर मनुवादी राजतंत्र गुरु रविदास जी के समय तक चलता आ रहा था।
राजपूत वर्ण का इतिहास:--- मनु ने मूल भारतीयों के बीच फूट डालने लिए भारतीय समाज को चार वर्णों में विभाजित किया था। जो भारत के राजपूत राजाओं की संताने हुई हैं, वही लोग जमीन के मालिक हुआ करते थे, वही दबंग भी होते थे, इसलिए मूलनिवासी राजाओं के पुत्रों को यूरेशियन आर्यों ने अपने साथ मिला कर राजपूत वर्ण बना दिया और इन हारे हुए राजाओं और राजपुत्रों को दंड स्वरूप पढ़ने, लिखने का अधिकार नहीं दिया था, केवल मात्र अपनी सुरक्षा का दायित्व दे कर इन को राजा, महाराजा नियुक्त कर के उन के वच्चों को सेना में भर्ती कर के अपना सुरक्षा गार्ड नियुक्त कर लिया था। राजपूतों के इतिहास का ज्ञान भारत की अन्य जातियों के साथ तुलना कर के उन के गोत्रों के साथ मेल करके ज्ञात किया जा सकता है। आज भी राजपूतों के गोत्र और अछूतों के गोत्र मेल खाते हुए मिलते हैं।
वैश्य वर्ण:--- जो भारत के हारे हुए मूलनिवासी लोग व्यापारी और अमीर हुआ करते थे, उन को भी दंड स्वरूप पढ़ने, लिखने का कोई अधिकार नहीं दिया गया, केवल व्यापार करने के लिए गिनती सीखने का ही अधिकार दिया गया। इन लोगों को केवल व्यापार करने तक सीमित रखा गया। इस जाति के वर्ण को वैश्य वर्ण कहा गया, जिन के कुलदेवता और गोत्र भी अछूतों के साथ मेल खाते हैं।
शूद्र वर्ण:--- जो लोग युरेशयन आर्यों के साथ खूनी संघर्ष करते रहे और विवश हो कर के उन के अत्याचारों से दुःखी हो गए थे, तब वे भी आर्यों के पास आत्मसमर्पण करते गये, उन्हीं को शूद्र कहा गया और शूद्र वर्ण को भी दण्ड स्वरूप पढ़ने, लिखने और बोलने का अधिकार नहीं दिया गया। इन को भी केवल अंदर की सेवा करने के लिए गुलाम बना कर रखा गया। आज यही वर्ण मनुवादी लोगों का अंदर का सेवक बना हुआ है मगर जो स्वाभिमानी मूलनिवासी चँवरवंशी चार हजार सालों से मनुवादियों के खिलाफ संघर्ष करते आ रहे हैं और अपने खोए हुए शासन को वापस लेने के लिए संघर्षरत हो कर मनुवाद से लोहा ले रहे हैं, यूरेशियन आर्य ने राजपूतों, वानियों और शूद्रों के सहयोग से इन के नाक में दम कर रखा है। अंधाधुंध उन के ऊपर अत्याचार करते आ रहे हैं, औरतों से बलात्कार कर के जलाते आ रहे हैं, बलि के नाम पर इन्हीं को मारा-काटा जाता था। महाबलियों के द्वारा उन को डरा-धमका कर रखा जाता था मगर ये वीर, बहादुर वीर चँवरवंशी उर्फ चमार विदेशी मनुवादियों के पास आत्मसमर्पण नहीं करते हैं और इन के साथ संघर्ष में उलझे हुए हैं।
गुरु रविदास जी ने तीनों वर्णों को आर्यों से मुक्त कराया:--- छ:सौ साल पहले तक तीनों वर्णों को कोई भी मौलिक अधिकार नहीं थे, केवल मरने और गुलामों की जिंदगी जीने का ही अधिकार था। गुरु रविदास जी महाराज ने ही सर्वप्रथम राजपूतों को आभास करवाया कि यही आर्य आप को सुरा-सुंदरी में धकेल कर, आपस में लड़ा-लड़ा कर शहीद करते हैं, यही लोग मनुस्मृति के काले कानून थोंप कर अत्याचार करते हैं, जिन से निजात पाने के लिए गुरु जी ने कहा है-----
ऐसा चाहूँ राज में, जहां मिलै सभन को अन्न।
छोट बड़ सभ सम वसै तां रविदास रहै प्रसन्न।सारे मूलनिवासी समाज को समाजबाद का मूलमन्त्र बता कर, गुरु जी ने मनुवादी राक्षस राज से निजात दिलाई है। सभी आदिवासी और मूलनिवासी लोगों के दिलों को झकझोड़ने के लिए उन्होंने फिर कहा -----
पराधीनता पाप है, जान लियो रे मीत।
रविदास पराधीन से करै ना कोई प्रीत।
सारे पचासी प्रतिशत मूलनिवासी समाज में जागृति और चेतना जगा कर गुरु महाराज ने तत्कालीन राजाओं और बादशाहों से मनुस्मृति के काले कानूनों से मुक्त करवा कर स्वाशासन का मार्ग बताया था।
रामसिंह आदवंशी।
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