गुरु रविदास जी क्रांतिकारी हुए, ना कि साधु, संत, फकीर!

गुरु रविदास जी क्रांतिकारी हुए ना कि साधु, संत, फकीर!
मात्थे तिलक हथ जपमाला जग ठगने कु सुआङ बनाया।
मारग छाडि कुमारग गहि कै साँची प्रीत बिनु राम ना पाया।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि जो लोग दिखावे की भक्ति कर के भगवान के दर्शन करने के नाम पर भोलीभाली संगत को ठगने के लिए धोती, तिलक, शँख, माला हाथ में ले कर कई प्रकार के ड्रामें करते हैं, सन्मार्ग को छोड़ कर कुमार्ग पर चल कर कभी भी राम से सच्चा प्यार नहीं करते हैं, जिस से उन ढोंगी, पाखण्डी लोगों को निरंकार, निराकार, अदृश्य राम कभी नहीं मिलता है।
जो लोग जनता के ऊपर बोझ बन कर अर्थात परजीवी बन कर जीवन जीते आ रहे हैं, उन्हीं लोगोँ ने मूलनिवासी गुरुओं को भी अपनी तरह के साधु-संत, फकीर सिद्ध कर रखा है। खुद तो ये लोग हाथ में खप्पर ले कर भिखारी बन कर भिक्षाटन कर के गुजारा करते आ रहे हैं। ये ढोंगी लोग, स्वाभिमानी मूलनिवासी गुरुओं को इस जन्म के भिखारी तो सिद्ध नहीं कर सके मगर पिछले जन्म के भिखारी लिख डाला है। खुद तो नीच बन कर इतिहास के पन्नों में अपमानित हुए ही हैं मगर मूलनिवासी महापुरुषों को भी भीख मांगते हुए दर्शा कर उन के मात्थे पर कालिख पोत रखी हैं। गुरु रविदास जी महाराज उस संपन्न वंश में हुए हैं जो वंश आदिकाल से राज किया करता था, जिस चँवर वंश का शासन धार्मिक नियमों, सिद्धांतों के अनुसार चलता था, जनता की समस्त सुख सुविधाओं को ध्यान में रख कर प्रशासक अपने उतरदायित्वों का निर्वहन किया करते थे, उस सम्मानित वंश के शासन में कोई किसी का शोषण नहीं करता था, कोई किसी की आत्मा को दुखी नहीं करता था, किसी को कोई सजाए मौत नहीं दी जाती थी, किसी भी नारी के साथ अभद्र व्यवहार नहीं किया जाता था, किसी भी स्त्री को कभी सती के नाम पर जिंदा नहीं जलाया  जाता था, ऐसा निकृष्टतम, घोर पाप कर्म मनुवादी राक्षस राज में ही हुआ करता था, जो आज भी हो रहा है।
गुरु रविदास को पिछले जन्म का भिखारी लिख डाला:-- खुद तो डूबे सनम औरों को भी ले डूबे। ये कहाबत केवल उन तिलकधारी लेखकों पर सत्य चरितार्थ होती हैं, जिन्होंने गुरु रविदास जी महाराज को पिछले जन्म में किसी ब्राह्मण गुरु का ब्राह्मण शिष्य बताया है, जो भीख मांग कर अपने गुरु का पेट भरता था, जिस से प्राचीन काल से चली आ रही तिलकधारियों की भीख मांगने की प्रवृत्ति सत्य सिद्ध होती है, दूसरी मनुवादियों की पुनर्जन्म की कपोल कल्पना को भी सत्य सिद्ध करने के लिए गुरु रविदास जी महाराज को पिछले जन्म का ब्राह्मण लिख कर, उन की दिव्य शक्ति का सहारा लिया है।
गुरु रविदास को अपमानित करने के लिए तो पिछले जन्म के ब्राह्मण बताया मगर अगला झूठ लिखा:--- गुरु रविदास जी महाराज की अलौकिक दिव्य शक्तियों का लाभ लेने के लिए ब्राह्मणों ने गुरु रविदास जी को पिछले जन्म का ब्राह्मण सिद्ध किया हुआ है और अगले जन्म में चमार बना दिया, जब कि उस समय चमार जाति थी ही नहीं मगर ये किसी भी दूरदर्शी ब्राह्मण को नजर नहीं आया, किसी ज्योतिषी ने भी नहीं लिखा कि वे अगले जन्म में धोती, तिलक लगा कर, अद्वतीय शंख बजा कर ब्राह्मणों के पाखण्डों का जनाजा निकालेंगे। जब गुरु जी का जन्म हुआ था, तब तो उन के वंश का नाम चंवरवंश था। जब गुरु जी इस्लाम धर्म के औलिया, पीर, पैगम्बर नहीं बने तब १५०९ में सिकन्दर लोधी ने उन को चमार कहा था, इस का अर्थ है कि ब्राह्मणों की लिखी सभी वैदिक, पौराणिक, दार्शनिक कथाएँ केवल मात्र मनघडंत और कपोल कल्पित ही हैं, जिन पर मूलनिवासी जनता को तनिक विश्वास नहीं करना चाहिए। मूलनिवासी तथ्यों को तर्क की कसौटी पर कस पर ही किसी सिद्धांत को मान्यता देते हैं मगर फरेबी, मक्कार मनुवादियों ने जहाँ अनुभव किया कि हमारी कथा तर्क की कसौटी पर खरी नहीं उतरेगी, वहाँ पर नारद जैसे ऋषियों, मुनियों की कल्पना कर के असत्य को सत्य सिद्ध किया हुआ है। आदमी के गले में साँपों को डाल कर दिव्य शक्ति संपन्न अति मानव सिद्ध किया हुआ है, यदि ऐसा हुआ होता तो वर्तमान सपेरों को क्यों दर दर ठोकरें खाते हुए भीख मांगनी पड़ती, क्यों घर घर विषैले साँपों को ले कर घूमना पड़ता, वे भी अपनी दिव्य शक्तियों का लाभ उठाने के लिए शिव, लक्ष्मी और विष्णु की तरह समुंदर की ठण्डी हवा का आनंद लेते हुए मौज मस्ती किया करते और सांप उन के सिर पर खड़े हो कर प्रहरी बन कर पहरा देते। ज्ञान के धनी शूरवीर कबीर साहिब ने भी ब्राह्मणों के झूठे कल्पित पाखण्डों की पोल खोलते हुए फर्माया है कि----
साधु भूखा भाव का धन का भूखा नाहीं।
धन का भूखा जो फिरे सो तो साधु नाहीं।
कबीर साहिब भी तर्क के आधार पर तिलकधारियों के झूठ का पोस्टमार्टम करते हुए फरमाते हैं कि, साधु मान-सम्मान का भूखा होता है, धन दौलत का नहीं। जो साधु, संत, फकीर, ब्राह्मण धन के लिए भीख मांगते फिरते हैं, वे भिखारी होते हैं, जो दूसरों की हक हलाल की कमाई अपनी जेब में डालते हैं, वे ठग होते हैं, उन्हें साधु नहीं कहा जाता हैं, वही इसी जन्म में नारकीय जीवन जी कर मरते हैं!
गुरु रविदास जी का तार्किक ज्ञान:--- गुरु रविदास जी महाराज ने तिलकधारियों को उस समय तर्कसंगत ज्ञान का बोध करवाया था, जब भारत में ब्राह्मणों का वर्चस्व छाया हुआ था, जिन के समक्ष राजा भी उफ तक नहीं करते थे, उन के शाप से भयभीत हो कर उन का कहा मानते थे मगर गुरु जी ने ढोंगी तिलकधारियों की पोल खोल कर शासकों को भी सन्मार्ग पर ला खड़ा कर दिया था और अपनी क्रांतिकारी वाणी से तीनों वर्णों के मनुवादियों की विचारधारा को बदल दिया था, अपने प्राणों की प्रवाह किये बिना उन्होंने मनुवादी व्यवस्था को अपने पैरों तले रौंद कर ब्राह्मणवाद को बुरी तरह से ध्वस्त कर दिया था, जिस के कारण ही दिव्य शक्ति संपन्न गुरु रविदास जी महाराज का भी मनुवादी साहित्यकारों ने मनुवादीकरण करने के लिए उन के भी चालीसे लिख कर भगवान सिद्ध कर रखा है, जो सरासर झूठ हैं, वे क्रांतिकारी साधु, संत, फकीर और समाज सुधारक हैं।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदधर्म मंडल।

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