मैं+दागिन=मैदागिन चौक कांशी।।

मैं+दागिन=मैंदागिन मुझ को दाग (कलंक) लग गया।
मैदागिन चौक कांशी शहर !!
गुरु की नगरी कांशी:--- गुरु रविदास जी महाराज के प्रकाश की पवित्र भूमि कांशी नगरी है, जिसे गुरु की नगरी कहा जाए तो बिल्कुल तर्क संगत और सत्य होगा। सारे कांशी शहर का कोना कोना गुरु जी के इतिहास का हिस्सा है, जिसे मिटाने के लिए मनुवादी चापलूसों, चारणों, भाटों, साहित्यकारों, कवियों और लेखकों ने कई कुतर्कपूर्ण किस्से, कथाएँ, कहानियाँ घड़ी हुई हैं, जिन का वास्तविकता से दूर तक कोई सम्बन्ध और रिश्ता नहीं है। गुरु रविदास जी महाराज के दर्शन करने के लिए सारे संसार के शासक, बादशाह और सतपुरुष कांशी नगरी में आते थे, जिस के बारे में कांशी की धरती खुद बोलती है।
गुरु रविदास से मीराबाई का साक्षात्कार:--- चितौड़गढ़ की रानी मीराबाई पति विहीन होने पर मानसिक रूप से विक्षिप्त हो कर दुखी रह रही थी, जब उस को गुरु रविदास जी के बारे में ज्ञात हुआ था, तब वह उन के दर्शन करने के लिए पवित्र नगरी कांशी आई थी और जिस पवित्र स्थान पर उस ने गुरु रविदास जी महाराज के दर्शन किये थे, उस स्थान के भाग्य खुल गए थे, इसी कारण ये जगह भी ऐतिहासिक बन कर इतिहास के सुनहरे पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो गई है।
मिलन स्थल का नामकरण मैंदागिन:--- इतिहास की बातें शब्द ही बताते हैं। कांशी शहर में एक चौराहे का नाम मैंदागिन है, जिस का सम्बन्ध गुरु रविदास जी महाराज और मीराबाई से जुड़ा हुआ है। मनुवादी साहित्यकारों ने मैं और दागिन शब्दों की सन्धि कर के दोनों को एक कर के मैं जमा दागिन = मैंदागिन कर दिया है, जिस के कारण दोनों शब्दों की ऐतिहाासिकता और वास्तविकता को ही मिट्टी में समायोजित कर के दफन कर दिया है। कांशी शहर के इस स्थान के नाम को मनुवादियों ने बड़ी चतुराई और फितरत से *मैंदागिन* लिख डाला है ताकि किसी को भी शब्द के इतिहास का पता ही चल ना सके।
मैंदागिन शब्द की उपति:---गुरु रविदास जी महाराज के समय से ही कांशी शहर वहुत बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है, उन के समय में इस धरती का कोई भी दूसरा नाम नहीं था। काफी बड़े भूभाग में फैले कांशी शहर में आबादी भी कम ही थी मगर जहाँ जहाँ लोग रहते थे, गुरु जी वहीं जा कर मूलनिवासी गुलामों को धार्मिक ज्ञान देने जाया करते थे, इन्हीं स्थानो में से एक ऐसा स्थान है जहाँ पर मीराबाई को गुरु रविदास जी महाराज के प्रथम बार दर्शन हुए थे। वैधव्य के दंश को झेलती हुई मीराबाई इसी स्थान पर गुरु जी को मिली थी और उस ने अपने बिक्षिप्त मन को सम्भालते हुए गुरु रविदास जी महाराज को कहा था कि, हे मानसिक संतापों का शमन करने वाले गुरु जी! मैं दागिन हो चुकी हूँ! मुझे अपना संबल दे दो ताकि मैं अपने आप को संभाल सकूँ, इन्हीं ऐतिहासिक शब्दों के कारण इस स्थान का नाम भी मैंदागिन पड़ गया था, जिसे मनुवादी लेखकों ने आज तक छुपा रखा है।
मैंदागिन चौक में स्मरण पट्टिका:--- यादव मुख्यमन्त्री राज में गुरु रविदास और मीराबाई के इतिहास को समाप्त करने के लिए मैंदागिन चौक के स्थान पर शौचालय बनाने का कुकृत्य किया जाने लगा था ताकि दोनों अध्यात्मिक शक्तियों का नामोनिशान मिटा दिया जाए मगर स्थानीय महंत आचार्य भारत भूषण जी महाराज और उन के साथियों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल कर आंदोलन कर के सरकार को विवश कर दिया कि इस पवित्र चौक में शौचालय ना बनाया जाए, जिस का प्रमाण वहाँ पर स्थापित स्मरण पट्टिका बताती है, जिस पर यों लिखा हुआ है ----
                                 !!!उद्घाटन!!!
               !!श्री गुरु रविदास प्रथम उपदेश स्थल!!
                           !!!मैदागिन!!!
               मां० मृदुला जायसवाल जी महापौर
                         के कर कमलों द्वारा व
                    श्री गौरव राही (नगर आयुक्त)
                      की गरिमामयी उपस्थिति में
               श्री गुरु रविदास प्रथम उपदेश स्थली
             के नव निर्माण का उद्घाटन संपन्न हुआ।
          विक्रम संवत 2077 माघ पूर्णिमा (शुक्ल पक्ष)
             दिनांक 27 फरवरी 2021 दिन शनिवार।
संरक्षक/मार्गदर्शक
आचार्य श्री भारत भूषण दास।
श्री गुरु रविदास जन्म स्थान मंदिर।
सीर गोवर्धनपुर वाराणसी।
सहयोगी
श्री गोपाल दास यादव।
श्री निरंजन दास भारती।
मैंदागिन चौक में उपस्थित स्मरण पट्टिका नवनिर्माण का प्रमाण:---- गुरु रविदास जी महाराज और साध्वी मीराबाई के इतिहास को मिटाने के बाद आचार्य भारत भूषण जी महाराज और उन के साथियों द्वारा आंदोलन करके पुनर्निर्माण की साक्षी मैदागिन चौक में पुनर्स्थापित स्मरण पट्टिका मनुवादी छल कपट भरी मानसिकता को प्रकट कर रही है। ये पट्टिका आगन्तुकों को समझा रही है कि भारत के मनुवादी भारत के असली मूलनिवासियों के इतिहास को नेस्तनाबूद करने के लिए अपना एड़ी-चोटी का जोर लगाते आए हैं, इसीलिए गुरु रविदास जी महाराज के कार्यस्थलों के ऊपर अरबों खरबों रुपए का सरकारी बजट खर्च करके नवनिर्माण किया जा रहा है, जिसको भारत के मूलनिवासी सांसद और उत्तर  प्रदेश के विधायक आंखें बंद कर के देखते आए हैं मगर ये गुलाम अपने गुरुओं और महापुरुषों के इतिहास को बचाने के लिए कोई क्रांतिकारी कदम नहीं उठा पा रहे हैं, जिसके लिए भारत के मूलवासियों को ही मनुवादियों के साथ दो-दो हाथ करने पड़ेंगे अन्यथा भारत के मूलनिवासी महापुरुषों का नामोनिशान मिटा दिया जाएगा।
मैंदागिन शब्द की वास्तविकता खत्म कर दी गई:--- इस चौक के कोने में एक खुला चबूतरा बना हुआ है, जिस की दो दीवारों के ऊपर गुरु रविदास जी महाराज और मीराबाई की पेंटिंग मात्र चित्रित की गई हैं, जिस के अतिरिक्त वहाँ कुछ भी नहीं लिखा गया है, जिस से ज्ञात हो सके कि ये पेंटिंग क्यों लगाई गई हैं? किस कारण लगाई गई हैं? आज जो शैलानी इस चौक के बारे में देखता है, समझता और जानता है, वह केवल मैंदागिन पढ़ कर यही अनुभव करता है कि किसी ने इस चौक का ये नाम मैदागिन चौक रखा हुआ है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदि धर्म मंडल। 

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