क्रांतिकारी गुरु रविदास जी महाराज और शूरवीर का दायित्व।।

क्रांतिकारी गुरु रविदास जी और शूरवीर का दायित्व!!!!
विक्रमी संवत 1433 तक भारत के सारे इतिहास की पड़ताल की जाए तो भारत के पचासी प्रतिशत मूलनिवासियों का कोई भी ऐसा क्रांतिकारी समाज सुधारक, राजनेता, धार्मिक नेता दिखाई नहीं देता है, जिस ने यूरेशियन लोगों द्वारा गुलाम बनाए गए, भारत के मूलनिवासियों की दुर्दशा को ध्यान में रखते हुए उन के कल्याण के लिए, उन की आजादी और मान-सम्मान के लिए कोई शांतिपूर्ण या क्रांतिकारी आंदोलन शुरू किया हो, ऐसे वीर योद्धाओं की कमी के कारण इस समय तक यूरेशियन आर्य भारत के मूलनिवासियों के साथ अति क्रूरता और हैवानियत की सारी सीमाओं को तोड़ते आ रहे थे।
शोषण का दस्तावेज मनुस्मृति:---- जब से युरेशियन आर्यों ने भारत के मूलनिवासियों को छल बल से गुलाम बनाया था, उसी समय से मनुस्मृति जैसा काला संविधान बना कर लागू किया गया था, जिस के अनुसार  मूलनिवासी लोगों का शोषण करने के लिए व्यवसायों का वितरण किया गया था, जिस काम को ये लोग करते थे, उसी को ध्यान में रख कर उस की जाति का नाम भी रखा गया था, जैसे लोहे का व्यवसाय करने वाले को लुहार, लकड़ी का का करने वाले को बढ़ई, कपड़े धोने का काम करने वाले को धोबी आदि। इन दस्तकारों को कोई मौलिक अधिकार नहीं दिया गया था। ये जो भी मजदूरी करते थे, उस के बदले में केवल रोटी, छ:महीने में एक बार थोड़ा वहुत अन्न दिया जाता था, जिस के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दिया जाता था।
मूलनिवासी लोगों को सवर्ण जातियों के बंधुआ मजदूर घोषित किया गया था, जिंदा रहने के लिए केवल गला सड़ा भोजन खाने को दिया जाता था, ठीक इन के विपरीत पशुओं की तरह दिन रात काम करने के लिए बाध्य किया गया था, यदि कोई उन के कथनानुसार कार्य नहीं करता था तो उस अबज्ञा के लिए उन्हें शारीरिक, मानसिक और आर्थिक दण्ड दिये जाते थे।
गुरु रविदास जी महाराज का प्रादुर्भाव:---- विक्रमी संवत 1433 की माघ शुद्धि पद्रास को गुरु रविदास जी महाराज का कांशी में आविर्भाव बनारस में हुआ था। जन्म के समय ही उन्होंने अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रदर्शन करना शुरू कर दिया था, जब जन्म लेते समय उन को दाई भानी ने स्पर्श किया था, उसी समय उस की दोनों आंखों की रोशनी पुन:लौट आई थी, जिस दृश्य को देख कर के देश-विदेश में बालक रविदास आध्यात्मिक शक्ति का केंद्र बन गए थे। इस घटना को सुन कर धर्म के ठेकेदार ब्राह्मणों और तिलकधारियों के पांवों तले मिट्टी खिसक गई थी क्योंकि ये लोग इन्हीं चमत्कारों की कमाई से अपना पेट भरते थे। ज्यों ज्यों गुरु रविदास जी महाराज जवान होते गए, त्यों त्यों उन की अध्यात्मिक शक्तियों की गूँज सारे विश्व में फैलती गई और कांशी के ब्राह्मणों की परेशानी बढ़ती गई , जिस के कारण ब्राह्मणों की गुरु रविदास जी के साथ दुश्मनी बढ़ती गई। गुरु जी तो जातियों को तोड़ कर मानवता का संदेश देकर समरसता पैदा कर रहे थे मगर ब्राह्मणों को तो जातिवाद चाहिए था, ताकि उन की सर्वोच्चता और संप्रभुता शास्वत बनी रहे, खुद काल्पनिक देवता बने रहे मगर गुरु जी तो विद्वानों की परिभाषा बताते हुए फरमाते हैं ---
मत पूजिये विप्र जदपि गुणहीना।
पूजिये चरण चंडाल के जदपि गुण प्रवीणा।
गुरु जी के तर्क संगत सिद्धांत से ब्राह्मणों के खेमे में ज्वालामुखी विस्फोट हो गया था और उन के विरोध में सड़कों पर उतर पड़े थे। गुरु जी की क्रांतिकारी स्टेटमेंट ने ब्राह्मणों को सड़कों पर ला खड़ा कर दिया, जिस का प्रतिवाद करते हुए तिलकधारी तुलसी दास ने लिख डाला-----
पूजिये विप्र जदपि गुणहीना
मत पूजिये चरण चंडाल के जदपि गुणप्रवीणा।।
गुरु रविदास जी महाराज की तर्क से परिपूर्ण सत्य स्टेटमेंट को तुलसीदास कितनी मूर्खता से काटता है? कितना अनर्गल प्रलाप करता है? कितना वैमनस्य पैदा कर के सवर्ण और अवर्ण समाज  में खाई पैदा करता है, यही नहीं ढोल, गँवार, शूद्र, पशु, नारी का अपमान कर के तुलसीदास ने सामाजिक विषमता ही पैदा की, जिस के विरोध में आज स्वामी प्रसाद मौर्य ने धर्म युद्ध शुरू कर के सभी तिलकधारियों को चिल्लाने के लिए विवश कर दिया। गुरु जी ने जो केवल ईश्वर के नाम पर लूट मचाने वाले ब्राह्मणों की पोल खोली है, उसी का परिणाम आज सामने आ रहा है। गुरु जी सामाजिक और धार्मिक परिवर्तन लाने के लिए जान हथेली पर रख कर मूलनिवासी जनता को क्रांति पथ पर चलने की प्रेरणा देते हुए फरमाते हैं -----
सूरा तिल तिल कट जई निज मरे मन धरे न शोक।
सुन रविदास सोई शूरवीर भले तिन्हें कहेंगे लोक।
गुरु रविदास जी महाराज क्रांतिकारियों को संबोधित करते हुए फरमाते हैं, कि यदि सत्य की लड़ाई लड़ते हुए और सामाजिक परिवर्तन करते हुए, अंग अंग भी कट जाने पर भी शूरवीर को मन में दुख धारण नहीं करना चाहिए, डट कर संग्राम करना चाहिए तभी बुद्धिमान लोग ऐसे सपूतों को शूरवीर कहते हैं।
गुरु रविदास जी महाराज शूरवीर की पहचान और परिभाषा बताते हुए फरमाते हैं कि शूरवीर वही होते हैं, जो दुश्मन के साथ निधड़क हो कर युद्ध करते हुए खुद भी शहीद हो जाते हैं और दुश्मन को भी मारकाट कर विजय हासिल करते हैं, अच्छे लोग ऐसे सपूतों को ही शूरवीर योद्धा कहते हैं। गुरु जी के इस कथन से अनुमान लगाया जा सकता है कि, गुरु रविदास महाराज स्वयं भी कितने निर्भीक, निडर, क्रांतिकारी योद्धा हुए हैं।
राम सिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदिमंडल, हिमाचल प्रदेश। 

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