गुरु रविदास आदद्दुआरा **सीर गोवर्धन** कांशी!
गुरु रविदास आददुआरा **श्री सीरगोवर्धन** कांशी।।
गाँव नैपुरा से दो किलोमीटर की दूरी पर गाँव सीरगोवर्धन हैं, जो गुरु जी के इतिहास का प्रमाण प्रतीत होता है, क्योंकि इसी स्थान पर चँवरवंश के वंशज आज भी निवास करते हैं, जो आज भी वहीं नारकीय जीवन जी रहे हैं। गुरु रविदास चौक से जाने वाली सड़क से गुजरते समय सब से पहले सीर गोवर्धन स्थल आता है, उस के पांच सौ मीटर की दूरी पर लौटूं वीर मंदिर से हो कर गढ़वाघाट उर्फ गढ़ाघाट आते हैं, इन तीनों ही स्थानों का गुरु रविदास जी महाराज के जीवन और इतिहास से आत्मिक संबंध ज्ञात हो रहा है।
सीर गोवर्धनपुर का अवलोकन:--- सीर गोवर्धन की स्थिति ठीक वैसी ही है, जैसी आर्यों ने भारत के मूलनिवासियों की उस समय बनाई थी, जब उन्होंने भारत को अपना गुलाम बनाया था। आर्यों ने चँवरवंश के लड़ाकों को दण्ड स्वरूप ऐसे निर्जन स्थलों पर वसाया था जहाँ नर्क ही नर्क, नदी-नाले, गन्दगी के ढेर और मुशीबतों के फंदे लगे हुए होते थे, जिन को आज भी गाँव सीर गोवर्धन में देखा जा सकता है।
सीरगोवर्धन नामकरण:--- चँवर राज वंश उर्फ चमार वंश की नगरी सीर गोवर्धन का नामकरण शंकाओं के घेरे में घिरा हुआ लगता है, क्योंकि गोवर्धन शब्द का सीधा सम्बन्ध कृष्ण से है और इस स्थल का नाम भी गोवर्धन इसीलिए रखा गया है ताकि गुरु रविदास जी महाराज का इतिहास भ्रामक बना कर भावी पीढ़ियों को गुरु रविदास के बारे में कोई प्रमाण उपलब्ध ही ना हो सकें। जब यह गाँव ही चमार जाति से भरपूर है तो फिर गोवर्धन नाम किस तरह रखा गया है! चिंतन का विषय है?
चँवर वंश का सुनहरा समय:--- गूगल पर सर्च कर के चँवर वंश का इतिहास 1070 से ले कर 1230 तक मिलता है।
सामंत सेन :---- 1070-1095
हेमंत सेन :--- 1095-1096
विजय सेन :--- 1096-1158
वल्लाल सेन:--1158-1179
लक्ष्मण सेन :---1179-1204
केशव सेन :----1205-1225
विश्वरूप सेन:--1225-1230 तक
चँवर वंश का जिक्र हिंदुओं की पवित्र पुस्तक महाभारत में मिलता है। यही इतिहास भारत सरकार ने भी छटी कक्षा से स्नातकोत्तर कक्षाओं में भी पढ़ाया है, इसी प्रकरण से हिंदुओं की फितरत, कल्पना, झूठ और अप्रमाणिक काव्यों, महाकाव्यों, श्रुतियों, मनुस्मृतियों और अठारह पुराणों की काल्पनिकता का भांडा फोड़ होता है। यदि महाभारत अर्वाचीन होता तो उस में चँवर वंश का जिक्र तक ना होता, इसी से मनुवादी पुस्तकों की कल्पना और मिथ्यता का आभास होता है। आदपुरुष से चली पवित्र वंशावली सम्राट कैलास उन के पुत्र सम्राट सिद्धचानो जी से होती हुई चँवर वंश के चँवरसेंन के पुत्र एवम अंतिम बेताज बादशाह कालूदास उन के पुत्र संतोषदास के वीर सपुत्र गुरु रविदास जी महाराज हुए हैं।
चँवर वंश के पतन के बाद चमार जाति:---- अरब मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा चँवरवंश उर्फ चमार वंश का पतन किया गया है, जिस के बादशाह सिकंदर लोधी की नाक में दम करने वाले केवल मात्र चँवरवंश के क्रांतिकारी वीर सपूत गुरु रविदास जी महाराज हुए हैं, जब वे इस्लाम धर्म के पैगम्बर नहीं बने तब उन को लोधी ने गुस्से में आकर, गाली के रूप में चमार शब्द प्रयोग किया था, इसी काल से वीर राजपूत चँवरवंश को चमार पुकारा जाने लगा और दंड स्वरूप इस जाति को गंदे नदी-नालों के किनारे दूरस्थ पहाड़ियों की तलहटियों के बीच बसाया गया, इसी कारण गुरु रविदास जी महाराज के वंशजों को काशी गांव से दूरस्थ स्थानों पर जीवन जीने के लिए विवश किया गया था, इसी कारण सीर गोवर्धनपुर के चंवरवंशी राजपूतों को आज भी गंदी बस्ती में नर्क से भी बदतर नारकीय जीवन जीना पड़ रहा हैं।
गुरु रविदास आददुआरा सीर गोवर्धन:---- पंजाब के वीर सपूत बँता राम घैड़ा ने पंजाब के साथियों के साथ मिल कर किसी यादव से जमीन खरीद कर सीर गोवर्धनपुर में गुरु रविदास जी के इतिहास को पुनर्जीवित करने का ऐतिहासिक कार्य किया है। अधिकतर पंजाब की गुरु जी की संगत कांशी में जा कर गुरु रविदास जी की शोभा बढ़ाती है, मनुवादी सरकारों की उपेक्षा के कारण गुरु रविदास आददुआरा नाम मात्र का पूजास्थल है, जिन देवी देवताओं के काले कारनामों से रूह भी काँपती उठती है, उन के भव्य मंदिरों पर सरकारी पहरे लगे हुए हैं, अरबों रुपए पानी की तरह बहा कर ऊँचे ऊँचे भवन निर्मित किये गए हैं मगर जिस गुरु के मान सम्मान के लिए विदेशी ये कहते हैं कि,यदि गुरु रविदास जी महाराज हमारे देश में जन्म लेते तो हम उन का नाम पते पते पर लिखबा देते मगर जाति के समर्थक बेशर्म मनुवादी अल्ला, राम, रहीम, भगवान में भी भेद समझते हैं।
वहुजन समाज पार्टी के कुशासन की भी पोल खोलती बस्ती:---कांशी में निर्मित आददुआरे के पीछे चमार जाति के घरों की दुर्दशा देखने से विदित होता है कि आरक्षण के सहारे बनने वाले विधायक और सांसद आरक्षण के नाम पर कलंक मात्र ही हैं, वहुजन समाज पार्टी के कुशासन में भी इस गाँव का सौंदर्यकरण नहीं किया जा सका। जिन लोगों को गुरु रविदास जी ने तत्कालीन राजाओं, बादशाहों से लड़ कर जो अधिकार दिलाए थे, उन के राजनेता वहुजन समाज के मात्थे पर काले धब्वे ही हैं। ये लोग भी अपने सर्व श्रेष्ठवैश्व गुरु के वंशजों को न्याय नहीं दिला पाए।
सीर गोवर्धन गाँव की गलियों, घरों को देखने से ही घृणा होती है। गंदी संकीर्ण गलियों की सफाई का कोई प्रबंध नहीं है। टूटी फूटी झोंपड़ियों के बीच कराहती हुई चमार जाति के लोगों की जिंदगी राक्षस राज में तड़फती हुई देखी जा सकती। टूटे-फूटे रास्ते और घरों की फटी हुई दीवारें मनुवादी भेदभाव के नंगे नृत्य को दर्शाती हैं। मायावती के वहुजन राज में भी गुरु रविदास जी महाराज के वच्चों को न्याय नहीं मिला। वहुजन राज भी सीर गोवर्धन गाँव के वहुजन समाज के लिए कलंक ही सिद्ध हुआ है।
रामसिंह आदवंशी।
हिमाचल प्रदेश।
नोट:----- दोस्तो मेरे इस लेख को विश्व के कोने कोने में प्रेषित करें ताकि मनुवादी भेदभाव का जनाजा सारे विश्व को नजर आए।
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