गुरु की नगरी कांशी में *गुरु रविदास सदना* इतिहास।।

गुरु की नगरी कांशी में * गुरु रविदास-सदना* इतिहास!!
जब से युरेशयन आर्यों ने भारत की देवभूमि पर अपना अधिप्तय जमाया हुआ है, तभी से इस पवित्र भूमि को ग्रहण लगा हुआ है। आदि पुरुष से चली आ रही मूलभारत की सभ्यता, संस्कृति और इतिहास का नामोनिशान मिटाया जा रहा है, जिस की घृणित कड़ी में गुरु की नगरी कांशी और गुरु रविदास जी महाराज के इतिहास को नेश्तनाबूद किया जा रहा है। जो कुछ बाकी बचा हुआ है उस को भी नये नामकरण कर के बदला जा रहा है। सिंकदर लोधी को जब पता चला था कि कांशी में कोई साधु, संत, फकीर, तिलकधारी ब्राह्मणों के ज्ञान की हवा निकाल कर, उनके झूठे अडंबरों, पाखण्डों का पर्दाफ़ास कर रहे हैं, जिस से आकर्षित हो कर उसने गुरु रविदास जी महाराज की दिव्य शक्ति का लाभ उठाने के लिए योजना बनाई थी, जिस का सूत्रधार सदना कसाई को बनाया गया और उसे अपना राजदूत बना कर, गुरु रविदास महाराज के पास भेज कर इस्लाम धर्म में शामिल करने के लिए रजामंद करने का प्रयास किया था।
कांशी में सदना कसाई:--- बादशाह सिकंदर लोधी ने, सदना कसाई को बड़े विशाल लाव-लश्कर के साथ, रथ पर सवार कर के कांशी भेजा था। उन दिनों गुरु रविदास जी महाराज गंगा नदी के समीप, जहाँ आज काशी विश्वनाथ मंदिर बना हुआ है, वहाँ गुरु महाराज का प्रवचन चल रहा था, इसी स्थान पर पहुँच कर सदना ने गुरु रविदास जी महाराज के पहली बार दर्शन किए थे। और बादशाह सिकंदर लोधी का भी पैग़ाम पहुँचाया था।
गुरु रविदास के साथ सदना की भेंट:--- गंगा नदी के किनारे गुरु रविदास जी महाराज को झुक का अदाब बुला कर सलाम करते हुए सदना ने गुरु महाराज को दण्डवत  बन्दना की और एक किनारे पर बैठ गया, जिस का वर्णन स्वामी ईशस दास जी महाराज ने गुरु आदि प्रगास ग्रंथ के पृष्ठ संख्या ६८४ पर बड़े मार्मिक शब्दो मरण किया है ------
दोहा।
सिकन्दर लोधी पातशाह हुकूमत उसले जान।
दीन इस्लाम दे फ़िरंन उपदेशी करते मुसलमान।।
श्री रविदास जी कबीर साहिब बक्त उसे होई।
हुकूमत शाह सिकन्दर दी प्रगटे सी जब दोई।।
इक तां शतरु छत्री ब्राह्मण दूसरा है इस्लाम।
शरदूल दोहाँ में गरजदे खड़ग नाम कतलाम।।
हिंदुआँ नूं अंधे आखदे काणे सभ मुसलमान।
गियानी दोहाँ तउ सिआणा आखन एह बखिआन।।
मगध देश प्रचार कबीरा कालीचूर श्री रविदास।
नयमी शारंण सदना पीर मध गोष्ट होई खास।।
सदना को विशेष मेहमान की तरह समझ कर गुरु महाराज ने उस का स्वागत करवा कर और उस के आने का लक्ष्य पूछा था, तब सदना स्वामी ईशर दास जी महाराज के शब्दों में कहता ---
शब्द।।
मंन दीन इस्लाम नूं रविदासा एहो जिहा मखलू ना अनमोल कोई।
फ़ासमा बजहूला दसदा ऐ ऐसी बसत ना जग अंनतोल कोई।। कुरान आया बारगाह खुदादी चों पढ़ कलमा ना होर टोल कोई। मसीत मन लै घर खुदा दा पढ़ अल्ला अल्ला नमाज बोल सोई।।
गुरु रविदास सदने को उतर देते हुए फरमाते हैं ---
श्री गुरु रविदास जी।।
बुतखाने खुदाई ना ही राम ठाकर दुआरे।
क़ाबे गंग बनारसी गुरु बिन पच पच हारे।।
मसजिद माहे खालक गुसल करेबत नाहें।
राम ना तिलक लगाकर ठाकर दुआरे आहे।।
सदना का आग्रह:----
शब्द ना पीर आखे रविदास ताइं वक्त हथ इस्लाम वाला आँऊना नहीं।
सची आन  मसीत असमान चौथे उथे बिन मुहम्मद ते जाना नहीं।।
हजरत गए मोहम्मद असमान सतमें सिफारिश उन्हाँ दी बिना छुडाना नहीं।।
दुख दोजक दे विच सोग कण जो रसूललिइला ते बाझ मकाउना नहीं।।
गुरु रविदास सदना को समझाते हुए फरमाते हैं --- गुरु रविदास जी संदना पीर को समझाते हुए फरमाते हैं, कि हे सदना! तू चार और सात आसमानों की बातें कर रहा है, लाखों आसमानो के ऊपर कोई नहीं शहर है, जहां कोई सुख दुख नहीं होता है, जहां किसी की भी कोई सिफारिश नहीं चलती है और ना ही वहां कोई सच्ची सरकार का दरबार लगा हुआ है। सुन! लाखों-करोड़ों मोहम्मद और विष्णु-ब्रह्मा अच्छे कर्मों के बिना कभी पार नहीं लगते हैं, इसी धरती पर सच का न्याय होता है, यहीं ईश्वर का निर्णय होता है।
सदना द्वारा रूह के बारे में जानना:--सदना ने गुरु के अंर्तमन को समझते हुए अल्ला और रूह के बारे में गुरु रविदास जी महाराज से जानने की कोशिश की। गुरु महाराज ने सदना को बड़े प्यार और शालीन ढंग से बताया, कि अल्ला ही आदमी की रूह में समाया हुआ है, वह अजन्मा, अजर, अमर, अदृश्य, अगोचर, निराकार, निरंजन, निर्विकार, अपरम्पार प्राणी जगत के अंतर्मन में विद्यमान है। गुरु महाराज के अलौकिक उद्बोधन को सुन कर सदना के होश हबास उड़ गए, जो गुरु रविदास जी महाराज को इस्लाम धर्म का पाठ पढ़ाने आया था, वही आदधर्म की मूल और आदर्श भावना को सुन कर आश्चर्यचकित हो गया। जब गुरु महाराज ने तोहि मोहि, मोहि तोहि अंतरू कैसा?  का व्याख्यांन दिया तो उस आलौकिक भावार्थ को सुन कर सदना के इस्लाम का नशा उतर गया और गुरु महाराज के चरण कमलों पर शीश झुका कर आत्म समर्पण कर दिया था।
गुरु बन्दना और दीक्षा की फ़रियाद:--- गुरु रविदास जी की धार्मिक शक्ति का लोहा मान कर सदना विवश हो गया, कि मैं सच्चे पीर के पास पहुँच गया हूँ, जिस विवशता के कारण उस ने निर्णय ले लिया कि मुझे धार्मिक बंधनों को त्याग कर सतगुरु को ही अपना गुरु स्वीकारना चाहिए, इसी कारण उस ने गुरु रविदास जी महाराज से गुरु दीक्षा ले कर, दिल्ली आ कर बादशाह सिकन्दर लोधी को अपनी गाथा सुनाई थी।
गुरु रविदास महाराज और सदना का स्थल गायब:--- जिस स्थान पर गुरु रविदास जी और सदना की ये ऐतिहासिक गोष्ठी हुई थी, उस स्थान पर मनुवादियों ने तेती करोड़ देवता बैठा कर गुरु रविदास जी महाराज को थोड़ी सी जगह छोड़ कर विशाल काशी विश्वनाथ मंदिर बना कर मनुवादी पहरा लगा रखा है ताकि गुरु रविदास जी महाराज के वास्तविक इतिहास के बारे में कोई भी जान ही नहीं पाए, कि कभी यहां पर कोई सतपुरुष इकठ्ठे हुए थे और मुसलमान सदना गुरु जी के समक्ष हार कर वैश्विक आदधर्म का अनुयायी बन गया था, मगर जब आदपुरुष का डंडा चलेगा तो फिर ये छल कपट, फितरत, कूटनीति किसी काम के नहीं रहेंगे।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदि धर्म मंडल। 

Comments

Popular posts from this blog

गुरु रविदास जी की क्रांतिकारी वाणी दोधारी है।

क्रांतिकारी शूरवीर गुरु रविदास जी महाराज।।

उत्तर प्रदेश में चल रहा बुलडोजर।