गुरु रविदास जी की जन्म स्थली मांडबडिह।।
गुरु रविदास जी की जन्म स्थली मांडवडिह।।
गुरु रविदास जी महाराज का जन्म एक सुसंपन्न परिवार में हुआ था। आदिकाल से चली आ रही वंश रंपरा नके अंत में गुरु रविदास जी महाराज ने चँवरवंश के राजपरिवार के तत्कालीन सुप्रसिद्ध व्यापारी कालूदास के पुत्र संतोषदास के घर मे अवतार लिया था। स्वामी ईशरदास महाराज गुरु आदि प्रकाश ग्रंथ में फरमाते हैं, कि कालूदास जी कपड़े और चमड़े के उरद्योग के वहुत बड़े उच्च कोटी के व्यापारी थे, उन के प्रोडक्ट विश्व के देशों में निर्यात किये जाते थे, चमड़े के ओवर कोट, जैक्ट, बैलट, मस्कें, वच्चों के खिलौने, हाथी, शेर, नेवले आदि उन के कारखानों में बनते थे, ऐसे संपन्न जस्सल गोत्र में गुरु रविदास जी महाराज ने जन्म ले कर जीवनयापन किया था।
सम्मत 1433 तक तीनों वर्णो की दशा:--- गुरु रविदास जी के अवतार तक, वर्ण व्यवस्था ने तीनों वर्णों को ब्राह्मणों को गुलाम बना कर रखा हुआ था। मनुस्मृति नामक काला संविधान पूरी तरह कढ़ाई के साथ लागू था, राजपूत केवल दुश्मन के साथ लड़ते-लड़ते मर सकता था, परंतु पढ़-लिख नहीं सकता था ताकि कहीं पढ़-लिख कर के राजपूत लोग समझदार ना हो सकें, इसलिए ब्राह्मणों ने राजपूतों को भी केवल शस्त्र विद्या सीखने तक ही सीमित कर रखा था। वैश्य जाति को केवल अंकगणित सीखने का अधिकार था, ताकि वे अपने व्यापार के लेनदेन का केवल मात्र हिसाब किताब रख सकें, परंतु ये संपन्न जाति भी पढ़-लिख कर के उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकती थी, यदि राजपूत और वैश्य अपना कार्य ईमानदारी से नहीं करते थे तो उन के लिए भी मनुस्मृति में दंड व्यवस्था की गई थी और राजा उन को दण्डित करता था, परंतु चौथे वर्ण शूद्र के लिए किसी प्रकार का कोई मौलिक अधिकार नहीं लिया गया था, जिस के कारण केवल ब्राह्मण, राजपूत और वैश्यों तीनों वर्णों की केवल गुलामी ही कर के उन की सेवा कर सकते थे। पढ़ने, लिखने और बोलने पर शूद्रों के नाक, कान, मुख बर्बाद कर दिए जाते थे। युरेशयन लोग इतने निर्दयी और अत्याचारी थे कि अपनी विधवा औरतों को सति के नाम पर जिंदा जला दिया करते थे, ऐसे काले युग में गुरु रविदास जी का धरती के ऊपर प्रकाश हुआ था। गुरु जी के जन्म तक कोई भी राजपूत और वैश्य अपनी गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए आवाज तक बुलंद नहीं कर सकता था, केवल मात्र युद्धों में दुश्मन को मारते मारते खुद भी मरना ही राजपूत का धर्म था, इसलिए इन काफर लोगों ने राजपूतों के लिए लिखा है---
बारह वर्ष लै कुकर जिये, तेरह वर्ष सियार।
अठारह वर्ष क्षत्रिय जिये आगे जीने को धिक्कार।।
उपरोक्त दोहे से युरेशयन आर्यों की फितरत साफ जाहिर होती है कि भारत में राजपूत ही राज करते थे मगर राजपूतों को भी केवल अठारह वर्ष तक जिंदा रहने का अधिकार था, उस के बाद वच्चा समझदार हो कर अपनी इच्छानुसार राजकीय निर्णय लेने से पहले ही राजकुमार को दूसरे राजकुमार के साथ राजकुमारी को हथिईयाने और सीमा का अतिक्रमण के बहाने लड़ा लड़ा कर मार दिया जाता था और ब्राह्मण मंत्री बालक राजकुमार को गद्दी पर बैठा कर राज चलाते थे।
गुरु जी के जन्म तक कोई समाज सुधारक नहीं था:--- गुरु जी के जन्म तक एैसा कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता है कि कोई राजपूत, वैश्य और शूद्र उच्च शिक्षा प्राप्त करके महान पुरुष और समाज सुधारक बना हो।
प्रथम क्रांतिकारी समाज सुधारक गुरु रविदास जी:-- गुरु रविदास जी महाराज ने ही सब से पहले ब्राह्मणों के संविधान मनुस्मृति को ललकारा और फटकारा था और उस के खिलाफ बगावत कर के क्रांतिकारी आंदोलन शुरू किया था, जिस के फलस्वरूप राजपूतों और वैश्यों में भी सामाजिक क्रांति की चिंगारियां सुलगने शुरू हुई थी।
शूद्रों का सामाजिक जीवन:--- वर्तमान अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जाति के लोगों के जीवनयापन से यह स्पष्ट हो जाता है, कि यूरेशियन आर्यों ने शूद्रों को जहां शिक्षा से वंचित रख कर पशुओं की तरह प्रयोग किया था, वहीं इन लोगों को ऐसे स्थान पर रखा जाता था जहां मनुवादियों द्वारा गंदगी के ढेर लगाए हुए होते थे, जिस की दुर्गंध से इन लोगों के मस्तिष्क डेड होते रहते थे, ये स्थान अधिकतर पहाड़ियों के अंत में या नदी-नालों के किनारों पर हुआ करते थे। यहीं पर उन की झुग्गी झोपड़ियां हुआ करती थी जिसका प्रमाण गुरु रविदास जी की बस्ती मंडुवाडीह आज भी देखी जा सकती है। यह बस्ती वरुण और अस्सी नालों और गंगा नदी के किनारे पर स्थित है जिस में आज भी सारे काशी शहर का गंदा पानी बहता है और दिन-रात वहां से दुर्गन्ध चली रहती है, जिससे मन-तन और मस्तिष्क विकृत होते रहते हैं।
मांडबडीह का इतिहास:--- कानपुर निवासी रामचंद्र कुरील ने अपनी पुस्तक में मांडव धार का जिक्र किया है, वह मांडव वर्तमान मांडवडीह स्थान है, इसी स्थान पर गुरु रविदास जी महाराज का जन्म हुआ था परंतु मनुवादियों ने गुरु जी के जन्म स्थान को विवादास्पद बना रखा है। कोई उन्हें सीरगोवर्धन में अवतरित हुआ बताते हैं, कोई मांडबडिह में, परंतु उन के जन्म स्थानों के वास्तविक रिकॉर्ड को देखने पर यह स्पष्ट हो रहा है, कि सीरगोवर्धन की धरती यादव लोगों के पास थी, जिस को पंजाब प्रदेश के रेल कर्मचारी बंताराम घेड़ा ने खरीदा था और उन्होंने उस खरीदी हुई जमीन को गुरु रविदास जी का जन्म स्थान सिद्ध किया है परंतु वर्तमान साक्ष्यों और दंत कथाओं को अगर देखा और सुना जाए तो गुरु रविदास जी के वंशज और जस्सल गोत्र के परिवार मांडवडीह में ही रह रहे हैं, जहां पर एक भव्य गुरु रविदास मंदिर बनाया गया है, जिस की देखभाल पुजारी प्रभु प्रसाद कर रहे हैं, वे एक रेल कर्मचारी भी हैं, यह सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति बताता है कि मैं गुरु रविदास जी महाराज की पवित्र जन्म स्थली पर रह कर गुरु रविदास जी की विचारधारा का प्रचार प्रसार करता आ रहा हूं और नौकरी इसलिए करता हूं ताकि अपने हक हलाल की कमाई से अपना पेट पाल सकूं और जो चढ़ावा चढ़ता है, उस से मैं गुरु रविदास जी के मंदिर को उच्च स्तर का बनाने का प्रयास करता आ रहा हूं।
रामसिंह आदवंशी।
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