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Showing posts from July, 2021

।। मृग मीन भृंग पतंग कुंचर।।

  ।। मृग मीन भृंग पतंग कुंचर।।              ।।राग आसा।। गुरुओं के गुरु, गुरु रविदास जी महाराज ने राग आसा में वैज्ञानिक आधार पर तर्कसंगत चिंतन करते हुए प्राणी जगत की रचना, विकास और विनाश का वास्तविकता चित्रण निम्नलिखित तुक में किया है। मृग मीन भृंग पतंग कुंचर, ऐक दोख बिनास।। पंच दोख असाध जा महि, ता की केतक आस।। १।। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि हिरण, मछली, भ्रमरा, पतंगा और हाथी केवल एक ही रस का स्वाद लेते हैं, एक रस की बुराई ही इन प्राणियों नष्ट कर देती है। हिरण को शिकारियों की हेड़े की ध्वनि सुनने से कान रस, मछली को कांटे में जकड़े हुए भोजन को देख उस की जीभ में जिव्हा रस, भ्रमरे को फूल सूंघने के कारण नाक रस, पतंगे को दीपक की लौ देख कर नेत्र रस, हाथी को गड्ढे के ऊपर कल्पित हाथिन की तस्वीर दिखाने पर कामवासना रस ही मौत के मुंह मे ले जाया करते हैं अर्थात एक एक बुराई के कारण ही इन प्राणियों का विनाश हो जाता है। मगर जिस आदमी के बीच पांच असाध्य विकार अर्थात काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार के कारण कान रस, जीभ रस, नाक रस, र...

।। स्तजू सतु तेता जगी।।

                ।।सतजुग सतु तेता जगी।।                  ।।राग गौड़ी वैरागण।। गुरु रविदास जी महाराज ने हिंदू धर्म ग्रंथों की चीर फाड़ कर कर के तार-तार कर दिया था। ब्राह्मणों ने तेती करोड़ देवी देवताओं का निर्माण कर के उनके बीच विष्णु को सर्वश्रेष्ठ अवतार घोषित किया हुआ है। वह बार-बार भिन्न-भिन्न नामों से जन्म लेता रहता है। ब्राह्मणों ने ही काल विभाजन करके समय को भी चार भागों में बांट कर के इन का नामकरण सतियुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग रखा हुआ है। ऐसा काल विभाजन विश्व के किसी भी देश में नहीं हुआ है और ना ही विश्व के किसी विद्वान ने इसे मान्यता दी हुई है।ब्राह्मणों ने काल विभाजन कर के तप, तपस्या, भक्ति, साधना के रंग ढंग, विधि विधान भी हर युग में अलग-अलग निर्धारित किये हुए हैं, जिन का कोई तर्कपूर्ण आधार नहीं है। सतियुग : सतियुग में तिलकधारी ब्राह्मण ही शिक्षा ग्रहण करेंगे और पूजा पाठ में कुतर्कपूर्ण कथाएं लोगों को सुना, सुना कर यज्ञ कर के द...

कूप भरियो जैसे दादिरा।।

          ।।कूप भरियो जैसे दादरा।।                ।।गौउड़ी पूर्वी।। गुरु रविदास जी महाराज ने पिछले शब्द में, (मैं राम नाम धन लादिया, विखु  लादी संसारी) स्पष्ट कर दिया है, कि मैं ने अमूल्य राम नाम का धन अपनी गाड़ी में भरा हुआ है, बाकी सभी ने अपने छकड़े विष से ही भर रखे हैं। केवल मैं ही ज्योतिर्ज्ञान का परिपूर्ण अनुभवी व्यापारी हूं और जो जो लोग ईमानदार, सत्यनिष्ठ, जिज्ञासु हैं, आध्यात्मिक विचार रखते हैं, वही मेरा सामान खरीद कर सच्चा व्यापार कर सकते हैं, मैं उन को सच्चे व्यापार का भेद भी समझा सकता हूँ। गुरु महाराज ने देश विदेश में भ्रमण कर  के यह अनुभव किया था, कि सभी धर्मों के बफादार फरमाबरदार, नेतृत्व करने वाले खुद ही पथभ्रष्ट हैं, खुद ही अपने पिछलगुओं को दया के पुजारी नहीं बना सके, आए दिन ये हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, यहूदी, पारसी, आपस में खून खराबा करते रहते हैं, एक दूसरे का बड़ी बेदर्दी से कत्लेआम कर के, दूसरों को अपना गुलाम बनाने के लिए दिन रात अपनी क्रूर बादशाहत क...

।।घट अबघट डूगर घना।।

          ।। घट अबघट डूगर घना।।          ।। राग गौउड़ी बैरागण।। सारे संसार में अनेकों धर्म हैं मगर किसी भी धर्म के अवतार और पैगंबर ने यह दृढ़ विश्वास के साथ नहीं कहा है, कि मैं अकेला ही दिव्य ज्ञान का स्रोत हूं। अकेला ही ज्योतिर्ज्ञानी हूं मगर गुरु रविदास महाराज ने कहा है, कि मैं ज्योतिर्ज्ञान का स्वामी हूं और मेरा ज्ञान का उद्योग है, जिस के उत्पादों का विक्रेता भी हूं। विश्व में कोई भी ज्ञानी ऐसा दावा नहीं कर सका है। गुरु जी के इस कथन की प्रमाणिकता निम्नलिखित शब्द से होती है:--- "घट अबघट डूंगर घना, इक निर्गुण बैलु हमार।।" गुरु रविदास जी महाराज शरीर को धरती के समान मानते हैं, जिस प्रकार धरती के ऊपर अनेकों नदी, नाले, ऊंचे-नीचे, पर्वत, पहाड़, उन के बीच गहरी और खूनी जोतें (घाटियां)  हैं, जिन में से मानव के लिए गुजरना खतरे से खाली नहीं है। गुरु जी फरमाते हैं कि केवल मॉनव के  शरीर के बीच ही कई प्रकार की दुश्वार घाटियां हैं, जिन की उबड़ खाबड़, ऊँच नीची, गहरी खाईयों में से गुजरना मृत्यु को संदेश भेज कर मृत्यु को बुलाना है। गुरु जी फ़रमात...

बेगमपुरा शहर को नांऊँ।।

            ।।।बेगमपुरा शहर को नांऊँ।।              ।।राग गौड़ी गुआरेरी।। गुरु रविदास जी ने संसार में फैली हुई तानाशाही गुंडागर्दी, माब्लिंचिंग, छल कपट अत्याचार कत्लेआम, छुआछूत, ऊंच-नीच, काले, गोरे के भेदभाव का मुख्य कारण यही अनुभव किया है कि, इन समस्याओं का केवल मात्र धरती का बंटवारा ही है। कुछ शैतान लोगों ने धरती को टुकड़ों में विभाजित कर रखा है, जिस से धरती खण्ड खण्ड हो गई है और उसके स्वयंभू मालिक अमीर भूमालिक राजा, महाराजा, बादशाह बन बैठे हैं। ये लोग अपने अहंकार के कारण प्रजा को दुखी करते हैं, युद्धों में मारते हैं, आदमी को आदमी का गुलाम बना कर रखते हैं, जिस के स्थाई हल के लिए उन्होंने सारे देशों की सीमाओं को समाप्त कर के, केवल एक शहर विकसित करने का नियम प्रस्तुत किया है। जिस के तहत नए विश्व शहर का नाम बेगमपुरा रखा गया है। बेगमपुरा का अर्थ है, वह स्थान जहां गम नहीं होता है, सभी लोग सुख, शांति और आनंद से रहते हैं। गुरु जी बेगमपुरा का रोड मैप बताते हुए कहते हैं:--- बेगमपुरा ...

मेरी संगति पोच सोच दिन राति।।

  ।।मेरी सँगत पोच, सोच दिन राति।।                  ।।राग गौउड़ी।। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि गौड़ी राग स्नेह, दया और ईश्वर भक्ति की भावना से ओतप्रोत राग है, इसलिए इस राग में भक्ति भाव का समावेश है। गुरु जी भारतीयों की दयनीय दशा को देख कर उन के दुखों को दूर करने के लिए संघर्षरत थे, जातीय, धार्मिक, सामाजिक भेदभाव से असहाय सँगत उद्धार के लिए दिन रात प्रयास करते जा रहे थे, जिससे ब्राह्मण बड़े ही चिंतित और दुखी थे, क्योंकि गुरु रविदास जी  सामाजिक समानता के लिए धर्मयुद्ध कर रहे थे जो ब्राह्मणों को रास नहीं आ रहा था, जिस के कारण वे आए दिन झूठे आरोप लगा कर गुरु जी को मुकद्दमों में उलझाते रहते थे, गुरु जी इन्हीं गिरिजनों को ऊपर उठाने के लिए आदपुरष से अर्ज करते हुए फरमाते हैं:--- मेरी संगति पोच, सोच दिनु राती।। मेरा करमु कुटिलता जनमु कुभाँति।।१।। गुरु रविदास जी महाराज बड़े स्वाभिमान से कहते थे, कि मैं खलास चमार हूं, फिर कोई उन्हें कहे की गुरु जी फरमाते हैं, कि मैं नीच हूँ, मेरी जाति और संगत नीच ल...

तोही मोही मोही तोही अंतरु कैसा।।

 ।। तोही "मोही मोही" तोही अंतरु कैसा।।               ।। सीरी राग।। तोही मोही मोही तोही अंतरु कैसा।।। कनक कटक जल तरंग जैसा।। जउ पै हम न पाप करंता आहे अनंता।। पतीत पावन नामु कैसे हुंता।।१।। रहाउ।। तुम जु नाइका अछहु अंतरजामी।। प्रभ ते जनु जानीजे जन ते सुआमी।।२।। शरीर अराधै मो कउ बीचारु देहू।। रविदास सम दल समझावै कोऊ।।३।। गुरुओं के गुरु, गुरु रविदास जी ही विश्व में, ऐसे गुरु, पीर, पैगंबर, साधु, ज्ञानी संत हुए हैं जिनका कोई भी विश्व में सानी नहीं है, ना ही कभी भी होगा। किसी ने भी उनके समान अध्यात्मिक वाणी की रचना नहीं की हुई है और ना ही भविष्य में भी कोई ऐसी वाणी की रचना कर सकेगा। आत्मा और परमात्मा के बारे में अनेक टीकाकारों ने, कई साधुओं, संतों, विचारकों की वाणी की व्याख्या की हुई है, मगर आज तक गुरु रविदास जी की वाणी की तर्कसंगत तर्कपूर्ण व्याख्या किसी भी माई के लाल से नहीं हो सकी है, केवल पंजाबी लेखक प्रोफेसर दितसिंह और प्रोफेसर लालसिंह जी ने ही गुरु रविदास जी की वाणी की व्याख्या और सरल अर्थ लिखने का सफल प्रयास किया है, जब कि अन्य कोई भी बुद्धिमान बु...

।।। बेगमपुरा शहर।।।

                ।।। बेगमपुरा शहर।।। ज़िंदगी सुखों और दुखों का नाम है। यदि सुख ही सुख जीवन में मिलें तो भी आदमी महसूस नहीं करता है कि, मैं सुखी हूँ मगर जब वही आदमी दुखों के चाबुक की मार खाता निरन्तर खाता रहता है, चिकित्सालयों के चक्कर काटते है, हाय हाय करते हुए दुखों को झेलते हैं, सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक अत्याचार सहन करता रहता है, तब पता चलता है कि, दुख क्या होता है? सुख क्या होते हैं? जब तक भारत में आदपुरष के वंशजों का शासन रहा, तब तक तो भारत में सब कुछ ठीक  चलता रहा, कोई सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक दुख और अत्याचार नहीं था, मगर जब से यूरेशियन लुटेरों ने छलबल से सत्ता छीनी हुई है तब से ही भारतवर्ष और भारत के मूलनिवासियों की अस्मिता को ग्रहण लगा हुआ है। बांटो राज करो की नीति पर यूरेशियन आर्य भारतीय जनता को पांच हजार सालों से आपस में लड़ा झगड़ा कर भारत को अवनति के गर्त में धकेलते आ रहे हैं, जिस के खिलाफ अगर आज से छः सौ साल पहले किसी ने आवाज बुलंद की थी, तो वे थे गुरुओं के गुरु "गुरु रविदास जी महाराज।" ग...

।।। वैश्विक सरकार।।।

                ।।।वैश्विक सरकार।।। धरती के अस्तित्व में आने पर, आदपुरष ने जब सृष्टि की रचना कर के जीव जगत को होंद में लाया था, तब सभी प्राणी समरस हो कर जीवन व्यतीत करते थे। कहीं कोई सीमा नहीं थी, कोई आपस में लड़ाई झगड़ा नहीं करता था, यहां तक की हिंसक पशु और जानवर भी किसी दूसरे को मार कर अपना शिकार नहीं बनाते थे, मगर ज्यों ज्यों प्राणी विकसित होता गया, त्यों त्यों वह स्वार्थी, दंभी, लालची, महत्वाकांक्षी, अहंकारी और अत्याचारी बनता गया, जिसके परिणाम स्वरूप आज सारी धरती सीमाओं की रेखाओं से घिरी हुई देखी जा सकती है। असंख्य सीमाओं के ऊपर, असंख्य सेना अस्त्र शस्त्रों से लैस हो कर खड़ी है, मानव मानव के खून का प्यासा बनकर एक दूसरे को अपना गुलाम बनाने के लिए दिन रात प्रयास करता आ रहा है, जिसके लिए कई प्रकार के हथियार तैयार करता आ रहा है। मानव ने मानव को अपना गुलाम बना कर, उस का खून चूसने का व्यापार शुरू कर रखा है। कबीर साहिब फ़रमाते हैं कि सभी कुदरत के बन्दे हैं, चाहे वे भले हों, चाहे मंदे मगर हैं बन्दे जिन का मालिक एक ही है। कुछ अहंकारी लोग तानाशाह बन बैठे...

।। गुरु रविदास जी महाराज।।

 ।।मिलत पिआरो प्राणनाथ कवन भगति ते।। साध सँगत पाई परम गते।।रहाउ।। विश्व में अगर सत्य पर आधारित, कर्म को महत्व देकर, सँगत को सन्मार्ग पर चलने का संदेश अगर किसी ने दिया है, तो केवल और केवल चँवरवंशी गुरु रविदास जी महाराज ने ही दिया है। सभी बुद्धिजीवी, विद्वान इतिहास के पन्नों को जांच पड़ताल कर देख सकते हैं कि, सभी महापुरुषों ने, मानव जाति को, ईश्वरीय भय से भयभीत किया हुआ है, आत्मा परमात्मा के सम्बधों में उलझाया हुआ, चौरासी लाख योनियों के मानसिक तनाव में जीने के लिए विवश किया हुआ है। मानव को पुनर्जन्म के शिकंजे में बुरी तरह से कसा हुआ है, जिस के कारण मानव घुट घुट कर जीता आया है, ये मानसिक आतंक भारत के तिलकधारियों ने अधिक फैलाया हुआ है, जिस का विध्वंस अगर किया है तो केवल गुरु रविदास जी महाराज ने अपनी वाणी की तलवार से ही किया है। प्राणनाथ कब भगति से मिलते:---गुरु रविदास जी महाराज, पाखंडी ब्राह्मणों के कपट से सने हुए उपदेशों से वहुत ही व्याकुल लगते हैं। वे फरमाते हैं कि ब्राह्मण का कथन है कि, प्राणों के स्वामी अर्थात आदपुरष केवल कठोर भगति से ही मिलते हैं, भगवान के दर्शन तभी होते हैं जब मनु...

तत्त्व सिद्धांत।। भाग दस।।

 ।। तत्त्व सिद्धांत भाग दस।। लेखक:--प्रोफेसर लालसिंह।। गतांक से आगे:--- रविदास भणे जो जाणे सो जाण।। संत अनंतहि अंतर ना ही।।४।। २।। गुरु रविदास जी महाराज के कहने का भावार्थ है कि जो प्रभु को जान लेता है अर्थात अपने शरीर (पदार्थ) को शक्ति के बीच तबदील कर लेता है तब वह महाशक्ति पारब्रह्म (प्रभु) ही बन जाता है इसलिए शक्ति और महाशक्ति एक ही हैं, कोई अंतर नहीं है। स्पष्ट है कि गुरु रविदास जी ने E= mc वर्ग सिद्धांत को अमली रूप में प्रकट कर दिया था। आइंस्टाइन ने सवा छः सौ साल पीछे इस सिद्धांत को प्रत्यक्ष रूप के बीच सही सिद्ध किया है। बस यहां पर ही नहीं हुई है, गुरु रविदास जी ने अपनी वाणी के बीच शरीर को शक्ति के बीच तब्दील करने का भाव मनुष्य की प्रभु को प्राप्त करने की विधि को भी दृढ़ की है। चित सिमरनु करउ नैन अविलोकनो।  सरवन वाणी सुजस पूरी राखउ।।  मनु सो मधुकर करउ चरण हिरदे धरउ। रसनु अमिरत राम नाम भाखउ।।१।।  मेरी प्रीत गोविंद सिंउ जिनी घटै।। मैं तउ मेली महंगी लई जिअ सटै ।।१।।रहाउ।। साध संगति बिनु भाऊ नहीं उपजै। भाव बिनु भगति नहीं होई तेरी।।  कहै रविदास इक वेनती हरि सिउ...

।।तत्त्व सिद्धांत।। भाग दस।।

  सटीक वाणी श्री गुरु रविदास जी और तत्त्व सिद्धांत।।                  ।।भाग नौ।।       ।।लेखक प्रोफेसर लालसिंह।।         ।।सृष्टि सृजन का सिद्धांत।। गतांक से आगे। इस शब्द के बीच कई सिद्धांतों का सृजन संभव हुआ है। गुरु रविदास जी के इस शब्द के बीच एक ओंकार "सोहम" का सिद्धांत मूर्तिमान होता है और "सोहम" से ही सृष्टि के सृजन का सिद्धांत प्राप्त होता है। इस शब्द की पहली तुक के पहले लफ्ज से ही गुरुजी स्पष्ट कर देते हैं कि "पारब्रह्म एक ही है।" तोही एक वचन है और अर्थ होता है, पारब्रह्म एक ही है, इसी तुक का दूसरा लफ्ज मोही है और अर्थ होता है "मैं" भाव, पारब्रह्म की अंश, जीवात्मा। इस तरह पहली तुक का अर्थ स्पष्ट हो जाता है कि परमात्मा और जीवात्मा एक ही हैं। कोई भी भेद नहीं है।, यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है, कि यह जीव आत्मा विकारों से मुक्त हुई आत्मा नहीं है, बल्कि ये जीवात्मा तो अभी विकारों के प्रभावों के बीच आई ही नहीं। अभी तक यह कंज कवारी जीव आत्मा...

।। तत्त्व सिद्धांत।। भाग नौ।।

         ।।तत्त्व सिद्धांत भाग नौ।।       ।।लेखक प्रोफेसर लालसिंह।।                  ।। राग सिरी।। तोहि मोहि मोहि तोहि अंतरु कैसा। कनक कटक जल तरंग जैसा। जउ पै हम न पाप करन्ता, अहे अनन्ता। पतित पावन नामु कैसे हुन्ता।।१।। रहाउ।। तुम जु नाईक अछरू अंतरजामी।। प्रभ ते जनु जानीजै, जन ते सुआमी।।२।। सरीरू अराधे मो कउ बीचारु देहु।। रविदास समदल समझावै कोऊ।।३।। पद अर्थ:---तोहि-तुम, आप, पारब्रह्म। मोहि मैं, पारब्रह्म की अंश, जीव। अंतर- भेद, फर्क। तोहि- मोहि, मोहि-तोहि, सृष्टि सृजन से पहले भी पारब्रह्म (तोहि) सुन्न समाधी के बीच था और सृष्टि समेटने के पीछे भी पारब्रह्म (तोहि) सुन्न समाधी के बीच लीन हो जाता है। इस आधे तुक के बीच पहले 'तोहि' है और अंत में भी तोहि है।सो आरंभ और अंत में 'तोहि' ही है और मध्य के बीच में पारब्रह्म का सृजन उस की अंश जीव (मोही) है। सो आरंभ, मध्य और अंत के बीच पारब्रह्म ही है। फिर अंतर केहा- फिर भेदभाव किस प्रकार का?  कनक- सोना। कटिक- कड़ा। जल- पवित्र, पानी। "जल" शब्द का प्रयोग इत्तफाक से ह...

तत्व सिद्धांत भाग आठ।।

 ।।तत्त्व सिद्धांत भाग आठ।। गतांक से आगे:---शलोक का अंतरीव (अंतरिम) विचार विधान।। इस श्लोक की पहली पंक्ति में हरि का मुख्य रूप के बीच उल्लेख कर के उसके महत्व को दृढ़ किया गया है, जबकि नर जीव अतीत के बीच विचार रहा है परन्तु जीव के क्रम को अतीत के बीच नहीं रखा गया है, बल्कि बड़े शक्तिशाली ढंग के साथ, स्पष्ट रूप में उभार कर प्रभु के साथ जीव के संबंधों को उसके कर्म अनुसार सृजन किया गया है, इस तरह इस पंक्ति के बीच जानबूझ कर पारब्रह्म-परमात्मा और उसकी अंश आत्मा का गहरा और अटूट संबंध दृढ़ किया गया है और समझाया गया है कि अपने पिता-परमात्मा को त्याग कर भाव कूड़ के प्रसार के साथ मलिन होकर जीवात्मा के लिए बख्शिश संभव नहीं है।  दूसरी पंक्ति के बीच, पहली पंक्ति के अतीत के बीच भी विचरण कर रहे 'वे नर' को अतीत के बीचों बीच निकाल कर मुख्य रूप में सामने रख कर उभारा गया है, इस तरह पहली पंक्ति के बीच निरूपित कूड़ के बतीरे को स्पष्ट किया गया है, कि पारब्रह्म-पिता के साथ जीव संबंध तोड़ कर सीधा नर्क को ही जाएगा, यह अटल सच्चाई है। ------–----------------------------------------------- ।।शलोक के अर्थ।। ज...

तत्व सिद्धांत भाग सात।।

 ।।तत्त्व सिद्धांत भाग सात।। लेखक:---प्रोफेसर लालसिंह। गतांक से आगे:---इन तथ्यों से बिंना शक और संकोच से सिद्ध हो गया है कि, गुरु रविदास जी ने श्लोंकों की रचना की है। इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता है, क्योंकि बाहरी वाणी के सारे के सारे उपलब्ध प्रारूपों के बीच ये शलोक दर्ज हैं, इसलिए सिद्ध हो गया है कि, डाक्टर साहिब सिंह का निर्णय सही नहीं है और ये भी सिद्ध हो गया है कि, ये शलोक नंबर 242 गुरु रविदास जी की ही रचना है। 2 सिटा नंबर 2 के अनुसार, डाक्टर साहिब सिंह ने सिरलेख ना होने के कारण यह निर्णय ले लिया है, कि शलोक नंबर 242 गुरु कबीर जी का है। इस तथ्य की परिपक्वता शलोक नंबर 242 और 213 के नीचे दिया गया नोट करता है:---  "नोट:---"महला" 5 के शलोक सिर्फ तीन हैं - नंबर, 209, 210,211। अब फिर कबीर जी के उच्चारे गए शलोक हैं, क्योंकि इन का सिरलेख "महला-5" नहीं है।" डाक्टर साहिब सिंह इस नोट के बीच दलील देते हैं कि शलोक नंबर 212 और 213 के आरंभ में सिरलेख नहीं है, इसलिए ये शलोक गुरु कबीर जी के हैं, परंतु ये निर्णय सही नहीं है क्योंकि शलोक नंबर 212 और 213 के लिए अलग सिर...