तत्व सिद्धांत भाग आठ।।

 ।।तत्त्व सिद्धांत भाग आठ।।

गतांक से आगे:---शलोक का अंतरीव (अंतरिम) विचार विधान।।

इस श्लोक की पहली पंक्ति में हरि का मुख्य रूप के बीच उल्लेख कर के उसके महत्व को दृढ़ किया गया है, जबकि नर जीव अतीत के बीच विचार रहा है परन्तु जीव के क्रम को अतीत के बीच नहीं रखा गया है, बल्कि बड़े शक्तिशाली ढंग के साथ, स्पष्ट रूप में उभार कर प्रभु के साथ जीव के संबंधों को उसके कर्म अनुसार सृजन किया गया है, इस तरह इस पंक्ति के बीच जानबूझ कर पारब्रह्म-परमात्मा और उसकी अंश आत्मा का गहरा और अटूट संबंध दृढ़ किया गया है और समझाया गया है कि अपने पिता-परमात्मा को त्याग कर भाव कूड़ के प्रसार के साथ मलिन होकर जीवात्मा के लिए बख्शिश संभव नहीं है। 

दूसरी पंक्ति के बीच, पहली पंक्ति के अतीत के बीच भी विचरण कर रहे 'वे नर' को अतीत के बीचों बीच निकाल कर मुख्य रूप में सामने रख कर उभारा गया है, इस तरह पहली पंक्ति के बीच निरूपित कूड़ के बतीरे को स्पष्ट किया गया है, कि पारब्रह्म-पिता के साथ जीव संबंध तोड़ कर सीधा नर्क को ही जाएगा, यह अटल सच्चाई है।

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।।शलोक के अर्थ।।

जो जीव अपने असली पारब्रह्म प्रभु के साथ संबंध तोड़ कर किसी और के साथ (भाव) देवी देवताओं खास करके ब्रह्मा, विष्णु और महेश के साथ संबंध जोड़ते हैं, जिन को गुरु रविदास जी ने "नाथ कछुआ ना जानिऊ" और "हरि जपत तेऊ जना" के बीच वेदों, पुराणों के आधार पर पांच विकारों का शिकार साबित किया है, वह माया के दूत पांच विकारों के साथ अपने आप को ओतप्रोत करके मुक्ति की आस नहीं रखते हैं, गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि इस प्रकार के जीव निसंदेह सीधे नरकों को जाएंगे, यह अटल सच्चाई है।

अनुवादक।

राम सिंह आदवंशी।

हिमाचल प्रदेश।

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