तत्त्व सिद्धांत।। भाग दस।।
।। तत्त्व सिद्धांत भाग दस।।
लेखक:--प्रोफेसर लालसिंह।।
गतांक से आगे:---
रविदास भणे जो जाणे सो जाण।।
संत अनंतहि अंतर ना ही।।४।। २।।
गुरु रविदास जी महाराज के कहने का भावार्थ है कि जो प्रभु को जान लेता है अर्थात अपने शरीर (पदार्थ) को शक्ति के बीच तबदील कर लेता है तब वह महाशक्ति पारब्रह्म (प्रभु) ही बन जाता है इसलिए शक्ति और महाशक्ति एक ही हैं, कोई अंतर नहीं है।
स्पष्ट है कि गुरु रविदास जी ने E= mc वर्ग सिद्धांत को अमली रूप में प्रकट कर दिया था। आइंस्टाइन ने सवा छः सौ साल पीछे इस सिद्धांत को प्रत्यक्ष रूप के बीच सही सिद्ध किया है।
बस यहां पर ही नहीं हुई है, गुरु रविदास जी ने अपनी वाणी के बीच शरीर को शक्ति के बीच तब्दील करने का भाव मनुष्य की प्रभु को प्राप्त करने की विधि को भी दृढ़ की है।
चित सिमरनु करउ नैन अविलोकनो।
सरवन वाणी सुजस पूरी राखउ।।
मनु सो मधुकर करउ चरण हिरदे धरउ।
रसनु अमिरत राम नाम भाखउ।।१।।
मेरी प्रीत गोविंद सिंउ जिनी घटै।।
मैं तउ मेली महंगी लई जिअ सटै ।।१।।रहाउ।। साध संगति बिनु भाऊ नहीं उपजै।
भाव बिनु भगति नहीं होई तेरी।।
कहै रविदास इक वेनती हरि सिउ।
पैज राखहु राजा राम मेरी।।२।।२।।
सो गुरु रविदास जी ने शरीर (पदार्थ)) को शक्ति के बीच तबदील करने का सिद्धांत देकर दृढ़ कर दिया है कि शरीर को शक्ति के बीच तबदील किया जा सकता है अर्थात प्रभु प्राप्त किया जा सकता है।
इस तरह गुरु रविदास जी ने आइंस्टाइन के फार्मूले ई= एम सी2 (E=mc2) को आज से सवा छः सौ साल पहले अमली रूप में प्रकट कर दिया था,जिस को कुछ कु साल पहले आइंस्टाइन वैज्ञानिक ने तजुर्बे करके E=mc2 का फार्मूला ईजाद करके गुरु रविदास जी की अटल सच्चाई को सैद्धांतिक तौर से सिद्ध करके आत्मिक शक्ति और पदार्थ के बीच निरूपित शक्ति को "एक" ही साबित कर दिया है। आइंस्टाइन के फार्मूले E=mc2 की गवाही गुरु रविदास जी के नीचे दिए गए बंद को और भी परिपक्व कर देती है, जिसके बीच रविदास जी दृढ़ करते हैं, कि वह एको एक शक्ति (पारब्रह्म) अनेकों रूप (पदार्थ) रूप धारण करके पसारा हुआ है, एक ही एक से अनेकों रूप (पदार्थक रूप) धार कर प्रसारित हुआ है।
एक ही एक से अनेक होई बिस्थारियो।
आन रे आन भरपूरि सोऊ।।रहाउ।। (१२६३- गुरु रविदास जी)
उपरोक्त बंद के बीच गुरु रविदास जी यह भी स्पष्ट कर देते हैं, कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश प्रभु के भगत के भी बराबर भी नहीं है, सो हिंदू धर्म के ये "भगवान" प्रभु तो क्या, प्रभु के भगत के भी बराबर नहीं है। इसका अर्थ है कि वह "भगवान" शक्ति नहीं हैं, इस कारण हिंदू धर्म के "भगवान" पदार्थ (सृष्टि) की रचना करने के भी समर्थ नहीं है, बल्कि वे, "भगवान शक्ति के द्वारा पैदा किए गए पदार्थ अर्थात आम मनुष्य की हैं।
सो उपरोक्त चर्चा से दृढ़ हो जाता है कि सृष्टि की का सृजन पारब्रह्म अर्थात शक्ति से ही हुआ है। सृष्टि और पारब्रह्म आप ही हैं। इस करके गुरु रविदास जी ने इस शब्द के पहले बंद की पहली आधी तुक के बीच तोही के साथ मोही और मोही के साथ तोही के स्थान बदली के साथ सृष्टि सृजन की प्रक्रिया को स्पष्ट करके पारब्रह्म और जीवात्मा को एक सिद्ध किया है। सोहम से ही सृष्टि की उत्पत्ति हुई है। यह सृष्टि सृजन की प्रक्रिया से स्पष्ट हो जाता है। सृष्टि सृजन की प्रक्रिया के अनुसार सृष्टि सृजन से पहले भी पारब्रह्म तोही सुन समाधि के बीच था और सृष्टि समेटने के पीछे भी पारब्रह्म सुन समाधि के बीच लीन हो जाता है। इस आधी तुक के बीच पहले लफ्ज भी तोही है और अंत में भी लफ्ज तोही ही है, सो आरंभ और अंत के बीच तोही भाव पारब्रह्म ही कायम दायम है और मध्य में पारब्रह्म का सृजन, संसार रचना के बीच पारब्रह्म की अंश जीव मोही ही है। इसलिए आरंभ, मध्य और अंत के बीच भी पारब्रह्म ही है। दूसरे अर्थों में पारब्रह्म के बीच जीव समाया हुआ है और जीव के बीच पारब्रह्म समाया हुआ है, फिर अंतर कैसा? इस तरह गुरु रविदास जी निर्णय देते हैं कि दोनों के बीच किसी भी किस्म का कोई अंतर नहीं है। संसार के बीच तोही और मोही का रिश्ता परमात्मा और जीव आत्मा का है। अब अंतर केवल दृष्टि भेद करके दृष्टिगोचर होता है, वास्तविक तौर से परमात्मा और जीवात्मा एक ही हैं, कोई अंतर नहीं है। संसार के बीच तू ही और मोदी का रिश्ता परमात्मा और जीवात्मा का है। अब अंतर केवल दृष्टि भेद कर के दृष्टिगोचर होता है। वास्तविक तौर से परमात्मा और जीव आत्मा एक ही है, जिन में कोई अंतर नहीं है। जो अंतर दृष्टि भेद कर के है, वह ऐसा है, जिस प्रकार सोना और सोने से बने आभूषण या पानी और पानी के ऊपर उठी तरंगों का है। यह दृष्टांत स्पष्ट करते हैं कि दृष्टि भेद कर के ये अलग-अलग लगते हैं, परन्तु वास्तविक तौर से दोनों एक ही हैं। जब भूषण ढाले, पिघला कर समेटे जाते हैं, तब फिर सोना बन जाते हैं, जब लहरें मिट जाती हैं तब वे पानी बन जाती है इसी तरह जब पारब्रह्म सृष्टि समेटता है, अनेकता सिमट कर एकता भाव शुद्ध पारब्रह्म रह जाता है। इस स्थिति के बीच परमात्मा और जीवात्मा का दृष्टि भेद भी मिट जाता है।पारब्रह्म भी सुन समाधि के बीच जा कर विराजमान हो जाता है। इस तरह गुरु रविदास जी ने बड़ी बारीकी और गहराई के साथ सृष्टि सृजन के सिद्धांत का निर्माण किया है और दृढ़ किया है कि सोहम से ही सृष्टि का सृजन हुआ है।
उपरोक्त चर्चा से एक और महत्त्वपूर्ण और वहु कीमती सिद्धांत एक ओम/ सोहम का सृजन होता है। एक ओंकार /सोहम ही प्रभु बेअंत शक्ति है:---
' उह मैं हाँ, मैं उह हाँ'
(तोही मोही मोही तोही)
उह का अर्थ है, पारब्रह्म और मैं का अर्थ है, पारब्रह्म की अंश।इस तरह पारब्रह्म और जीव एक ही हैं, जरा भर भी अंतर नहीं है, इसलिए तोही -उह -उ उह का (संक्षिप्त)
मोही-मैं, उस की अंश -अं (अंश का संक्षेप)दोनों का समास बनता है, ओङ्ग।
उ-सो
अं-हं (अहं का संक्षेप)
दोनों का समास बनता है "सोहम"। सोहम का अर्थ है "वह मैं हूं"। I (or thou) that very person Willium Munior.
हम पहले विचार कर चुके हैं कि तोही एक वचन है और तोही के बीच मोही समाया हुआ है। यह सुन समाधि की अवस्था है। इसलिए उ बन जाता है "एक ओंकार"। सो ओङ्ग बन जाता है "एक ओंकार"
"१- एक। उ-ओङ्ग..."
उ और ओङ्ग के अर्थ एक ही होने के कारण उ के बीच (अं) भी समाया हुआ है। इस तरह गुरु रविदास जी ने सचेत हो कर के सहज ही प्रमुख सिद्धांत १ओंकार का सृजन किया है। एक और शब्द के बीच १ओंकार की पुष्टि करते हुए उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया है, कि विष्णु, शिव और ब्रह्मा पारब्रह्म के बराबर तो क्या होंने थे, वे तो पारब्रह्म के भगत के भी बराबर नहीं है। इस तरह गुरु जी ने हिंदू धर्म के अनुसार सृष्टि सृजन करने, उस की पालना करने और संहार करने वाले देहधारी भगवानों को रद्द कर के ये तीन शक्तियां १ओंकार भाव प्रभु की ही मानी है। गुरु रविदास जी के ये विचार उनके अपने शब्दों के बीच इस तरह दर्ज हैं :---
हरि जपत तेऊ जना पदम कवलासपति तास सम तुलि नहीं आन कोऊ।।
एक ही एक, अनेक होइ बिस्थारियो
ऑन रे आन भरपूर सोऊ।।१।। रहाउ।।
इसकी पुष्टि गुरु नानक देव जी ने "जपुजी" की तीसवीं पौड़ी के बीच करके १ओंकार के संकल्प को परिपक्वता प्रदान की है।
अनुवादक।
रामसिंह आदवंशी।
हिमाचल प्रदेश।
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