।।। बेगमपुरा शहर।।।
।।। बेगमपुरा शहर।।।
ज़िंदगी सुखों और दुखों का नाम है। यदि सुख ही सुख जीवन में मिलें तो भी आदमी महसूस नहीं करता है कि, मैं सुखी हूँ मगर जब वही आदमी दुखों के चाबुक की मार खाता निरन्तर खाता रहता है, चिकित्सालयों के चक्कर काटते है, हाय हाय करते हुए दुखों को झेलते हैं, सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक अत्याचार सहन करता रहता है, तब पता चलता है कि, दुख क्या होता है? सुख क्या होते हैं? जब तक भारत में आदपुरष के वंशजों का शासन रहा, तब तक तो भारत में सब कुछ ठीक चलता रहा, कोई सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक दुख और अत्याचार नहीं था, मगर जब से यूरेशियन लुटेरों ने छलबल से सत्ता छीनी हुई है तब से ही भारतवर्ष और भारत के मूलनिवासियों की अस्मिता को ग्रहण लगा हुआ है। बांटो राज करो की नीति पर यूरेशियन आर्य भारतीय जनता को पांच हजार सालों से आपस में लड़ा झगड़ा कर भारत को अवनति के गर्त में धकेलते आ रहे हैं, जिस के खिलाफ अगर आज से छः सौ साल पहले किसी ने आवाज बुलंद की थी, तो वे थे गुरुओं के गुरु "गुरु रविदास जी महाराज।"
गुरु रविदास जी बेगमपुरा की कल्पना क्यों करनी पड़ी:---यूरेशियन शासन और शासकों ने, भारतीय मूलनिवासियों के नाक में दम कर रखा था, जबरन इन की पवित्र भूमि को इन्होंने हथिया लिया है, ये लोग आए दिन अत्याचार, जुल्मोसितम ढाते आए हैं, जो आज भी जारी है। असहाय मूलनिवासियों की हाय, चीख सुनी आदपुरष ने, जिस के कारण स्वयं आदपुरष को गुरु रविदास जी महाराज के रूप में भारत में अबतार लेना पड़ा। गुरु जी तो अंतर्यामी थे। उन्होंने जन्म लेते ही अंधी दाई को नेत्र दान कर के अपना चमत्कार दिखा दिया था, उस के बाद तो निरन्तर ब्राह्मणों के नाक में दम करते ही गए। इन्हें सुधारने के लिए शांतमय सामाजिक क्रांति की शुरुआत की। जब नहीं समझे तो खूनी युद्ध भी किया जिस में महाराजा कुंभ सिंह, राणा बिकमादित्य आदि को परिवार सबक सिखाया गया। मुसलमान बादशाहों से भी खूनी पापी और अत्याचारी शासकों का कत्लेआम करवाया। सभी छलियों को रास्ते पर ला कर एक पंक्ति में खाना खिलाया और झुकाया तभी तो उन्होंने कहा है:---
अब विप्र प्रधान तिहि करहि डंडोउति।।
तेरे नाम शरणाई रविदास दासा।।
गुरु जी फ़रमाते हैं कि, हमारे युद्ध में हार कर, ब्राह्मणों के प्रधान दण्डवत प्रणाम कर रहे हैं, इतना सब कुछ होने पर भी, जाताभिमानी नहीं समझे,151 वर्ष की आयु में अत्याचारियों को सुधारने के बाद यही परिणाम निकाला कि जब तक भारत के मूलनिवासियों का शासन स्थापित नहींहो जाता, विश्व की सरकार एक नहीं बन जाती, तब तक संसार में सुख, समृद्धि, शांति और स्थाई परिवर्तन नहीं हो सकता है, इसीलिए उन्होंने कहा:----
बेगमपुरा शहर को नांऊँ।।
बेगमपुरा का अर्थ:---बेगम का अर्थ है, गम से रहित, गुरु जी हमेशा गागर में सागर भरते थे, उन के एक ही शव्द में ही सिद्धांत छिपे हुए होते हैं, जिन्हें समझने परखने के लिए तीसरे नेत्र के खुलने की जरूरत है। गुरु जी ने सारे विश्व को आदपुरष की संतान समझा और सारे संसार की एक ही परेशानी और समस्या समझी, जिन के कारण समस्त विश्व के लोग दुखी, अशांत हैं और अत्याचारियों के अत्याचार सहन करते आ रहे हैं, इसीलिए वे कहते कि वैश्विक सरकार ही विश्व को स्थायी रूप से गम रहित रख सकती है। जिस के लिए उन्होंने यह सिद्धांत दिया, कि विश्व में एक ही सरकार हो और जिस के मुखिया कोई कर्मठ सत्पुरुष, सत्यवादी, ईमानदार, सुसंस्कृत सदाचारी व्यक्ति ही उपयुक्त होगा।। वही आदर्श, सत्पुरुष ही विश्व के प्राणियों को सुखी रख सकता है, इसीलिए उन्होंने बेगमपुरा की राज्य की संकल्पना की।
गुरु जी का बेगमपुरा का रोडमैप:---गुरु जी ने सभी प्राणियों को ईश्वर की संतान मानते हुए सभी को जीने के अधिकार की वकालत की और कहा कि धरती पर कोई ऊँच नीच, छूत- अछूत, ब्राह्मण, वाणियाँ, राजपूत, हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, आदधर्मी, बुद्धिष्ठ, काला-गोरा, सिया-सुन्नी, कोई एक-दो-तीन नंबर का नागरिक नहीं है, बस केवल इंसान हैं, जिन के लिए एक ही शासक होंना चाहिए।
भारतीय दुख:---"दुखु आन्दोहू तिहि ठाऊँ"
गुरु जी ने, भारत के बहिशियों के बहिशीपन को बड़ी नजदीकी से देखा हुआ था, वे ब्राह्मणों के मनुष्यता विरोधी फतवों से आहत थे। जो आदमी, आदमी को दुख देते है और दिलाते हैं, वे आदमी नहीं है, जो लोग भक्ति करने वालों को भी मौत की सजा देबकर मारते हैं, वे इंसान नहीं हैं, रामचंद्र जैसे धर्म ग्रँथों को पढ़ने पर, भक्ति करने पर तीर से खतम्बकर देते हैं,वे इंसानों के नाम पर कलंक हैं, जो इन्हें पढ़ने पर जीव को काट देते, सुनने पर कानों में सिक्का भर देते हैं, मन्दिर में पूजा अर्चना करने नहीं देते, शिक्षा अर्जित करने नहीं देते, गुरु बनने नहीँ देते, जूठा खाने को विवश करते, फटे पुराने कपड़े पहनने के लिए मजबूर करते, झुगी झोंपड़ियों में रहने के लिए, गंदगी उठाने के लिए, विवश करते हैं, वे हैवान हैं।
धरती को सीमाओं में क्यों बांटा:---जब आदपुरष ने सारी धरती को एक ही आकार में बनाया हुआ है तो फिर इस के शरीर पर रेखाएं डॉल कर इस के खंड खण्ड क्यों गए हैं? वे इससे आहत हो कर ही कहते हैं कि, ये सारी धरती एक शहर है, इस के ऊपर किसी को भी रेखा खींचने का अधिकार नहीं, इसे वैश्विक सरकार बना कर ही खत्म किया जा सकता।
वैश्विक सरकार के लाभ:---वैश्विक सरकार की स्थापना से धरती का कोई बंटबारा नहीं होगा कोई तानाशाह नहीं बन सकेगा, कोई किसी को धर्म कर्म के नाम पर, किसी का खून कत्लेआम नहों कर सकता कोई किसी के ऊपर आक्रमण नहीं कर सकता, कोई सीमाओं के ऊपर आदमी को आदमी से कत्ल नहीं करवा सकता है, कोई भी मानव को मॉनव से निम्न, हीन, उच्च नहीं समझेगा, इसलिए विश्व में वैश्विक सरकार ही आवश्यक है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।विश्व आदधर्म मंडल।।
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