।। गुरु रविदास जी महाराज।।

 ।।मिलत पिआरो प्राणनाथ कवन भगति ते।।

साध सँगत पाई परम गते।।रहाउ।।

विश्व में अगर सत्य पर आधारित, कर्म को महत्व देकर, सँगत को सन्मार्ग पर चलने का संदेश अगर किसी ने दिया है, तो केवल और केवल चँवरवंशी गुरु रविदास जी महाराज ने ही दिया है। सभी बुद्धिजीवी, विद्वान इतिहास के पन्नों को जांच पड़ताल कर देख सकते हैं कि, सभी महापुरुषों ने, मानव जाति को, ईश्वरीय भय से भयभीत किया हुआ है, आत्मा परमात्मा के सम्बधों में उलझाया हुआ, चौरासी लाख योनियों के मानसिक तनाव में जीने के लिए विवश किया हुआ है। मानव को पुनर्जन्म के शिकंजे में बुरी तरह से कसा हुआ है, जिस के कारण मानव घुट घुट कर जीता आया है, ये मानसिक आतंक भारत के तिलकधारियों ने अधिक फैलाया हुआ है, जिस का विध्वंस अगर किया है तो केवल गुरु रविदास जी महाराज ने अपनी वाणी की तलवार से ही किया है।

प्राणनाथ कब भगति से मिलते:---गुरु रविदास जी महाराज, पाखंडी ब्राह्मणों के कपट से सने हुए उपदेशों से वहुत ही व्याकुल लगते हैं। वे फरमाते हैं कि ब्राह्मण का कथन है कि, प्राणों के स्वामी अर्थात आदपुरष केवल कठोर भगति से ही मिलते हैं, भगवान के दर्शन तभी होते हैं जब मनुष्य नवधाभक्ति करता है। भक्ति के लिए व्यक्ति कहीं अपनी हड्डियों को भी सूखा लेता है, जिस प्रकार दधीचि ऋषि के बारे में दंतकथा, किंवदंती चली आ रही है, उसे किस ने देखा? किस ने उस की हड्डियों को विखरते देखा? ये किसी को मालूम नहीं मगर उस की कठिन भक्ति का आतंक मनुष्य के मन मस्तिष्क पर बनाया हुआ है। गुरु रविदास जी ने इन्हीं ढोंगियों की सत्यता, वास्तविकता को सँगत के सामने लाने के लिए कहा है कि, हे सँगत के दुश्मनों बताओ, परम प्रिय प्राणनाथ अर्थात साँसों के मालिक आदपुरष भगति से किस प्रकार मिलते हैं? किस किस ने उसे उल्टे लटक कर भक्ति करते हुए देखा और पाया है ? गुरु जी के कथन का लक्ष्यार्थ भी यही है कि हे धर्म के ठेकेदारो ! ये बताओ कि प्राणनाथ को किस प्रकार की भक्ति से प्राप्त किया गया है ? किस भक्ति से पाया जा सकता है?

ढोंगियों के ढोंग:---जब कोई साध सन्त अमर हो जाता है तब उस के चेले चांटे ही ऐसे तुक जोड़ते हैं कि भोलेभाले लोग उन के तर्कहीन घड़े हुए तुकों को सत्य मॉन कर, भेड़चाल चलते हुए उन साधों की क़ब्रों पर नतमस्तक हो कर, उन पर अंधाधुंध आस्था पैदा कर लेते हैं। मरे हुए साध की कथा घड़ी जाती और कहा जाता आया है कि अमुक महात्मा रात को जलाया गया मगर सुबह उसे श्मशान घाट से उठ कर पूर्व दिशा की ओर जाते देखा गया। काफिरों ने अमुक साध को फाँसी पर लटका दिया मगर मृतात्मा को अपनी कुटिया की ओर जाते देखा गया, ऐसी तर्कहीन दंतकथाएं घड़ कर लोगों को अपने पीछे लगा कर, उन का आर्थिक शोषण शुरू कर दिया जाता है। गुरु रविदास जी महाराज ने, इन्हीं पाखंडियों की पोल खोलते हुए तर्कसंगत भक्ति को सिद्ध किया है। वे फरमाते हैं कि, प्राणों से प्यारे प्राणनाथ भगति से कहाँ मिलते हैं? मैं भी आदपुरष को ढूंढते ढूंढते थक गया मगर कहीं पर भी वह नजर नहीं आया। तेती करोड़ देवी देवते कहीं भी किसी के बुरे आचरण को दूर करते नहीं देखे गए, किसी की भुखमरी को खत्म करते हुए नहीं देखे गए, किसी की गरीबी को मिटाते हुए नहीं देखे गए मगर इन से छुटकारा किसी ने पाया है, तो कड़ी मेहनत मजदूरी कर के ही जीवन को सुखी, समृद्ध और सम्पन्न बनाया है। धोतीधारी, तिलकधारी हर समय प्राणनाथ के दरबार में पूजा, अर्चना करते आए हैं मगर इन मनहूसों की आध्यात्मिक शक्ति कभी भी किसी की मुशीबतों को दूर नहीं करती हैं।

गुरु रविदास जी महाराज फ़रमाते हैं कि, "कर्म ही पूजा है" जो कड़ी मेहनत करते हैं, खून पसीने की, हक हलाल की कमाई खाते है, उन्हें ही जीते जी प्राणनाथ मिलते हैं, जो हरामखोर हराम की कमाई खाते हैं, वही वर्षों तक खाट पर पड़े रहते हैं और सड़ सड़ कर मरते हैं, इसी धरती पर इंसाफ होता है, इसी धरती पर व्यक्ति को दंड मिलता है तभी प्राणनाथ प्राण निकालता है।

सँगत के सानिध्य से मुक्ति:---गुरु रविदास जी महाराज, आडंबरों की पोल खोलते हुए फ़रमाते हैं कि, जब हमने निरीह सँगत के दर्शन किये, उन के दुखों में शामिल हो कर दुखों को बांटा, सुखों में शामिल हो कर उन की खुशी को और बढ़ाया तभी हम ने भी परमगति को प्राप्त किया। सँगत ने भी परमात्मा को देखा और हम ने भी सँगत के बीच ही प्राणनाथ को पा कर परमगति को प्राप्त किया था। वास्तव में ही जो किसी के वच्चों से प्यार करता है, उससे वच्चों से माता पिता स्वत ही खुश हो जाते हैं। यही प्रकृति का सिद्धांत है,जिस पर पंडे पुजारी तिलकधारी चलने नहीं देते, इस मार्ग पर केवल गुरु रविदास जी महाराज ने ही सँगत का चलाया था।

रामसिंह आदवंशी।

अध्यक्ष।

विश्व आदधर्म मंडल।


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