।। स्तजू सतु तेता जगी।।

 

              ।।सतजुग सतु तेता जगी।।
                 ।।राग गौड़ी वैरागण।।
गुरु रविदास जी महाराज ने हिंदू धर्म ग्रंथों की चीर फाड़ कर कर के तार-तार कर दिया था। ब्राह्मणों ने तेती करोड़ देवी देवताओं का निर्माण कर के उनके बीच विष्णु को सर्वश्रेष्ठ अवतार घोषित किया हुआ है। वह बार-बार भिन्न-भिन्न नामों से जन्म लेता रहता है। ब्राह्मणों ने ही काल विभाजन करके समय को भी चार भागों में बांट कर के इन का नामकरण सतियुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग रखा हुआ है। ऐसा काल विभाजन विश्व के किसी भी देश में नहीं हुआ है और ना ही विश्व के किसी विद्वान ने इसे मान्यता दी हुई है।ब्राह्मणों ने काल विभाजन कर के तप, तपस्या, भक्ति, साधना के रंग ढंग, विधि विधान भी हर युग में अलग-अलग निर्धारित किये हुए हैं, जिन का कोई तर्कपूर्ण आधार नहीं है।
सतियुग: सतियुग में तिलकधारी ब्राह्मण ही शिक्षा ग्रहण करेंगे और पूजा पाठ में कुतर्कपूर्ण कथाएं लोगों को सुना, सुना कर यज्ञ कर के दान दक्षिणा लेकर बड़े आराम से घर पर ही बैठ कर खाएंगे, कहीं भी किसी खेत में जाने की कोई जरूरत नहीं, खेत में काम करने वाला केवल एक वर्ग शूद्र ही होगा, वही तीनों वर्णों के लिए खाद्य सामग्री  पैदा करेगा और पशुओं, जानवरों की देखभाल करेगा, वही उन के लिए घास पानी का प्रबंध करेगा, मगर ब्राह्मण केवल यज्ञ करेगा और दूसरे ब्राह्मणों को यज्ञ करना सिखाएगा।राजपूतों, वाणियों के घरों में ही यज्ञ करेगा और उन से जीविकोपार्जन करेगा। वेदों के अनुसार इस युग में ब्राह्मणों का केवल एक ही उद्देश्य था दान लेना। सतयुग में भगवान को खुश करने के लिए दान देना अनिवार्य है। ब्राह्मणों का भगवान भी दान देने वालों के ऊपर ही दयालु होता है, तथा इन के भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि सभी देहधारी ही हुए हैं, इन देवी, देवताओं और भगवानो के जीवन चरित्र की आलोचना और समालोचना की जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि यह कोई अति मानव हैं। ब्रह्मा के चार सिर हैं, चार सिरों वाला कोई व्यक्ति मां के गर्भ से पैदा नहीं हो सकता है। भयाक्रांत हो कर के विष्णु शेषनाग के साए में जीवन बिताता है और शिव महेश दक्षिण दिशा में निवास करके मुर्दों का सरदार है।
त्रेता:--- इस युग के अवतार राम घोषित कर दिये गए, जिस ने भगवान की तपस्या करने के कारण महाऋषि शंबूक को अपने हाथों से कत्ल कर दिया था। जिसे विष्णु का ही अवतार घोषित कर दिया गया था। इसी युग में अमानवीय बलि प्रथा की शुरुआत कर के देवी देवताओं को खुश किया जाने लगा, जिस ने भारतवर्ष में बलिप्रथा कुरीति को जन्म दिया गया है, जिस के नाम पर ब्राह्मण लोग पशुओं, स्त्रियों और शूद्रों की बलि दे कर के अपने देवी देवताओं को प्रसन्न करने लगे थे, जिस कुप्रथा को विदेशी अंग्रेज शासकों ने आंशिक रूप से समाप्त किया था, मगर ये प्रथा आज भी जारी है, यही नहीं ये लोग अपने पेट की भूख, प्यास को मिटाने के लिए बड़ी निर्दयता से पशुओं का कत्ल करते हैं। किसी भी देश में कहीं पर भी ऐसा नहीं है, कि दो नंबर के पहले तीन आ जाए, यह केवल भारत ही एक ऐसा देश है, जहां ब्राह्मणों ने द्वापर से पहले ही त्रेता युग का निर्माण कर दिया है और मुझे लगता है कि जब यह काल्पनिक झूठे और तर्कहीन ग्रंथ लिखे गए हैं, तब जो कथाएं इन्होंने दो नंबर के ग्रंथ में लिखनी थी, वे तीन में लिखी जा चुकी थी। इसी धोखे को वे कुतर्कपूर्ण ढंग से लिखते हैं, कि ऋषि के अभिशाप के कारण त्रेता युग पहले और द्वापरयुग बाद में आया। ऐसा भी कहीं नहीं है कि गिनती करते समय एक के बाद तीन और बाद में दो चार आ जाए। जब द्वापर युग में राम जैसे कातिल का शासन खत्म हो गया और कृष्ण जैसे गोपियों के भगवान का शासन शुरू हो गया तब ब्राह्मणों ने कृष्ण को भी विष्णु का अवतार घोषित कर दिया। जिस से भक्ति और साधना का स्वरूप भी बदल दिया गया। आंशिक रूप से पशु बलि खत्म हो गई, अब केवल देवी, देवताओं की पूजा होने लगी, जब कृष्ण के पांव में शिकारी का तीर लग गया और वह अमर हो  गया तो द्वापर युग भी खत्म हो गया।
द्वापरयुग:---द्वापर युग में कृष्ण को विष्णु का अवतार घोषित किया गया, इस युग में मूर्ति पूजा का प्रचलन करके विष्णु को खुश करने का काम किया गया।
कलियुग:---द्वापरयुग के बाद कलियुग शुरू हो गया। कलियुग में यह कहा गया कि " कलि केवल नाम आधार" अर्थात कलियुग में केवल ईश्वर का नाम लेना, उस का ध्यान करना ही भक्ति का आधार होगा, इस कथन पर वर्तमान शिक्षित विद्वानों और व्याख्याकारों में मतभेद हो चुका है। अधिकतर विद्वान इसका अर्थ ईश्वर के नाम का सिमरन करने के साथ जोड़ते हैं और उसी से ही मुक्ति मिल सकती है मगर ये अर्थ निकालने पर कुछ संदेह उत्पन्न होते हैं,  जिस का अभास गुरु रविदास जी महाराज को हुआ है, क्योंकि संसार में केवल वही एक जन्मजात सुशिक्षित विद्वान और अवतार हुए हैं, उन्होंने कहीं भी किसी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा है और ना ही किसी से अक्षर ज्ञान प्राप्त किया है, ना ही उनका कोई गुरु हुआ, ना ही उन का कोई पीर, औलिया, अवतार, पैगंबर और देवता हुआ है। वे तो सीधे आदपुरष से निवेदन करते हैं, कि हे आदपुरष!
"मैं राम नाम धन लादिया बिख लादी संसारि"।। गुरु रविदास जी के इस कथन से यह साबित होता है, कि केवल ज्योतिर्ज्ञान उन्हीं के पास था, परन्तु सारे संसार के गुरुओं के पास केवल काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार जैसे विषैले अस्त्र शस्त्र थे, इसीलिए वे धरती पर तत्कालीन किसी भी गुरु को महत्व नहीं देते हैं और ईश्वर को ही अपना गुरु मान कर के कहते हैं, कि हे आद पुरुष!
"सगल भवन के नाईका इक छिन दरस दिखाई जी"।
गुरुजी सारे संसार के नायक आदपुरष से विनम्र प्रार्थना करते हैं, कि हे परमपिता परमेश्वर ! एक क्षण के लिए मुझे दर्शन दे दो, इस कथन से ये साफ जाहिर होता है, कि धरती के ऊपर उन के बराबर कोई भी सम्पूर्ण गुरु नहीं था, इसीलिए वे विनम्र हो कर आदपुरष से प्रार्थना करते हैं कि मुझे दर्शन दे दो।
मेरा विचार तो यह है, कि इस युग को कलयुग ही कहा जाए, क्योंकि वर्तमान में लोग सुशिक्षित हो चुके हैं और कला के द्वारा ही आनंदमय सुखी जीवन जी रहे हैं। वास्तव में वर्तमान युग है ही कलयुग है। ब्राह्मणों को आभास था, कि हम लंबे समय तक लोगों को वेदों और पुराणों के काल्पनिक भय को स्थाई बना कर मूर्ख नहीं बना पाएंगे, इसलिए जब लोग सुशिक्षित हो जाएंगे तो फिर भी सतियुग, त्रेता और द्वापर की काल्पनिक कथाओं को त्याग देंगे और मशीनी युग शुरू होगा, जिस का नाम श्रेष्ठ, बुद्धिमान विचारक कलयुग के नाम से पुकारेंगे मगर इस युग को कलियुग ही पुकारा जा रहा है।
कलियुग में मूर्ति पूजा के लिए राम कृष्ण और तेती करोड़ देवी देवताओं की पूजा की जाने लगी जो आज जारी है। गुरु रविदास जी महाराज इन चारों प्रकार की पूजाओं का बुरी तरह तर्कसंगत खंडन करते हुए फरमाते हैं कि ये हिंदू धर्म-कर्म तर्क की कसौटी पर पूर्ण नहीं उतरते हैं। इन चारों प्रकार के ही प्रकार की  पूजाओं से जीवन में कोई सुखी नहीं रह सकता है और ना कभी कोई किसी युग मे रहा है अर्थात इस संसार रूपी सागर में कोई आनंदमय जीवन व्यतीत कर सकता है।
सतजुगि सतु तेता जागी दुआपरि पूजाचार।।
तीनों जुग तीनों दृढे कलि केवल नाम आधार।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि ब्राह्मणों ने अपने विष्णु अवतार को प्रसन्न करने के लिए पहले सतयुग में दान देकर पूजा अर्चना करने का प्रावधान किया। त्रेतायुग में यज्ञ करना और द्वापर में राम और कृष्ण जैसे अवतारों की पूजा करना, उन सभी के अवसान के बाद ये लोग बड़े विश्वास से कलयुग में केवल भक्ति का आधार नाम ही बता रहे हैं। गुरु रविदास जी ने हिंदू धर्म के ग्रंथों को कर्मकांडों को खंडित करके कहा है, कि इससे आदपुरष की प्राप्ति नहीं हो सकती है, गुरु जी प्रश्न करते हैं कि इस तरह की काल्पनिक पूजाओं से भवसागर को किस प्रकार पार किया जा सकता है?
पारु कैसे पाइबो रे।
मो सउ कोऊ न कहै समझाई।।
जा ते आबागवनु बिलाई।।१।। रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि संसार में काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार से छुटकारा कैसे पाया जा सकता है ? इन पांचों यमदूतों से मुक्ति का कोई भी साधन मुझे नहीं समझ आता है, किस प्रकार इनके भाव मन में आते और जाते हैं, इन का अंत किस प्रकार किया जा सकता है?
गुरु रविदास जी महाराज सामाजिक क्रांति के मसीहा थे, उन्होंने इस जन्म और अगले जन्म के बारे में ब्राह्मणों की तरह आडंबरों का बखान नहीं किया है, इसलिए गुरु जी समझाते हैं कि मनुष्य पांच विकारों से ग्रस्त है और इनके भाव मन में आते जाते रहते हैं, जिन के बारे में मानव को सोचना चाहिए।
बहु बिधि धर्म निरूपीऐ करता दीसै  सभ लोई।।कवन कर्म ते छूटिऐ जिह साधै सभ सिद्धि होइ।।२।।
गुरु रविदास महाराज हिंदू धर्म की अनेकों प्रकार की भक्ति की खोज किए जाने पर फरमाते हैं, कि इन के शास्त्रों के अनुसार हर युग में भक्ति करने का तौर तरीका बदल जाता है और भक्ति के नए-नए तरीकों की कल्पना की जाती है मगर उन सभी के बीच कोई भी देदीप्यमान नक्षत्र अर्थात परम ज्योति दिखाई नहीं देती है। क्रिया कर्म से इन पांच विकारों से छुटकारा नहीं पाया जा सकता है, किस साधना से यह सिद्ध हो सकता है, कि मानव इन विकारों के ऊपर सफलता किस प्रकार प्राप्त कर सकता है ? क्योंकि यही विकार अच्छे काम करने से रोकते आए हैं। मानव इन में ही उलझा रहता है और इन योजनाओं के कारण वह ना तो खुद सुखी रहता है और ना दूसरों को भी सुखी रहने देता है। गुरु रविदास जी महाराज इसी जीवन को सफल और सुखमय बनाने के लिए सामाजिक चेतना पैदा करते रहे हैं।
करम अकरम बिचारिऐ संका सुनि वेद पुरानु।।
संसा सदा हिरदै बसै कउन हिरे अभिमानु।।३।।
ब्राह्मणों ने जातियों, वर्णों के आधार पर कार्यों की कल्पना की हुई है, जिसके अनुसार भारतीय लोग काम करते हुए दिखाई देते हैं। इन के वेदों, पुराणों को पढ़ कर के मन में अनेकों शंकाएं पैदा होती हैं और यह शंकाएँ सदा हृदय में ही रहती हैं इन के ऊपर कौन विश्वास करे?  गुरु जी फरमाते हैं, कि हिंदुओं के शास्त्र हर युग में भिन्न-भिन्न प्रकार के कर्म और भक्ति करने के तरीके निश्चित करते हैं। ब्राह्मणों, वाणियों,  क्षत्रियों और शूद्रों के लिये अलग अलग धर्म-कर्म सुनिश्चित करते हैं, जिनमें वेद, पुराण, उपनिषद और ब्राह्मण ग्रंथ कुछ कामों को करने की आज्ञा देते हैं मगर कुछ कर्मों को प्रतिबंधित करते हैं, जिस के कारण इन धर्म शास्त्रों के प्रति मन में अनेकों शंकाएं पैदा होती हैं। अनेक प्रकार के मन में विकार पैदा होते हैं। गुरु जी प्रश्न करते हैं, कि इन धर्म शास्त्रों के नियमों, सिद्धांतों को सुनकर के लोगों के मन में अनेकों भ्रम और विकार सदा के लिए स्थाई रूप से बस जाते हैं, इन से उत्पन्न हुए अहंकार और अभिमान को मन से किस प्रकार दूर किया जा सके, यह कोई नहीं समझा पाता है।
बाहर उदकी पखारिऐ घट भीतरि विबिधि बिकार।।
सुध कबन पर हूईबो सुच कुंचर बिधि बउहार।।४।।
गुरु रविदास जी गंगा स्नान के ऊपर भी कठोर प्रहार करते हुए कहते हैं, कि हिंदू लोग अपने तीर्थ स्थानों के ऊपर स्नान कर के पवित्र होते हैं परंतु यह पानी केवल उन के शरीर के ऊपर ही गिरता है, उन के मन में सभी प्रकार की बुराइयों काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार का बज्र आवरण चढ़ा हुआ है, ये लोग उन से बाहर कभी नहीं निकलते हैं। वे मन में कभी नहीं सोचते हैं कि, हम हाथी की तरह पानी में स्नान तो करते हैं मगर  पवित्र स्नान के उपरांत काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार का कीचड़ अपने शरीर के ऊपर फेंक लेते हैं। गुरु जी ने हिंदुओं के शाही स्नान आदि का बुरी तरह खंडन किया है और उन्होंने पांच विकारों से मुक्ति पाकर अंदर और बाहर से स्वच्छ रहने का उपदेश दिया है।
रवि परगास रजनी जथागति जानत सभ संसार।।
पारस मानो तांबो छुए कनक होत नहीं बार।।५
।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि जिस प्रकार सूर्य की किरणें रात्रि के घनघोर अंधकार को आंखों की पलक झपकते ही धरती के चारों ओर प्रकाश कर देतीं हैं, उसी प्रकार पारस धातु के छूने मात्र से ही तांबा सोना बनने में देर नहीं लगाता है, उसी तरह पारस रूपी परम गुरु के पास जा कर जब कोई आत्मसमर्पण कर देता है तब वह उस के ज्ञान रूपी प्रकाश से प्रकाशित हो जाता है। इस सच्चाई को सारा संसार जानता है।
परम परस गुरु भेटीऐ पूरब लिखत लिलाट।।
उरमन मन में ही मिलै छूटकत बजर कपाट।।६।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि यदि मनुष्य अपने मानस पटल (लिलाट) मस्तक के ऊपर अच्छे गुरु की कल्पना करके उसे प्राप्त करने का प्रयास करें, तो उसे श्रेष्ठ गुरु से भेंट अवश्य होती है। यदि साधक का मन सच्चा हो तो, इसी जन्म में ज्योतिर्ज्ञानी गुरु के सानिध्य में अज्ञानता के कठोर से कठोर दरवाजे भी खुल जाते हैं। शुभ कार्य करने पर श्रेष्ठ गुरु की प्राप्ति होती है अन्यथा मानव हिंदू धर्म ग्रंथों और उन की कल्पित पोथियों की काल्पनिक कथाओं के बीच ही उलझा रहता है, जिस से यह जन्म तो अंधकारमय बना रहता है। जीवन को सुखमय और आनंदमय बनाने को ही प्रभु मिलन कहा जा सकता है
भगति जुगति मति सति करि भ्रम बंधन काटि बिकार।।
सोई बसि रसि मन मिलै गन निरगुन ऐक  बिचार।।७।।
गुरु रविदास जी ज्योतिर्ज्ञान और साधना के मणिकांचन योग से सी भ्रम और काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार के बंधनों को काटने के लिए ज्ञान की आवश्यकता बताते हैं। ज्योतिर्ज्ञान और उपासना से ही हिंदुओं के काल्पनिक वेदों, शास्त्रों के बंधनों को काटा जा सकता है। जब ये बंधन कट जाते हैं, तभी वह परमेश्वर हिरदय में निवास करता है और मन में समरस एकरस हो कर, आत्मा को अपने अंदर समा लेता है। आत्मा परमात्मा में एकाकार हो कर निर्गुण बन जाते हैं।
अनिक जतन निग्रह किऐ टारी ना टरै भ्रम फ़ास।।
प्रेम भगति नहीं उपजै ता ते रविदास उदास।।८।।१।।
हिंदू धर्म शास्त्रों की पोल खोलते हुए, गुरु रवि दास जी महाराज फरमाते हैं, कि अनेक प्रकार के निग्रह (हठयोग) आदि शास्त्रों की क्रियाएं करने पर भी, कर्म गति को कदाचित टाला नहीं जा सकता है और ना ही संदेहों और भ्रमों के बंधनों को काटा जा सकता है। गुर रविदास महाराज फरमाते हैं कि यदि मन में प्रेम भक्ति उत्पन्न नहीं होती है, तो हम परेशान हो जाते हैं और उदास रहते हैं अर्थात आनंदमय जीवन के लिए प्रेम भक्ति ही श्रेष्ठ और आवश्यक है। वास्तव में, जब हम प्राणियों से प्यार करेंगे तो परमेश्वर स्वत ही खुश हो जाएंगे और उसकी दयादृष्टि हमेशा प्रेमी के साथ बनी रहेगी। वह जीवन भर आनंदमय, सफल और सुखी रहेगा। गुरु जी काल्पनिक स्वर्ग नरक के बीच विश्वास नहीं करते हैं, वे इसी जीवन को स्वर्ग बनाने के लिए लोगों को प्रेरित करते हैं और स्वयं भी विश्व में भ्रमण कर करके जनचेतना जागृत कर के, वर्तमान जीवन को सुखमय बनाने का रास्ता बताते रहे।
शब्दार्थ :--- सतु-सत्य, दानपुण्य। तेता-त्रेतायुग।जगी-यज्ञ। दुआपरि-द्वापरयुग। पूजाचार-चार प्रकार की पूजा (दानपुण्य, यज्ञ कर के प्राणियों की बलि देना, काल्पनिक अवतारों की पूजा, मूर्ति पूजा।) दृढ़-पक्का करना, परिपक्व। कलि-कलियुग। नाम आधार-अवतारों के नाम ही भक्ति के आधार। पारू-भेद या अंत पाना, भव सागर अर्थात पांच विकारों से मुक्ति पाना।सउ- से। आबागमवन-जन्म मरण का चक्रवात। बिलाई-मुक्ति। बहु विधि-अनेकों ढंग, तरीके। नीरूपीए-कल्पित। कवन-कब। लोई-प्रकाश।जिह साधे-जिस की साधना। सिद्धि-सिद्ध करना, सफलता। करम-अच्छे कार्य, व्यवसाय। अकरम-जातीय आधार पर बुरे कार्य। संसा-शक, सन्देश। हिरे-हरना, दूर करना, हटाना। उदकी-पानी, जल,सलिल। पखारिऐ-साफ करना, धोना, स्वच्छ करना। परम पारस गुरु-ज्योतिर्ज्ञानी गुरु, आध्यत्मिक गुरु। भेटीए-भेंट होना, मिलना। लिलाट-मस्तक, माथा। उनमन-श्रेष्ठ मानसिकता। छुटकत-छूट जाना, बंधनों से मुक्त होना। बजर-कठोर, सख्त। कपाट-किबाड़, दरवाजे। जुगति-युक्ति, तरीका, ढंग। मति-विचार, बुद्धि, सोचना, मथ लेना, दृढ़, मजबूत इरादा। सोई-वही, आदपुरष। बसि-मन में निवास, विराजमान। रसि-रस जाना, समरस, आनंदमग्न हो जाना। गुन-सतो, रजो, तमो तीन गुण। निर्गुण-जिस में गुण ना हों, निराकार। अनिक- अनेकों।निग्रह-हठयोग, हठ पूर्वक साधना। फ़ास-फंदा,फांसी। उदास-अनमना, बेचैन, परेशान।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।।

Comments

Popular posts from this blog

गुरु रविदास जी की क्रांतिकारी वाणी दोधारी है।

क्रांतिकारी शूरवीर गुरु रविदास जी महाराज।।

।।राम बिन संशय गाँठि न छूटे।।