।। तत्त्व सिद्धांत।। भाग नौ।।
।।तत्त्व सिद्धांत भाग नौ।।
।।लेखक प्रोफेसर लालसिंह।।
।। राग सिरी।।
तोहि मोहि मोहि तोहि अंतरु कैसा।
कनक कटक जल तरंग जैसा।
जउ पै हम न पाप करन्ता, अहे अनन्ता।
पतित पावन नामु कैसे हुन्ता।।१।। रहाउ।।
तुम जु नाईक अछरू अंतरजामी।।
प्रभ ते जनु जानीजै, जन ते सुआमी।।२।।
सरीरू अराधे मो कउ बीचारु देहु।।
रविदास समदल समझावै कोऊ।।३।।
पद अर्थ:---तोहि-तुम, आप, पारब्रह्म। मोहि मैं, पारब्रह्म की अंश, जीव। अंतर- भेद, फर्क। तोहि- मोहि, मोहि-तोहि, सृष्टि सृजन से पहले भी पारब्रह्म (तोहि) सुन्न समाधी के बीच था और सृष्टि समेटने के पीछे भी पारब्रह्म (तोहि) सुन्न समाधी के बीच लीन हो जाता है। इस आधे तुक के बीच पहले 'तोहि' है और अंत में भी तोहि है।सो आरंभ और अंत में 'तोहि' ही है और मध्य के बीच में पारब्रह्म का सृजन उस की अंश जीव (मोही) है। सो आरंभ, मध्य और अंत के बीच पारब्रह्म ही है। फिर अंतर केहा- फिर भेदभाव किस प्रकार का? कनक- सोना। कटिक- कड़ा। जल- पवित्र, पानी। "जल" शब्द का प्रयोग इत्तफाक से ही नहीं हुआ है। गुरु रविदास जी ने जल का प्रयोग जानबूझकर पवित्रता का अर्थ बताने के लिए किया है। सो "जल" पवित्रता का प्रतीक है, इसलिए कहा जाता है कि "जल मिलिआ परमेश्वर मिलिआ।" "जब हम होते तब तुम नाहीं" वाले शब्द में भी "जल केवल जल माहीं" बक्त के गुरु रविदास जी स्पष्ट करते हैं कि जीव आत्मा पवित्र बन कर अपने पारब्रह्म परम आत्मा के साथ जा कर अभेद (समरस) होती है। सो यहां भी जल पवित्रता का प्रतीक है। तरंग-लहर , तरंग की भावना और स्वभाव संगीतात्मक होने के कारण पवित्रता का प्रतीक है। जैसा-जिस प्रकार।
जउपै-जे, यदि। हम- मैं (एक वचन) । अहे-हे। अनंता-जिस का अंत नहीं अर्थात प्रभु। पतित-अपवित्र, विकारों से भरे हुए। पावन-पवित्र करने वाला, पापियों को तारने वाला। हुन्ता-होता है।।१।। रहाउ।।
तुम-तूँ, पारब्रह्म। जु-जो। नाइक-नेतृत्व करने वाला प्रभु, मुक्ता होने के कारण समास है। "प्र"- सै, वय-ये शब्द के साथ मिलकर-आरंभ, गति, अति, प्रसिद्धि आदि अर्थ देता है। जिवें- जिस प्रकार प्रचंड, प्रबंध, प्रभाव आदि। "भ- २सं, संगया-प्रकाश, रोशनी। प्रकाश का अर्थ ज्ञान है।इसी तरह प्रभु का अर्थ बनता है, प्रसिद्ध ज्ञान भाव ब्रह्मज्ञान। सो प्रभ, ब्रह्म-ज्ञान का एकोएक आदि स्रोत है, जिस प्रकार बंद के दूसरे तुक " प्रभ ते जन जानी जै जन ते सुआमी" के बीच ब्रह्म-ज्ञान का वर्णन है।
प्रभ- खुद ही साधक को ब्रह्म ज्ञान प्रदान करता है। उस के साथ साधक प्रभु-रूप बन जाता है। इसी तरह प्रभु से साधक की पहचान हो जाती है, इसी तरह पहले प्रभु से साधक की पहचान होती है, फिर वही साधक प्रभु की पहचान का साधन बन जाता है।
"प्रभ-सुआमी"- आरंभ में भी प्रभु का ब्रह्मज्ञान के साथ वरसोया साधक है। सो आरंभ, मध्य और अंत के बीच ब्रह्मज्ञान ही है। जन-साधक, सेवक। जानी जै-पहचाना जाता है। सुआमी-प्रभु।।२।।
सरीरू-तन-मन की एक स्वरता। सरीरू अराधै-शरीर में एकाग्र हो कर सिमरन करना। मो कउ-मुझे। बीचारु-ब्रह्मज्ञान का विचार। समदल-अनेकों में एक, दृष्टि में व्यापक, सर्वव्यापक प्रभु। कोऊ-सब के बीच मे से कोई एक।।३।।
अनुवाद।
राम सिंह आदवंशी।
हिमाचल प्रदेश।
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